'टीम में बस कप्तान और मेरी जगह नहीं बदली'
फ़ाइनल में तीन विकेट लेने वाले मदन लाल उन्हें टीम का लकी चार्म कहते हैं- वो 12वां खिलाड़ी जिसकी किस्मत का साथ होना विश्व कप जीतने के लिए उतना ही ज़रूरी था.
यहाँ बात हो रही है सुनील वॉल्सन नाम के उस शख़्स की जो 1983 में भारतीय क्रिकेट की 14 सदस्यीय टीम में शामिल तो थे लेकिन उन्हें एक भी मैच खेलने का मौका नहीं मिला.
क्रिकेट विश्व कप जीतने की 25वीं सालगिरह पर जब मैं टीम के सदस्यों से बात करने की कोशिश कर रही थो तो सुनील वॉल्सन का नाम मेरे ज़हन में सबसे ऊपर था.
सुनील वॉल्सन ने ख़ुशी खुशी लंबी बातचीत की. बातचीत के दौरान उनकी आवाज़ में इस बात को लेकर कटुता का ज़रा भी पुट नज़र नहीं आया कि उस ऐतिहासिक टीम का हिस्सा होते हुए भी वे मैदान पर कोई मैच खेलने से चूक गए.
जब 14 सदस्यीय टीम के लिए 1983 में सुनील वॉल्सन का चयन हुआ तो वे उस समय इंग्लैंड में लीग क्रिकेट खेल रहे थे, डरहम कोस्ट लीग का हिस्सा थे. बुलावा आया तो उन्होंने सीधे लंदन में ही बाक़ी खिलाड़ियों को ज्वाइन किया.
उस सुनहरे दौर के बारे में याद करते हुए सुनील वॉल्सन बताते हैं, "विश्व कप जीतने की एक वजह तो ये थी कि प्रतियोगिता से पहले टीम से किसी को कोई उम्मीद नहीं थी. भारतीय टीम को अंडरडॉग कहना भी अंडरस्टेटमेंट होता. हम ये भी नहीं सोच सकते थे कि सेमीफ़ाइनल के भी आस-पास पहुँचेगे. टर्निंग प्वाइंट वहाँ आया जब शुरु में ही भारत ने वेस्टइंडीज़ को हरा दिया. वेस्टइंडीज़ को उस समय हराना नामुमिकन था. फिर लीग मैच में ऑस्ट्रेलिया को हराया. दरअसल टीम में बेहतरीन ऑल राउंडर थे और यही एक फ़र्क था टीम में."
लकी चार्म
विश्व विजेता टीम का हिस्सा होकर एक भी मैच न खेल पाना एक अजीब सी विसंगति थी- पास होकर भी दूर होने वाली विसंगति.
इस बात पर भी वॉल्सन ख़ुद पर चुटकी लेने से नहीं चूके,"ये तो उनकी ज़र्रानवाज़ी है वे मुझे लकी मानते हैं. पूरी प्रतियोगिता में भारतीय टीम के तीन खिलाड़ियों की पोज़िशन नहीं बदली- कप्तान, उपकप्तान और 12वां खिलाड़ी. गेंदबाज़ी- बल्लेबाज़ी में कई बदलाव हुए लेकिन 12वें खिलाड़ी के रूप में मेरी जगह स्थाई और पक्की थी. कुल मिलाकर बात यही है कि आप उन 14 खिलाड़ियों में शामिल थे."
वर्ल्ड कप में एक मैच था जब लग रहा था कि सुनील वॉल्सन मैदान पर आख़िरकर उतर पाएँगे.
वॉल्सन बताते हैं," वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ मैच था. रॉजर बिन्नी शायद थोड़ा अनफ़िट थे, हैमस्ट्रिंग मसल में खिचांव था. कप्तान ने मुझसे कहा कि शायद मुझे मैदान पर उतरना पड़े. लेकिन सुबह फ़िटनेस टेस्ट हुआ तो रॉजर बिन्नी फ़िट घोषित हुए. ये कोई बड़ा मुद्दा नहीं था."
अंडरडॉग की यही संज्ञा लिए जब टीम फ़ाइनल तक पहुंच गई तो टीम और प्रबंधन के दिमाग़ में क्या खलबली चल रही होगी? वॉल्सन याद करते हैं, "पीआर मान सिंह हमारे मैनेजर थे, और तो अलग से प्रबंधन से कोई नहीं था. जब फ़ाइनल में पहुँचे तो दरअसल हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं था. दबाव हमारे ऊपर नहीं बल्कि वेस्टइंडीज़ के ऊपर था. हमने 183 का स्कोर खड़ा किया, उसने बाद हमने सोचा कि बस दम लगाकर खेलते हैं और संघर्ष करते हैं. शुरुआती विकेट वाली बात थी- बस शुरू में विकेट मिले और वेस्टइंडीज़ पर दवाब बनने लगा. ग़ज़ब का मैच था वो."
