ललिता बाबर एक नाम जिसे नहीं भूल पाएगा भारत
महाराष्ट्र। रियो ओलंपिक 2016 का समापन बीते रविवार को हो गया और भारत के हाथ लगे सिर्फ दो पदक। पर भारत के खाते में और ज्यादा पदक आ सकते थे जिसके लिए जीतोड़ मेहनत कर रही थीं ललिता बाबर।
नंगे पैर दौड़कर अपने स्कूल पहुंचती
एक 11 साल की लड़की एक समय जब नंगे पैर दौड़कर अपने स्कूल पहुंचती थी तो किसी को नहीं पता था कि भारत के लिए जब वो दौड़ेगी तो इतिहास रच देगी। ललिता भले ही ओलंपिक खेलों में कोई पदक नहीं जीत पाई हों। पर अपने गांव के लिए उन्होंने एक मिसाल पैदा कर दी है और अपने उन शिक्षकों का भरोसा भी नहीं टूटने दिया जिन्होंने 16 साल पहले ललिता में एक विश्वास जताया था।
27 वर्षीय ललिता गोल्ड मेडल जीतने से सिर्फ 22 सेकंड दूर रह गई। 3000 मीटर स्टीपलचेस में उन्होंने 10वां स्थान हासिल किया जोकि इस स्पर्धा में किसी भी भारतीय महिला की तरफ से बनाया गया रिकॉर्ड है।
महाराष्ट्र के सतारा में मोही स्थित गांव में अब खुशियां है और वो पिता जो 15 साल पहले अपने खेत-फसलों को लेकर चिंता जाहिर किया करता था। आज उसको ओलंपिक मेडल की चिंता हो रही थी। ललिता के पिता शिवाजी बाबर ने कहा कि ललिता ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। ओलंपिक के कठिन मुकाबलों में जीत पाना हमेशा से कठिन होता है। ललिता के खेल ने कैसे अपने पिता और घरवालों की जिंदगी बदल दी, इस बात को बयां कर शिवाजी बाबर की आंखों में आंसू आ जाते हैं।
ललिता की मां निर्मला उसकी रेस के बारे में समाचार पत्रों के छपी हर खबर को काटने के लिए बेताब रहती हैं। उन्होंने विश्वास जताते हुए कहा कि भले ही हम लंबे समय से न मिले हों। पर वो जहां पर भी है वो अच्छा कर रही हैं।
ललिता की मां बताती हैं कि छह साल से बेहतर एथलीट बनने के लिए ललिता बेंगलुरू में अभ्यास कर रही हैं। इस दौरान वो बहुत कम बार हमसे मिलने आ पाई।
वो सिर्फ दौड़ेगी, दौड़ेगी और दौड़ेगी
ललिता के चाचा ने बताया कि वो सिर्फ दौड़ेगी, दौड़ेगी और दौड़ेगी। इसके अलावा वो और कुछ नहीं जानती है। जब स्कूल के दिनों में छुट्टियों के दौरान अभ्यास नहीं कर पाती थी तो घर में
ललिता की जिंदगी में बदलाव तब आया जब उसने वर्ष 2001 में मोही के गल्र्स हाई स्कूल में प्रवेश किया। ठीक उसी समय उस स्कूल में दो शिक्षक भरत चव्हाण और दायनेश काले ने भी स्कूल में पढ़ाना शुरू किया था। दोनों ही वहां पर एक फिजिकल एजुकेशन के बारे में भी पढ़ाते थे।
दायनेश काले बताते हैं कि यह स्कूल वर्ष 2000 में शुरू हुआ था और तब इस स्कूल को कोई भी सरकारी मदद नहीं मिलती थी। ललिता जब यहां पढ़ने आई थी तब उस समय हम आर्थिक तौर पर उसकी कोई मदद नहीं कर सकते थे। क्योंकि हमारी सैलरी इतनी थी ही नहीं।
सैलरी स्कूल की लड़कियों की वजह से ही आ रही
उन्होंने बताया कि पैसे की कमी के चलते हम ऐसे खेलों का आयोजन करते थे जिसमे पैसे का कोई भी खर्च न हो। ऐसे में हम खो-खो, दौड़ और अन्य ऐसे ही खेल आयोजित करते थे। इन खेलों के दौरान ही हमने ललिता के अंदर तेजी, जोश और उसकी असल क्षमता को पहचाना था।
इसके बाद दोनों शिक्षकों ने वहां पर होने वाले खो-खो खेल को लंबी दौड़ की दूरी में बदल दिया था। उन्होंने कहा उस समय लिए गए निर्णय को लेकर हमेशा हमें खुशी होगी। बाद में काले ने कहा कि अब भारतीय एथलीट कोचों को अपने स्टीपलचेस पर भी ध्यान देना चाहिए।
