भारत के लिए यादगार खेल
मुकेश शर्मा
बीबीसी संवाददाता, ग्वांगजो से
तीन हज़ार मीटर स्टीपलचेज़ में सुधा सिंह ने स्वर्ण जीता.
ग्वांगजो एशियाई खेलों में सबसे ज़्यादा सोना एथलेटिक्स में मिला है.
इसके अलावा पिछले खेलों के मुक़ाबले मुक्केबाज़ी में भारत के प्रदर्शन में सबसे ज़बरदस्त सुधार हुआ.
टेनिस में भारत के सबसे मशहूर सितारों लिएंडर पेस और महेश भूपति के नहीं होने के बावजूद भारत ने अच्छा प्रदर्शन किया और दो स्वर्ण, एक रजत और दो काँस्य पदक जीते.
पिछली बार एथलेटिक्स में सिर्फ़ महिलाओं की चार गुणा चार सौ मीटर में भारत के नाम स्वर्ण हुआ था मगर इस बार एथलेटिक्स की शुरुआत वाले दिन ही दो स्वर्ण अपनी झोली में डाल लिए.
महिलाओं की 10 हज़ार मीटर में प्रीजा श्रीधरन और फिर तीन हज़ार मीटर स्टीपलचेज़ में सुधा सिंह ने ये स्वर्ण जीते.
उनके अलावा चार सौ मीटर बाधा दौड़ में महिलाओं और पुरुषों के वर्ग में अश्विनी चिदानंद अक्कुनजी और जोसेफ़ अब्राहम का स्वर्ण पदक जीतना भारतीय खेल प्रेमियों के लिए सुखद आश्चर्य रहा.
एथलेटिक्स के अलावा अलग अलग वर्ग के दौड़ में भी भारत ने अपना परचम लहराया.
महिलाओं की चार गुणा चार सौ मीटर की टीम ने अपना प्रदर्शन बरक़रार रखा और स्वर्ण एक बार फिर भारत को मिला.
दोहा एशियाई खेलों में निशानेबाज़ी में भारत को तीन स्वर्ण मिले थे और वो भी पिस्टल के मुक़ाबलों में जबकि ग्वांगजो में भारत को सिर्फ़ एक स्वर्ण मिला और वो भी पिस्टल या राइफ़ल में नहीं जहाँ भारत का बोलबाला रहता है बल्कि ट्रैप शूटिंग में.
रोंजन सोढ़ी के स्वर्ण को छोड़कर गगन नारंग, अभिनव बिंद्रा और विजय कुमार जैसे बड़े-बड़े नाम रजत या काँस्य तक ही सिमट गए.
पिछले एशियाई खेलों में सिर्फ़ दो काँस्य पदक लाने वाले मुक्केबाज़ों ने इस बार भारत को कुल नौ पदक दिलाए और उसमें भी दो स्वर्ण थे.
अब तक काँस्य पदक जीतते आ रहे विजेंदर सिंह और 60 किलोग्राम वर्ग में विकास कृष्ण ने सोने का तमग़ा जीता.
बजरंग लाल ठाकर को स्क्ल्स एकल में स्वर्ण मिला.
मगर भारत को सुरंजय सिंह और एमसी मैरीकॉम के सेमीफ़ाइनल में ही हार जाने से काफ़ी निराशा भी हुई क्योंकि ये दोनों स्वर्ण के ज़बरदस्त दावेदार माने जा रहे थे.
भारत को इस बार रोइंग ने पाँच पदक दिलाए जिसमें बजरंग लाल टाखर का पुरुषों के एकल स्कल्स में स्वर्ण भी शामिल था.
पंकज आडवाणी ने बिलियर्ड्स में स्वर्ण बरक़रार रखा और इन खेलों का पहला स्वर्ण भारत को दिलाया.
शतरंज में भारत को पिछले एशियाई खेलों में जहाँ दो स्वर्ण मिले थे वहीं इस बार उसे बड़े नामों की ग़ैर-मौजूदग़ी में दो काँस्य पदकों से ही संतोष करना पड़ा.
टेनिस में लिएंडर पेस और महेश भूपति लंदन में मास्टर्स टूर्नामेंट के चलते ग्वांगजो नहीं पहुँचे.
सोमदेव देववर्मन् ने एकल और युगल में स्वर्ण जीता.
ऐसे में सोमदेव देववर्मन् ने एकल और युगल की ज़िम्मेदारी बख़ूबी सँभाली.
उन्होंने एकल में तो स्वर्ण जीता ही, पुरुष युगल में सनम कृष्ण सिंह के साथ मिलकर भारत को एक और स्वर्ण दिलाया.
सानिया मिर्ज़ा अच्छा खेल दिखाने के बावजूद एकल में सेमीफ़ाइनल में हार गईं और मिश्रित युगल में विष्णु वर्द्धन के साथ उन्हें फ़ाइनल में हार का सामना करना पड़ा.
तीरंदाज़ी में भारतीय पुरुष और महिला टीमों को काँस्य पदक मिले मगर तरुणदीप रॉय फ़ाइनल तक पहुँचकर हार गए.
आशीष कुमार ने भारत को पहली बार एशियाई खेलों में जिम्नास्टिक्स में पदक दिलाया भले ही वो काँस्य था.
इसी तरह तैराकी में भारत को 24 साल बाद कोई पदक मिला जबकि वीर धवल खाड़े ने पुरुषों की 50 मीटर बटरफ़्लाई स्पर्द्धा में काँस्य जीता.
भारतीय हॉकी टीमें स्वर्ण जीतकर सीधे लंदन ओलंपिक के लिए क्वॉलिफ़ाई करने के इरादे से आई थीं मगर महिला टीम तो चौथे स्थान पर रही जबकि पुरुष टीम सेमीफ़ाइनल में मलेशिया से हार गई और बाद में काँस्य जीत सकी.
कबड्डी पर भारत के प्रभुत्त्व को कोई चुनौती नहीं दे पा रहा है.
कबड्डी पर भारत के प्रभुत्त्व को कोई चुनौती नहीं दे पा रहा है. बीजिंग एशियाड के दौरान 1990 में ये खेल शामिल हुआ था और तब से आज तक भारत ही स्वर्ण जीतता रहा है. इस बार महिलाओं के वर्ग में भी ये खेल शामिल था और वहाँ भी स्वर्ण भारत को ही मिला.
राष्ट्रमंडल खेलों में अच्छे प्रदर्शन के बाद कुश्ती से भारत को काफ़ी उम्मीदें थीं मगर अलका तोमर और सुशील कुमार जैसे प्रमुख पहलवानों की ग़ैर-मौजूदगी में भारत सिर्फ़ तीन काँस्य पदक ही जीत सका.
कुल मिलाकर भारत ने एशियाड में आज तक का सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया और 14 स्वर्ण, 17 रजत और 33 काँस्य पदक जीतकर पदक तालिका में छठा स्थान लिया.
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