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आईपीएल में पैसा, प्रतिभा और जीत

प्रदीप मैगज़ीन

वरिष्ठ खेल पत्रकार

चैम्पियंस लीग में टीमों के प्रदर्शन को देखते हुए ये नज़र आता है कि बेहतरीन प्रितिभाओं को पैसे के ज़ोर पर अगर एक साथ ला खड़ा किया जाए तो इससे जीत सुनिश्चित नहीं होती.

आईपीएल की बेहतरीन टीमें जिन पर उनके मालिकों ने बहुत ही ज़्यादा पैसे ख़र्च किए हैं उन्हें हारते देखा जा रहा है. कभी कभी तो वे दूसरे देशों की किसी राज्य टीम से भी काफ़ी आसानी से हार रही हैं जिन में कोई स्टार खिलाड़ी मौजूद नहीं है.

मुझे लगता है कि ऐसे में क्या फ़्रैंचाईज़ी इस बात पर दुबारा नहीं सोचेंगे कि खिलाड़ियों की अगली नीलामी में वे किस क़ीमत पर खिलाड़ियों की बोली लगाएंगे?

अगर बुश रेंजर्स रॉयल चैलेंजर्स को हरा सकती है और त्रिनिदाद एण्ड टोबैगो डेक्कन चार्जर्स को बाहर कर सकती है तो क्या ज़रूरत है इतनी नामचीन प्रतिभाओं को इतने सारे पैसे में ख़रीदने की?

ये बातें मेरे ज़ेहन में संतोष देसाई का लेख पढ़ने के बाद आई जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया था कि अच्छे खेल प्रदर्शन और विरोधी टीम को हराने की चाहत को पैसे से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए कि कौन सा खिलाड़ी कितना पैसा कमाता है.

खेल एक सीधी साधी गतिविधि है, यहां तक कि जिस दुनिया में हम रहते हैं उसमें यह अर्थहीन है. यह अपनी दुनिया आप है, इसके अपने नियम और क़ानून हैं जिनकी अंदेखी नहीं की जा सकती है.

मनोरंजन और कोरोबार

खेल में शामिल जोश और जज़्बा और इसके हुनर में निपुणता प्राप्त करना अपने आप में ही सब कुछ है. और यही कारण है कि विश्व भर में लाखों लोग इस गतिविधि में शामिल हैं.

अगर खेल आज मनोरंजन का बड़ा कारोबार बन गया है जिससे अरबों रुपए आते हैं और जो कुछ खिलाड़ियों को करोड़पति बना देते हैं तो इसमें जलने की क्या बात है.

लेकिन हमेशा प्रदर्शन को पैसे से जोड़ना और ये यक़ीन करना कि जो जितना ज़्यादा कमाता है उतना ही अच्छा प्रदर्शन करता है उससे उन लोगों की बेइज़्ज़ती होती है जिन्होंने कमाने के लिए न कभी किसी फ़ुटबॉल को पांव मारी और न कभी कोई बल्ला ही उठाया.

उसके विपरीत ऐसा भी हो सकता है कि जो जितना कमाता हो वह बेहतर प्रदर्शन के लिए उतना ही कम प्रेरित होता हो, ख़ास तौर पर ऐसे में जबकि अपेक्षाओं का बोझ उठाना मुश्किल हो.

भारतीय क्रिकेट बोर्ड का भला चाहने वाले रत्नाकर रेड्डी ने कहा कि वे जिस बात से डर रहे थे आख़िर वही हुआ कि कुछ युवा खिलाड़ी आईपीएल के बाद भारत के लिए खेलने की अपनी चाहत खोते जा रहे हैं.

एक खिलाड़ी अगर साल के एक महीने में इतना धन कमा लेता है जितना अगर वह भारत के लिए खेले तो वर्षों में नहीं कमा सकता है तो कड़ी चुनौतियों के लिए प्रेरणा में कमी आना बहुत संभव है.

शेट्टी का इशारा

और शेट्टी इसी ओर ईशारा कर रहे थे. अन्य कुछ और लोग भी उनके विचार से सहमत हैं. इसलिए यह कहा जा सकता है कि पैसों की लालच भारतीय क्रिकेट को लाभ पहुंचाने के बजाए नुक़सान ही पहुंचा रही है.

हर कोई तेंदुलकर, द्रविड, कुंबले या गांगुली तो नहीं हो सकता. बहुत से प्रतिभाशाली खिलाड़ी हो सकते हैं जो इस उलझ जाएं और ऐसी व्यवस्था के हाथों बरबाद हो जाएं जो कला से ज़्यादा पैसों की पुजारी है.

मेरा कहना है कि ऐसी स्थिति में फिर युवा खिलाड़ियों पर दोष लगाने की ज़रूरत क्या है कि वह राह से भटक रहे हैं.

वे परिपक्व नहीं हैं और एक ऐसी दुनिया में जहां माहिर और व्यस्क खिलाड़ी भी शोहरत, चकाचौंध और पैसों में बड़ी मुश्किल से संतुलन बना पाते हैं वहां अगर ये पैसों के लालच में आजाएं तो कोई हैरानी की बात नहीं.

अगर हम इस बात से डर रहे हैं कि आईपीएल एक दानव बन गया है जो युवा प्रतिभाओं निगल जाएगा तो फिर इल्ज़ाम किसके सर जाता है?

उनके सर जिन्होंने इस दानव को पैदा किया या उन प्रभावित होने वाले ज़ेहन के जिनकी प्रतिभाएं नीलामी पर हैं और सबसे से ज़्यादा बोली लगाने वाले के हाथों बेची जाएंगी?

ये ऐसे प्रश्न हैं जिन्हें अपनी पीठ थपथपाने वाली बोर्ड जो हमेशा तदर्थता में विश्वास रखती है और अत्यधिक भारी बैंक बैलेंस को निगले हुए हैं वह इसका सामाधान करना नहीं चाहेगी.

दीवार पर लगा आईना सिर्फ़ वही दिखाता है जो कोई व्यक्ति देखना चाहता है और वास्तविक तस्वीर पेश नहीं करता है.

Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:25 [IST]
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