मिल्खा सिंह से बहुत पहले 'उड़ने' वाला वो एथलीट, जिसने ओलंपिक में खोला था भारत के पदकों का खाता

नई दिल्लीः इतिहास के मशहूर राजा सोलोमन की कहानी का एक रोचक किस्सा दो औरतों के झगड़े की कहानी का है जिसमें वे एक ही बच्चे पर दावा करती हुए राजा के दरबार तक आई। एक तरफ न्याय करने के लिए मशहूर राजा, दूसरी और एक बच्चा और दावा करने वाली दो मां। बच्चा दोनों में बराबर कैसे बांटा जाए, सच कैसे पता चले, कौन सच्चा कौन झूठा? आखिर राजा ने बच्चे के दो टुकड़े कराने का फैसला किया ताकि आधा-आधा हिस्सा दोनों औरतों में बांट दिया जाए लेकिन तभी एक औरत ने हाथ जोड़ लिए- "बच्चे को मत मारो, मैं दूसरी औरत को इसे देने के लिए तैयार हूं।" बस यही फैसला हो गया कि असली मां यही है।

ये कहानी तो सुलझ गई लेकिन भारत के पहले और महानतम ओलंपिक एथलीट माने जाने वाले नॉर्मन प्रिचर्ड का किस्सा इससे भी ज्यादा उलझा हुआ है। उन पर भारत अपना दावा करे या ब्रिटेन, या नॉर्मन प्रिचर्ड खुद क्या चाहते अगर आज वो जिंदा होते? इन सवालों से शुरू होती है 1900 के पेरिस ओलंपिक की स्प्रिंट प्रतियोगिता में दो सिल्वर जीतने वाले नॉर्मन प्रिचर्ड की कहानी।

बंगाल में जन्म से शुरू होती है प्रिचर्ड की रोमांचक कहानी-

बंगाल में जन्म से शुरू होती है प्रिचर्ड की रोमांचक कहानी-

नॉर्मन प्रिचर्ड का नाम पढ़ते ही आप समझ गए होंगे यह विलायती नाम है। नॉर्मन प्रिचर्ड का जन्म बंगाल में ब्रिटिश कॉलोनी में रहने वाले अंग्रेज माता-पिता के यहां 1877 में हुआ था। बंगाल में ही उनका बचपन बीता, यहीं पर उनकी पढ़ाई-लिखाई हुई और उन्होंने कोलकाता के खेल मैदान पर ही कई सारे रिकॉर्ड बनाए। उन्होंने बंगाल और ऑल इंडिया लेवल पर कई रिकॉर्ड सेट किए। प्रतिभा ऐसी थी कि पेरिस ओलंपिक 1900 में 200 मीटर रेस, 200 मीटर हर्डल रेस में सिल्वर हासिल किए। वे 110 मीटर हर्डल्स में अनलकी रहे वर्ना एक और मेडल उनके हिस्से लिखा जाता। कोई भी भारतीय धावक 121 साल बाद यह रिकॉर्ड नहीं तोड़ पाया है। सबसे चर्चित मिल्खा सिंह 1960 में ब्रॉन्ज जीतने में नाकामयाब रहे थे तो वहीं उड़नपरी पीटी ऊषा भी 1984 में तीसरे स्थान से कुछ कदम दूर रही।

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पदक पर भारत का दावा, कितना झूठा, कितना सच्चा-

पदक पर भारत का दावा, कितना झूठा, कितना सच्चा-

अब ऐसे दिग्गज एथलीट पर भारत अपना दावा क्यों छोड़ना चाहेगा। इसी वजह से तमाम विवादों के बावजूद इंडियन ओलंपिक एसोसिएशन नॉर्मन प्रिचर्ड को भारतीय एथलीट ही बताती है जबकि कई रिसर्च यह साबित करती हैं कि नॉर्मन प्रिचर्ड पेरिस में ब्रिटिश एसोसिएशन की ओर से गए थे। दूसरी बात है कि ओलंपिक में तब भारत का प्रतिनिधित्व ही नहीं था क्योंकि यह तो 1928 में मिलना शुरू हुआ। पर यह भी सही नहीं है कि नॉर्मन प्रिचर्ड ब्रिटेन को रिप्रजेंट कर रहे थे क्योंकि तब ओलंपिक में अधिकतर एथलीट व्यक्तिगत तौर पर भाग लेते थे और नॉर्मन प्रिचर्ड ने भी ऐसे ही हिस्सेदारी की थी।