जब मैने पूछा कि जब वो पल जब भारत ने विश्व जीत जीत तो मैदान पर क्या माहौल था तो सुनील वॉल्सन ने पल भर में पूरी तस्वीर खींच दी मानो कल की ही बात हो, "हम तो समझिए सातवें आसमान पर थे. मुझसे किसी ने हाल ही में पूछा था कि क्या हम लोगों ने मैदान पर लैप ऑफ़ हॉनर लिया था. लैप ऑफ़ हॉनर का तो सवाल ही नहीं था क्योंकि मैदान पर लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा था और खिलाड़ियों को प्वेलियिन भागना पड़ा."
जीत के टोटके
भारत का कोई तनावपूर्ण और अहम क्रिकेट मैच हो और अगर आप कुछ इस तरह के टोटके अपनाते हों कि जो जहाँ बैठा है वो वहीं बैठा रहेगा...तो ऐसा करने वाले आप अकेले नहीं है.
25 जून 1983 में लॉर्डस की बालकनी में बैठे सुनील वॉल्सन बताते हैं, " उस समय बॉलकनी में क्रिकेट अधिकारी और खिलाड़ी थे. सब कोई हर तरह का टोटका इस्तेमाल कर रहा था जैसे जो जहाँ बैठा हुआ था वो वहाँ से हिले नहीं और अगर कोई हिल जाए तो ज़बरदस्ती बिठा देते थे. वहाँ एनपीके साल्वे जी, राज साहब, टाइगर पटौदी, विश्वनाथ सब लोग थे. सबको था कि बस जीतना था. खिलाड़ी और ड्रेसिग रूम में अधिकारी ही नहीं दर्शक भी इस तरह के टोटके करते हैं. "
सुनील वॉल्सन से पूरी बातचीत के अंत में मैने कुछ हिचकिचाते और सकुचाते हुए पूछा कि क्या उस ऐतिहासिक प्रतियोगिता में एक भी मैच न खेलने पाने का रंज या टीस उनके मन में नहीं.
तपाक से जवाब आया, "मुझे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि मैं विश्व कप के किसी मैच में खेल नहीं पाया. सच्चाई ये है कि मैं 14 सदस्यीय टीम का हिस्सा था और भारत के उन 14 खिलाड़ियों ने ही वर्ल्ड कप जीताया. जब विश्व कप की बात होती है तो पूरी टीम की बात होती है न कि किसी एक खिलाड़ी की.मैं गर्व से कहता हूँ कि उन 14 खिलाड़ियों में मैं भी शामिल था "
यहाँ बात हो रही है सुनील वॉल्सन नाम के उस शख़्स की जो 1983 में भारतीय क्रिकेट की 14 सदस्यीय टीम में शामिल तो थे लेकिन उन्हें एक भी मैच खेलने का मौका नहीं मिला.
क्रिकेट विश्व कप जीतने की 25वीं सालगिरह पर जब मैं टीम के सदस्यों से बात करने की कोशिश कर रही थो तो सुनील वॉल्सन का नाम मेरे ज़हन में सबसे ऊपर था.
सुनील वॉल्सन ने ख़ुशी खुशी लंबी बातचीत की. बातचीत के दौरान उनकी आवाज़ में इस बात को लेकर कटुता का ज़रा भी पुट नज़र नहीं आया कि उस ऐतिहासिक टीम का हिस्सा होते हुए भी वे मैदान पर कोई मैच खेलने से चूक गए.
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उस सुनहरे दौर के बारे में याद करते हुए सुनील वॉल्सन बताते हैं, "विश्व कप जीतने की एक वजह तो ये थी कि प्रतियोगिता से पहले टीम से किसी को कोई उम्मीद नहीं थी. भारतीय टीम को अंडरडॉग कहना भी अंडरस्टेटमेंट होता. हम ये भी नहीं सोच सकते थे कि सेमीफ़ाइनल के भी आस-पास पहुँचेगे. टर्निंग प्वाइंट वहाँ आया जब शुरु में ही भारत ने वेस्टइंडीज़ को हरा दिया. वेस्टइंडीज़ को उस समय हराना नामुमिकन था. फिर लीग मैच में ऑस्ट्रेलिया को हराया. दरअसल टीम में बेहतरीन ऑल राउंडर थे और यही एक फ़र्क था टीम में."
