जब मीराबाई चानू की ताकत से भाई भी हुआ हैरान, पहले भी जीत चुकी हैं कई मेडल
टोक्यो : भारत की महिला वेटलिफ्टर सैखोई मीराबाई चानू ने ओलंपिक 2020 में गोल्ड पर निशाना लगाते हुए टोक्यो में तिंरगा लहरा दिया है। मीराबाई ने खेल के दूसरे दिन सिल्वर मेडल जीता। इसी के साथ वह ओलंपिक में भारत के लिए वेटलिफ्टिंग में सिल्वर मेडल जीतने वाली पहली महिला बन गईं। यह ओलंपिक 2020 में भारत के नाम पहला मेडल भी रहा। आज मीराबाई पर भारतवासियों को गर्व है। हालांकि, मीराबाई का यहां तक के पहुंचने का सफर आसान नहीं था। उन्होंने अपने करियर के शुरूआती दाैर से ही जीत हासिल करने का जज्बा बनाए रखा था जो आज उन्हें बड़े मुकाम तक ले गया।

पहले भी जीत चुकी हैं कई मेडल
2014 से 48 किग्रा वर्ग में अंतरराष्ट्रीय स्पर्धाओं में मीराबाई ने राष्ट्रमंडल खेलों में विश्व चैंपियनशिप और कई पदक अपने नाम हैं। खेल में उनके योगदान के लिए उन्हें भारत सरकार द्वारा पद्म श्री से सम्मानित किया गया है। मीराबाई को 2018 में भारत सरकार द्वारा राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। उन्होंने 2014 राष्ट्रमंडल खेलों, ग्लासगो में महिलाओं के 48 किलोग्राम भार वर्ग में 'सिल्वर' मेडल अपने नाम किया था। फिर उन्होंने 'गोल्ड कोस्ट' में आयोजित कार्यक्रम के 2018 संस्करण में 'गोल्ड' मेडल जीतकर खेलों के रिकॉर्ड को तोड़ दिया। मीराबाई के करियर की सबसे बड़ी उपलब्धि 2017 में आई, जब उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका के अनाहेम में आयोजित विश्व भारोत्तोलन चैंपियनशिप में 'गोल्ड' मेडल जीता था। उन्होंने 2019 एशियाई भारोत्तोलन चैंपियनशिप में 49 किलोग्राम वर्ग में क्लीन एंड जर्क में ब्राॅन्ज जीतकर टोक्यो ओलंपिक के लिए क्वालिफाई किया था।

जब मीराबाई चानू की ताकत भाई भी हुआ हैरान
मीराबाई चानू का जन्म 8 अगस्त 1994 को नोंगपोक काकचिंग, इंफाल, मणिपुर में एक मैतेई परिवार में हुआ था। मीराबाई की ताकत को उसके परिवार ने शुरू से ही देख लिया था। जब जंगल से लकड़ियां काटकर घर लाई जाती थीं तो मीराबाई का ही अधिक सहयोग रहता था। तब उनके बड़े भाई सैखोम सनातोंबा मेइती भी हैरान रह गए थे। हुआ ऐसा कि लड़कियों का जो बड़ा बंडल सनातोंबा नहीं उठा सकते थे उसे मीराबाई उठाकर घर ले जाती थी। तब मीराभाई की उम्र 12 साल की थी और इतनी कम उम्र में ज्यादा ताकत परिवार को हैरान कर गई।

मां चलाती थीं दुकान
मीराबाई का बचपन मु्श्किलों में गुजरा है। उनके घर आर्थिक तंगी भी रही। उनकी मां एक छोटी सी दुकान चलाती थीं, जबकि पिता छोटा मोटा काम करके घर का गुजारा चलाते थे। यही नहीं, मीराबाई के लिए ट्रेनिंग करना भी आसान नहीं रहा क्योंकि उनके घर के आसपास कोई ट्रेनिंग सेंटर नहीं था। ट्रेनिंग के लिए उन्हें हर रोज 60 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता था। 2018 में हुई कॉमनवेल्थ गेम्स में जब मीरबाई ने गोल्ड मेडल जीता था तो इस उपलब्धि के लिए उन्हें मणिपुर के मुख्यमंत्री की तरफ से 20 लाख रुपए का इनाम भी दिया गया था।
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