आज एक आम सहमित में नॉर्मन प्रिचर्ड के मेडल को भारत और ब्रिटेन दोनों के क्रेडिट में माना जाता है। यही इस पेचीदा मसले पर हल निकालना का डिप्लोमेटिक तरीका था। ध्यान देने वाली बात यह है कि नॉर्मन प्रिचर्ड ने ना केवल भारत के लिए पहला ओलंपिक पदक जीता बल्कि यह ओलंपिक में किसी एशियन कंट्री का भी पहला मेडल था।

धावक के अलावा अन्य खेलों में भी जबरदस्त थे नॉर्मन प्रिचर्ड-

धावक के अलावा अन्य खेलों में भी जबरदस्त थे नॉर्मन प्रिचर्ड-

इस बात पर भी पूरे विवाद हैं कि नॉर्मन प्रिचर्ड को एक भारतीय एथलीट माना जाएगा या नहीं। उनका जन्म निश्चित तौर पर भारत में हुआ, शिक्षा भी यही से पूरी की, कई रिकॉर्ड भारत में ही खेलते हुए बनाए। उनके पास भारत में जन्म का बर्थ सर्टिफिकेट था और वे पेरिस भी भारत के दस्तावेज पर ही गए थे। उस दस्तावेज को आज के पासपोर्ट की तरह से देखा जा सकता है। पेरिस से आने के बाद वे भारतीय फुटबॉल में भी सक्रिय रहे जहां उन्होंने प्रशासन में काम संभाला। जी हां, नॉर्मन प्रिचर्ड एक मंजे हुए ऑलराउंडर थे। वे जवानी के दिनों में फुटबॉल में भी काफी बढ़िया थे। उनके नाम भारतीय फुटबॉल में सबसे पहली हैट्रिक मारने का रिकॉर्ड भी है जो उन्होंने 1899 में बनाया था। उन्होंने कई ट्रैक प्रतियोगिताओं के अलावा रग्बी में भी खूब खेल दिखाया।

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खेल के बाद हॉलीवुड में भी भारत का नाम चमकाया-

खेल के बाद हॉलीवुड में भी भारत का नाम चमकाया-

नॉर्मन प्रिचर्ड के लीजेंडरी किस्से यहीं पर समाप्त नहीं होते क्योंकि उन्होंने बाद में खुद को इंग्लैंड शिफ्ट कर लिया था, साथ ही जूट का व्यापार भी किया जो उस समय काफी प्रचलित था। इंग्लैंड से ही उनकी एक्टिंग करने में भी रूचि जगी और उनका एक्टिंग सफर लंदन से शुरू होकर अमेरिका में हॉलीवुड पर खत्म हुआ। इसी वजह से उनको हॉलीवुड का पहला अभिनेता माना जाता है जिसका जन्म भारत में हुआ। आज भी उनको हॉलीवुड में भारत का पहला रिप्रजेंटेटिव माना जाता है। उनकी मृत्यू 54 साल की उम्र में लॉस एजिल्स में हुई। आज IAAF कहता है कि 1900 में नॉर्मन प्रिचर्ड ब्रिटेन के लिए भागे थे तो वहीं IOC के रिकॉर्ड में दर्ज है कि उन्होंने वह दौड़ भारत के लिए लगाई थी।

तो यह बात कुछ ऐसी रही कि नॉर्मन प्रिचर्ड को किंग सोलोमन की कहानी की तरह कोई एक 'मां' तो नहीं मिल पाई लेकिन वे ऐसे 'बेटे' साबित हुए जिन पर भारत और ब्रिटेन को हमेशा गर्व रहेगा।

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Story first published: Saturday, June 26, 2021, 17:00 [IST]
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