अधूरी है तेंदुलकर की एक अदद हसरत
भारतीय क्रिकेट और खासकर तेंदुलकर को जानने वाले लोग उनकी इस हसरत के बारे में अच्छी तरह जानते हैं लेकिन खुद तेंदुलकर ने कभी भी खुलकर नहीं कहा कि ट्रॉफियों, अलंकरणों, पुरस्कारों और रनों के अंबार के बीच अपने संग्रह में उन्हें विश्व कप ट्रॉफी की कमी खलती है।
भारत ने 1983 में पहली बार विश्व कप जीता था। उस समय तेंदुलकर 10 वर्ष के थे। बल्ला पकड़ना सीख चुके थे, क्रिकेट रोम-रोम में बस चुका था। उस दौरान वह मुम्बई के शारदाश्रम के अलावा गुरु रमाकांत आचरेकर से क्रिकेट का ककहरा सीख रहे थे। देश के लिए खेलने का सपना पालने के साथ-साथ तेंदुलकर ने उस समय विश्व कप जीतने का सपना भी पाला था लेकिन वह मुकाम उनके करियर में अब तक नहीं आ सका है।
वर्ष 2003 में तेंदुलकर ने दक्षिण अफ्रीका में आयोजित विश्व कप में सर्वाधिक रन बनाए थे। भारत फाइनल में पहुंचकर आस्ट्रेलिया से हार गया था। उसके बाद कहा जाने लगा कि तेंदुलकर का अपनी टीम को विश्व कप दिलाने का सपना अधूरा रह जाएगा लेकिन युवा भारतीय टीम ने अपने शानदार खेल और आत्मविश्वास के दम पर एक बार फिर उनके इस सपने को जीवंत कर दिया है।
तेंदुलकर ने शुक्रवार को मुम्बई में आयोजित कैस्ट्रॉल क्रिकेट पुरस्कार समारोह के दौरान कहा कि वह अब भी अपने पुरस्कारों और ट्रॉफियों के खजाने में विश्व कप के रूप में कोहेनूर की कमी महसूस करते हैं। तेंदुलकर ने कहा, "मैं क्या चाहता हूं, यह सभी जानते हैं।"
ऐसे में जबकि 2003 में तेंदुलकर के साथ टीम को फाइनल में पहुंचाने वाले अनेक दिग्गज संन्यास ले चुके हैं, तेंदुलकर ने अपने युवा और प्रतिभाशाली साथियों के साथ एक बार फिर विश्व कप जीतने का सपना संजोया है और पिछले कई मौकों की तरह इस बार भी उन्हें यकीन है कि उनकी टीम अपने देश में हो रहे इस आयोजन के दौरान विजय को प्राप्त होगी।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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