कहीं गरिमाविहीन न हो जाएं राष्ट्रीय खेल पुरस्कार
नई दिल्ली। देश में राष्ट्रीय स्तर पर दिए जाने वाले पुरस्कारों को लेकर हर बार कोई न कोई विवाद खड़ा हो ही जाता है। पुरस्कार पाने की अशोभनीय ललक, गुटबाजी और पुरस्कार दिए जाने के लिए मानकों में ढील बरतने के कारण राष्ट्रीय पुरस्कारों की गरिमा में लगातार गिरावट आई है।
देश के सर्वोच्च खेल सम्मान 'खेल रत्न' के लिए खिलाड़ियों को भी खेल भावना दरकिनार कर ऐसा करते हुए देखा जाता है। पुरस्कारों के लिए चुने गए खिलाड़ियों की बुराई और अपनी उपलब्धियों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करना लगभग हर खेल पुरस्कारों से जुड़ गया है।
अगर कोई वाजिब शिकायत के साथ आगे आता भी है, तो कुछ अन्य लोग राजनीतिक गोलबंदियों के जरिए पुरस्कार समितियों पर निर्णय बदलने के लिए दबाव बनाने लगते हैं।
विवादों में कई पुरस्कार
इसी सप्ताह के शुरू में वर्ष 2013 के लिए घोषित किए गए पुरस्कार भी इस तरह के विवाद से बच नहीं सके। हमेशा की तरह अनदेखी किए जाने के आरोप और पुरस्कारों से वंचित रह गए खिलाड़ियों की गोलबंदी देखने को मिली। कुल मिलाकर इसे विवाद का ही नतीजा कहेंगे कि पुरस्कार समिति अगले सप्ताह फिर से बैठक करने वाली है, ताकि अपनी गलती सुधारते हुए मुक्केबाज मनोज कुमार को अर्जुन पुरस्कार के लिए चुना जा सके।
लिपिकीय गलती से ग्लासगो राष्ट्रमंडल खेलों के स्वर्ण पदक विजेता मनोज कुमार को डोपिग का दोषी बताया गया था, और इसी वजह से पुरस्कार समिति ने उनके नाम पर विचार नहीं किया था।
वास्तव में इस वर्ष कपिल देव की अध्यक्षता में पुरस्कार समिति ने बिल्कुल सही निर्णय करते हुए किसी भी खिलाड़ी को खेल रत्न न देने का फैसला किया। दूसरी ओर कुछ विचारकों का मानना है कि खेल रत्न के लिए देश के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी को चुना जाना चाहिए न कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर खेल में उसकी विशेषज्ञता देखी जाए। इस तर्क के आधार पर टेनिस स्टार सोमदेव देववर्मन को खेल रत्न दिए जाने की पैरवी की गई।
कंधे की चोट के कारण लगभग एक वर्ष तक कोर्ट से बाहर रहने के बाद सोमदेव ने वापसी करते हुए एटीपी वरीयता सूची में शीर्ष 100 में जगह बनाने में सफलता पाई। हालांकि वह किसी भी ग्रैंड स्लैम टेनिस टूर्नामेंट में पहले दौर से आगे नहीं बढ़ पाए।
पूनिया और सिंधु भी थे लिस्ट में
खेल रत्न की दौड़ में इस बार एथलीट कृष्णा पूनिया और देश की नई बैडमिंटन स्टार बनकर उभरीं पी. वी. सिंधु के साथ ग्लासगो राष्ट्रमंडल में चक्का फेंक में स्वर्ण पदक लाने वाले विकास गौड़ा भी शामिल थे। लेकिन समिति का मानना था कि सिंधु और गौड़ा के पास अभी और भी मौके हैं तो गौड़ा इंचियोन में होने वाले आगामी एशियाई खेलों में अपने दावे को और मजबूत कर सकते हैं।
देश के दिग्गज धावक मिल्खा सिंह का खेल रत्न से कमतर कोई खेल पुरस्कार लेने से इनकार करना तो फिर भी जायज था और तत्कालीन खेल मंत्री से उनकी खटपट को भी समझा जा सकता है। 2002 में खेल रत्न न दिए जाने पर हाय-तौबा मचाने वाली अंजली भागवत ने आखिरकार पिछले वर्ष पुरस्कार समिति के सदस्य के तौर पर साथी निशानेबाज रंजन सोढ़ी का ही पक्ष लिया और एथलीट पूनिया के दावे पर विचार तक नहीं किया गया।
हालांकि ऐसा नहीं कहा जा सकता कि सोढ़ी खेल रत्न के हकदार नहीं थे या पूनिया का दावा कमजोर था, लेकिन इसे लेकर दिए गए विवादित बयानों ने खेल के सर्वोच्च सम्मान की गरिमा जरूर कम की। सही तो यह होगा कि पुरस्कारों के लिए चुने गए खिलाड़ियों के लिए गलत बयानी करने वाले और विवाद खड़ा करने वाले लोगों को सीधे-सीधे काली सूची में डाल दिया जाए।
फिर क्या हो पुरस्कार का आधार
वास्तव में खेल रत्न किसी खिलाड़ी को पूरे करियर के दौरान किए गए सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन के आधार पर ही दिया जाना चाहिए, न कि कुछ-एक बड़ी सफलताओं के लिए। ऐसा भी देखा गया है कि खेल रत्न से पुरस्कृत होने के बाद खिलाड़ी कुछ खास नहीं कर पाए।
1991-92 में खेल रत्न पुरस्कार की स्थापना के बाद से अब तक सिर्फ दो बार किसी भी खिलाड़ी को यह पुरस्कार नहीं दिया गया, जबकि तीन बार दो-दो खिलाड़ियों को संयुक्त रूप से प्रदान किया गया।
इस वर्ष पुरस्कारों का निर्णय करने के लिए गठित की गई समिति में मीडिया से शामिल एक सदस्य को लेकर हितों के टकराव की बात सामने आने के बाद इस पर भी विचार किया जाना चाहिए कि क्या सरकार प्रायोजित पुरस्कारों का निर्णय करने के लिए समिति में मीडिया सदस्यों को शामिल किया जाना चाहिए। हालांकि इस पर अभी विवाद बना हुआ है।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 13:03 [IST]
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