पिछड़े गांव को नई पहचान दी, खेतों में धान भी लगाए, ऐसा रहा लवलीना सफर
असम : टोक्यो ओलंपिक में लवलीना बोरगोहेन ने वो कर दिखाया जिसे पूरा करने का सपना हर एथलीट ने संजोया होता है। लवलिना भले ही विश्व चैंपियन तुर्की की बुसेनाज सुरमेनेली के खिलाफ 69 किग्रा महिला मुक्केबाजी सेमीफाइनल बाउट हार गईं, लेकिन उन्होंने भारत के खाते में मेडल डाला। उन्होंने बाॅक्सिंग में ब्राॅन्ज मेडल जीता। वह मैरी काॅम के बाद ओलंपिक में मेडल जीतने वाली दूसरी भारतीय महिला बनीं। इसके बाद उन्होंने चारों तरफ से तारीफें मिलीं। हालांकि लवलीना की कामयाबी ने ना सिर्फ मेडल दिलाया, बल्कि असम के उस पिछड़े गांव को भी नई पहचान दिलाई जो अब तक कुई सुविधाओं से वंचित था।

पिछड़े गांव को नई पहचान दी
लवलीना की बदाैलत उनके गांव को नई पहचान मिली है। आप यह जानकर हैरान रह जाएंगे कि लवलीना के गांव का रास्ता कच्चा था, लेकिन जैसे ही असम सरकार को पता लगा कि मेडल आ गया है तो उन्होंने सबसे पहले लवलीना के गांव की सड़क पक्की करने के लिए तुरंत एक्शन लिया। अब इस गांव में पक्की सड़क का काम जोरों पर चला हुआ है। गोलघाट जिले के बारोमुथिया गांव की स्थिति बेहद खराब थी, लेकिन अब पूरे गांव में खुशी का माहाैल है। टोक्यो ओलंपिक में लवलीना की वीरता के कुछ घंटे बाद गांव को कंक्रीट की सड़क से जोड़ दिया गया है। गांव में अब चीजें बदल रही हैं।

खेतों में धान भी लगाए
ओलंपिक कांस्य पदक जीतने के लिए धान के खेत में काम करना
पिछले साल लॉकडाउन के दौरान लवलीना धान के खेतों में अपने पिता टिकेन बोरगोहेन की मदद कर रही थीं। उनके पिता का कहना है कि इससे उसे अपने अतीत से तालमेल बिठाने में मदद मिलती है। टिकन बोर्गोहेन ने बताया, "धान के खेत में काम करना उसके लिए कोई नई बात नहीं है। वह लंबे समय से ऐसा करती आ रही है। हमने उसे ऐसा न करने के लिए कहा है, लेकिन वह कहती है कि इससे उसे अपने अतीत से जुड़े रहने में मदद मिलती है।"
राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, असम के मुख्यमंत्री ने दी लवलीना को कांस्य पदक जीतने की बधाई

ऐसी है लवलीना की कहानी
लवलीना ने ओलंपिक पदक जीतने के लिए कई कठिनाइयों का सामना किया है। पिछले साल जुलाई में, जब उनके अधिकांश हमवतन पटियाला में राष्ट्रीय शिविर में पहुंचे, तो लवलीना अपनी मां मैमोन की देखभाल में व्यस्त थीं, जिनका किडनी प्रत्यारोपण हुआ था। फिर लवलीना कोरोना की चपेट में आ गईं, जिस कारण वह अभ्यास भी नहीं कर सकीं। हालांकि टोक्यो 2020 में उन्होंने अपना दम दिखाया। 2009 में लवलीना के कोच कोच प्रशांत कुमार दास ने बताया कि कैसे संघर्ष करते लवलीना आगे बढ़ीं। उन्होंने कहा, "यह कल्पना करना मुश्किल था कि बरपाथर से 3-4 किलोमीटर दूर, ये सभी लड़कियां पूरे रास्ते पैडल मारती थीं, कभी-कभी वे चोट के निशान के साथ लौटती थीं, सड़क में पत्थर पड़े हुए होते थे और सफर करना आसान नहीं होता था।।" लवलीना के पिता एक छोटे से चाय के खेत के मालिक हैं। उन्होंने उम्मीद है कि अब से चीजें बेहतर होंगी और आने वाले वर्षों में गांव कई तरक्की करेगा।
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