काले गर्व के साथ बताते हैं कि आज हमारी सैलरी स्कूल की लड़कियों की वजह से ही आ रही है। स्कूल की लड़कियों ने इंटर स्कूल इवेंट में अच्छा प्रदर्शन किया जिसे सरकार ने नोटिस किया और स्कूल को सरकारी अनुदान देना सुनिश्चित किया।
लड़कियों को शॉर्ट पहनने की इजाजत दें
दोनों ही शिक्षक बताते हैं कि यहां पर लड़कियों को इस खेल के लिए तैयार करना इतना आसान काम नहीं था। गांव में घरवाले अपनी लड़कियों केा शॉर्ट पहनकर अभ्यास करने और घर से दूर रहने की आज्ञा नहीं देते थे।
ऐसे में बहुत कठिन था कि कैसे घरवालों को विश्वास जीतकर उन्हें मनाया जाए कि वो अपनी लड़कियों को शॉर्ट पहनने की इजाजत दें। इस बीच कई लड़कियों ने अपनी हार मान ली और आगे का सफर नहीं तय किया।
काले ने बताया कि ऐसी जगहों पर आपको उस सामाजिक और आर्थिक नजरिए को भी ध्यान में रखना होता है जहां पर इन लड़कियों बड़ी हो रही होती हैं।
लड़कियों के साथ यहां पर होने वाले व्यवहार के बारे में शिक्षकों ने बताया कि ललिता की तरह ही विद्या जाधव भी बहुत ही होनहार लड़की थी। वो ललिता की जूनियर थी। आज जिस जगह पर ललिता है वो भी उस जगह पर पहुंच सकती थी। पर घरवालों के दबाव में वो आगे नहीं बढ़ सकी।
दूसरा ऐसा ही मामला खुद ललिता के घर में ही है। ललिता की छोटी बहन का नाम नकोसा रखा गया था जिसका मतलब बिना चाहत के। बाद में उसका नाम बदलकर भाग्यश्री रखा गया।
सतारा ने देश के उन जिलों में से एक है, जहां लड़कियो की तुलना में पुरूषों का सेक्स अनुपात कम है। आज यहां पर 1000 पुरूषों पर 906 महिलाएं हैं। जोकि 2001 से भी खराब है। सतारा में बहुत से परिवार अपनी तीसरी या चौथी लड़की का नाम नकोसा या नकोसी रखते हैं जिसका मतलब होता कि बिना चाहत के।
वर्ष 2011 में राज्य सरकार ने एक अभियान के तहत सिर्फ सतारा में ही 200 लड़कियों का नाम बदला था।
परिवार ने उनकी यात्रा के लिए बकरियां बेचकर रूपए जुटाए
ललिता के पिता शिवाजी बाबर अपनी छोटी लड़की का नाम नकोसा रखने पर दुख जताते हुए कहते हैं कि वो एक गलती थी। जोकि मुझसे हुई।
वो खुश होते हुए बताते हैं कि लड़कियां, लड़कों से कम नहीं हैं। भाग्यश्री ने पुलिस फोर्स ज्वाइन की है। दूसरी बेटी जयश्री रेलवे में मुंबई में नौकरी रही है। ललिता को भी रेलवे में नौकरी मिल गई है। और इससे ज्यादा एक पिता क्या कह सकता है।
ललिता एक संयुक्त परिवार में रहती है और सभी बहनों में सबसे बड़ी है। आज भी ललिता के घर तक पक्की सड़क नहीं पहुंच पाई है। ललिता के पिता एक ट्रक ड्राइवर हैं और अधिकतर काम के सिलसिले में बाहर ही रहते हैं। ललिता के चाचा ही घर की देखभाल करते हैं।
जब ललिता पहली बार छत्तीसगढ़ में आयोजित राष्ट्रीय खेलों के लिए चुनी गईं। तो परिवार ने उनकी यात्रा के लिए बकरियां बेचकर रूपए जुटाए थे। बाद में वो वहां से गोल्ड मेडल जीतकर वापस लौटी थी।
ललिता ने पहली बार अपने जूते तब खरीदे थे जब वर्ष 2005 में विशाखापट्टनम में एक दौड़ के दौरान नंगे पैर हिस्सा लेने से मना कर दिया था।
ललिता की मेहनत के पीछे उनके चाचा गणेश बाबर की भी उनकी खूब मदद की। उन्होंने घरवालों को मनाया कि ललिता की जल्दी शादी न करें।
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