जर्मनी के जेना शहर के जाने-माने भाला फेंक खिलाड़ी थॉमस रोहलर, 1998 में इस खेल को अपनाने के बाद से एथलेटिक्स की दुनिया में धूम मचा रहे हैं। रोहलर का भाला फेंक के प्रति मोह आठ साल की उम्र में टीवी पर ओलंपिक देखने के बाद शुरू हुआ। उन्होंने जल्द ही एक एथलेटिक्स क्लब में शामिल हो गए और 2009 में भाला फेंक पर ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया।

| Season | Event | Rank |
|---|---|---|
| 2016 | Men's Javelin Throw | G स्वर्ण |
रोहलर रोजाना पांच से छह घंटे प्रशिक्षण लेते हैं, जिसमें उनके फेंकने के प्रशिक्षण के साथ-साथ क्रॉसफिट व्यायाम भी शामिल हैं। उनके कोच, हारो श्वुचोव ने अपनी तकनीक को बेहतर बनाने के लिए माचिस फेंकने जैसे अनोखे व्यायामों को पेश किया है। माचिस फेंकने का रोहलर का रिकॉर्ड 32 मीटर है।
रोहलर सिर्फ एक एथलीट नहीं हैं; वे जेना में फ्रेडरिक शिलर विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र और खेल अध्ययन के छात्र भी हैं। वह अंग्रेजी और जर्मन दोनों भाषाओं में धाराप्रवाह बोलते हैं। खाली समय में उन्हें फोटोग्राफी का शौक है।
2016 के ओलंपिक में स्वर्ण जीतना रोहलर की सबसे यादगार खेल उपलब्धि बनी हुई है। उन्हें जर्मन स्पोर्ट्स एड फाउंडेशन द्वारा 2018 के स्पोर्ट फेलो ऑफ द ईयर के रूप में भी सम्मानित किया गया है और 2013 और 2014 में जेना में उन्हें स्पोर्ट्समैन ऑफ द ईयर नामित किया गया है।
रोहलर का खेल दर्शन सरल है: "अपने सपने का पीछा करें, चाहे कुछ भी हो जाए।" वह अमेरिकी डेकाथलीट एश्टन ईटन को अपना हीरो मानते हैं। 2016 की यूरोपीय चैंपियनशिप के दौरान पीठ में चोट लगने के बावजूद, रोहलर दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ते रहते हैं।
आगे देखते हुए, रोहलर का लक्ष्य टोक्यो 2020 खेलों में अपने ओलंपिक खिताब का बचाव करना है। हालाँकि, वह जोर देते हैं कि उन्हें अपनी पिछली सफलता को दोहराने का कोई दबाव महसूस नहीं होता है। उनके लिए, दुनिया के सर्वश्रेष्ठ एथलीटों के बीच निष्पक्ष और सम्मानजनक प्रतिस्पर्धा पर ध्यान केंद्रित रहता है।
थॉमस रोहलर की यात्रा, भाला फेंक के लिए बहुत छोटा माना जाने से लेकर ओलंपिक चैंपियन बनने तक, खेल के प्रति उनके समर्पण और जुनून का प्रमाण है। उनकी कहानी दुनिया भर के कई महत्वाकांक्षी एथलीटों को प्रेरित करती रहती है।