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लंदन ओलंपिक 2012 में सूजी आंख के साथ रेपचेज राउंड में योगेश्वर दत्त का कमाल

Olympics Special: when Yogeshwar Dutt Wins Bronze medal in London 2012 Olympics | वनइंडिया हिंदी

नई दिल्लीः भारत के रेसलर योगेश्वर दत्त ने अपने करियर में कईं ऊंचाइयां हासिल की हैं लेकिन उनको घर-घर में जाना पहचाना नाम बनाने में लंदन ओलंपिक 2012 ने मदद की। इन ओलंपिक खेलों में योगेश्वर दत्त ने 60 किलोग्राम फ्रीस्टाइल कैटेगरी में भारत को ब्रॉन्ज मेडल दिलाया था। यह ना भारतीय लोगों की आकांक्षाओं का मेडल था बल्कि योगेश्वर दत्त की खून पसीने और आंसुओं से सींचे गए सपनों का पूरा होना भी था। हमारे देश के अधिकतर पहलवान हरियाणा से निकलते हैं और योगेश्वर दत्त भी अपवाद नहीं है वह हरियाणा के सोनीपत में भैंसवाल कलां नाम के गांव में पैदा हुए और अपने इलाके में बलराज पहलवान से काफी प्रभावित थे जिसके बाद उन्होंने रेसलिंग में आने का फैसला किया।

लिएंडर पेस के मेडल ने ओलंपिक में कुछ करने की प्रेरणा दी-

यह भी दिलचस्प बात है कि योगेश्वर दत्त को ओलंपिक में मेडल जीतने की प्रेरणा पहलवानी से नहीं मिली बल्कि टेनिस के स्टार खिलाड़ी लिएंडर पेस के खेल से मिली। जब पेस ने 1996 के अटलांटा ओलंपिक में कांस्य पदक जीता था तब योगेश्वर दत्त केवल 13 साल के थे और उन्होंने भी अपने देश के लिए ऐसा ही कारनामा दोहराने का संकल्प ले लिया था। असल में लिएंडर पेस द्वारा जीता गया वह पदक भारतीय खेलों में बहुत ही महत्वपूर्ण था क्योंकि तब कई युवाओं ने उस मेडल के जरिए ओलंपिक के क्रेज को लोकप्रिय स्तर पर पहचानना शुरू किया था। लिएंडर पेस द्वारा मेडल जीतने के 8 साल बाद योगेश्वर दत्त की ओलंपिक की यात्रा एथेंस 2004 में शुरू हुई लेकिन उनके पास अपने कौशल को आजमाने के लिए बहुत ज्यादा अनुभव नहीं था।

2008 बीजिंग ओलंपिक तक आते-आते उनको लय हासिल होने शुरू हो गई थी। उन्होंने बीजिंग ओलंपिक का टिकट पाने से पहले कॉमनवेल्थ में गोल्ड जीता, एशियन गेम्स में गोल्ड जीता, एशियन चैंपियनशिप में भी गोल्ड जीता और वह देश के संभावनाशील पहलवान बनने की ओर अग्रसर हो गए। आज एक पहलवान के कत्ल के आरोप में जेल की हवा खा रहे सुशील कुमार तब राष्ट्रीय हीरो बनकर उभरे थे क्योंकि उन्होंने बीजिंग में 66 किलोग्राम भार वर्ग में कांस्य पदक बटोरा था जीता था। योगेश्वर इस प्रतियोगिता में क्वार्टर फाइनल तक ही पहुंच पाए थे लेकिन सुशील कुमार का मेडल योगेश्वर के लिए सपने को पूरा रखने में प्रेरणा देने में बहुत सहायक साबित हुआ।

लंदन की राह आसान नहीं थी-

जोगेश्वर के लिए 2008 के बाद हालांकि रेस आसान नहीं थी क्योंकि उन्होंने 2009 में अपना घुटना चोटिल करा लिया और कई लोगों ने कहा कि उनका कैरियर शायद अब समापन की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने कॉमनवेल्थ गेम में वापसी की लेकिन उनकी कमर में दिक्कत चल रही थी हालांकि ओलंपिक मेडल जीतने की उनकी उम्मीद नहीं टूटी थी। 2012 लंदन ओलंपिक के साल में योगेश्वर दत्त ने एशियन रेसलिंग चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीतकर खुद को महा प्रतियोगिता के लिए चार्ज कर लिया।

ओलंपिक का मेन इवेंट-

मुख्य इवेंट में, योगेश्वर दत्त ने अपने पहले मुकाबले में बुल्गारिया के अनातोली इलारियोनोविच गाइडिया को 3-1 से हराकर विजयी शुरुआत की। प्री-क्वार्टर फाइनल में, हालांकि, भारतीय पहलवान रूस के बेसिक कुदुखोव से हार गए जो चार बार के विश्व चैंपियन थे।

लेकिन कुदुखोव के फाइनल में पहुंचने के साथ, योगेश्वर दत्त ने रेपेचेज राउंड के माध्यम से ओलंपिक पदक पर एक और शॉट लगाया।

कुदुखोव के खिलाफ मैच में आंख में चोट लगने के बाद, योगेश्वर दत्त को 45 मिनट के भीतर दुनिया के कुछ सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ियों से निपटना पड़ा, क्योंकि उनकी दाहिनी आंख पर काफी सूजन के कारण उनकी नजरें गंभीर रूप से सीमित थी - किसी भी तरह से आसान काम नहीं था।

योगेश्वर दत्त ने क्रमशः पहले और दूसरे रेपेचेज दौर में प्यूर्टो रिको के फ्रैंकलिन गोमेज और ईरान के मसूद एस्माईलपुर को हराकर उत्तर कोरिया के री जोंग-म्योंग के खिलाफ कांस्य पदक का मुकाबला जीता।

लंदन ओलंपिक के कई साल बीत जाने के बाद योगेश्वर दत्त अपने करियर की ओर देखते हैं तो पातें हैं कि जिंदगी में जो भी मिला वह सब पहलवानी की वजह से मिला लेकिन लंदन ओलंपिक 2012 में उनके द्वारा जीता गया पदक उनके जीवन का सबसे बेस्ट पल रहेगा।

Story first published: Friday, July 2, 2021, 12:57 [IST]
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