लकी चार्म
इस बात पर भी वॉल्सन ख़ुद पर चुटकी लेने से नहीं चूके,"ये तो उनकी ज़र्रानवाज़ी है वे मुझे लकी मानते हैं. पूरी प्रतियोगिता में भारतीय टीम के तीन खिलाड़ियों की पोज़िशन नहीं बदली- कप्तान, उपकप्तान और 12वां खिलाड़ी. गेंदबाज़ी- बल्लेबाज़ी में कई बदलाव हुए लेकिन 12वें खिलाड़ी के रूप में मेरी जगह स्थाई और पक्की थी. कुल मिलाकर बात यही है कि आप उन 14 खिलाड़ियों में शामिल थे."
वर्ल्ड कप में एक मैच था जब लग रहा था कि सुनील वॉल्सन मैदान पर आख़िरकर उतर पाएँगे.
वॉल्सन बताते हैं," वेस्टइंडीज़ के ख़िलाफ़ मैच था. रॉजर बिन्नी शायद थोड़ा अनफ़िट थे, हैमस्ट्रिंग मसल में खिचांव था. कप्तान ने मुझसे कहा कि शायद मुझे मैदान पर उतरना पड़े. लेकिन सुबह फ़िटनेस टेस्ट हुआ तो रॉजर बिन्नी फ़िट घोषित हुए. ये कोई बड़ा मुद्दा नहीं था."
अंडरडॉग की यही संज्ञा लिए जब टीम फ़ाइनल तक पहुंच गई तो टीम और प्रबंधन के दिमाग़ में क्या खलबली चल रही होगी? वॉल्सन याद करते हैं, "पीआर मान सिंह हमारे मैनेजर थे, और तो अलग से प्रबंधन से कोई नहीं था. जब फ़ाइनल में पहुँचे तो दरअसल हमारे पास खोने के लिए कुछ नहीं था. दबाव हमारे ऊपर नहीं बल्कि वेस्टइंडीज़ के ऊपर था. हमने 183 का स्कोर खड़ा किया, उसने बाद हमने सोचा कि बस दम लगाकर खेलते हैं और संघर्ष करते हैं. शुरुआती विकेट वाली बात थी- बस शुरू में विकेट मिले और वेस्टइंडीज़ पर दवाब बनने लगा. ग़ज़ब का मैच था वो."
जब मैने पूछा कि जब वो पल जब भारत ने विश्व जीत जीत तो मैदान पर क्या माहौल था तो सुनील वॉल्सन ने पल भर में पूरी तस्वीर खींच दी मानो कल की ही बात हो, "हम तो समझिए सातवें आसमान पर थे. मुझसे किसी ने हाल ही में पूछा था कि क्या हम लोगों ने मैदान पर लैप ऑफ़ हॉनर लिया था. लैप ऑफ़ हॉनर का तो सवाल ही नहीं था क्योंकि मैदान पर लोगों का सैलाब उमड़ पड़ा था और खिलाड़ियों को प्वेलियिन भागना पड़ा."
जीत के टोटके
25 जून 1983 में लॉर्डस की बालकनी में बैठे सुनील वॉल्सन बताते हैं, " उस समय बॉलकनी में क्रिकेट अधिकारी और खिलाड़ी थे. सब कोई हर तरह का टोटका इस्तेमाल कर रहा था जैसे जो जहाँ बैठा हुआ था वो वहाँ से हिले नहीं और अगर कोई हिल जाए तो ज़बरदस्ती बिठा देते थे. वहाँ एनपीके साल्वे जी, राज साहब, टाइगर पटौदी, विश्वनाथ सब लोग थे. सबको था कि बस जीतना था. खिलाड़ी और ड्रेसिग रूम में अधिकारी ही नहीं दर्शक भी इस तरह के टोटके करते हैं. "
सुनील वॉल्सन से पूरी बातचीत के अंत में मैने कुछ हिचकिचाते और सकुचाते हुए पूछा कि क्या उस ऐतिहासिक प्रतियोगिता में एक भी मैच न खेलने पाने का रंज या टीस उनके मन में नहीं.
तपाक से जवाब आया, "मुझे इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि मैं विश्व कप के किसी मैच में खेल नहीं पाया. सच्चाई ये है कि मैं 14 सदस्यीय टीम का हिस्सा था और भारत के उन 14 खिलाड़ियों ने ही वर्ल्ड कप जीताया. जब विश्व कप की बात होती है तो पूरी टीम की बात होती है न कि किसी एक खिलाड़ी की.मैं गर्व से कहता हूँ कि उन 14 खिलाड़ियों में मैं भी शामिल था "
Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:20 [IST]
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