'चक दे इंडिया' से 'चेक दे इंडिया' की नौबत क्यों?
नई दिल्ली। भारत का राष्ट्रीय खेल हॉकी इन दिनों अजीब से दोराहे पर है। एक तरफ जहां 28 फरवरी से हमारी मेजबानी में विश्व कप खेला जाना है वहीं दूसरी ओर मेहनताने की राशि का भुगतान नहीं होने के कारण सीनियर टीम के खिलाड़ियों ने पुणे में जारी राष्ट्रीय शिविर का बहिष्कार कर दिया है।
यश राज फिल्म्स के बैनर तले बनी मशहूर फिल्म 'चक दे इंडिया' के माध्यम से हॉकी सहित तमाम खेलों के लिहाज से मशहूर हुआ 'चक दे इंडिया' का नारा इन दिनों हॉकी खिलाड़ियों के लिए 'चेक दे इंडिया' में परिवर्तित हो चुका है। भारतीय टीम के खिलाड़ियों ने शनिवार को हॉकी इंडिया (एचआई) से बातचीत के बाद शिविर में हिस्सा लेना स्वीकार किया था लेकिन रविवार देर रात एक बार फिर उन्होंने अपना इरादा बदल दिया।
खिलाड़ियों का कहना है कि उन्हें आश्वासन नहीं बल्कि भुगतान चाहिए। खिलाड़ियों के मुताबिक शनिवार को हुई बैठक के बाद हॉकी इंडिया के प्रमुख अशोक कुमार मट्टू ने उन्हें बिल्कुल वही आश्वासन दिए, जो उन्हें पिछले एक वर्ष से दिए जा रहे थे। अब खिलाड़ियों का कहना है कि उन्हें लिखित तौर पर जवाब चाहिए, तभी वे अभ्यास के लिए मैदान में उतरेंगे।
2008 के बीजिंग ओलंपिक में खेलने का अधिकार हासिल नहीं करने पाने की किरकिरी झेल चुकी भारतीय टीम के पास अपनी मेजबानी में विश्व कप जीतकर इस दाग को धोने का अच्छा मौका है लेकिन इन दिनों जो हालात चल रहे हैं, उन्हें देखते हुए इसकी संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती।
खिलाड़ियों द्वारा बगावत किए जाने से परेशान हॉकी इंडिया पहले ही अंदरूनी परेशानियों से जूझ रहा है। विश्व कप के शुरू होने में डेढ़ महीने का वक्त रह गया है लेकिन हॉकी इंडिया के बहुप्रतिक्षित चुनाव में लगातार देरी हो रही है। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हॉकी इंडिया का चुनाव 29 जनवरी को होना था लेकिन अब उसके भी टलने के आसार बनते दिख रहे हैं।
हॉकी इंडिया ने कहा कि इसकी तदर्थ समिति इस तिथि पर चुनाव नहीं करा पाएगी। इसके कारण चुनाव की नई तिथि की घोषणा के लिए उसे 21 दिनों का नोटिस देना होगा। इसके बाद ही वह अपने पदाधिकारियों को बुलाकर चुनाव की प्रक्रिया पूरी कर पाएगी। कुछ राज्यों के संघों की मान्यता प्रक्रिया ने हॉकी इंडिया के इस काम को और मुश्किल बना दिया है।
ऐसे में जबकि हॉकी इंडिया खुद कई मुश्किलों से जूझ रही है, उसे खिलाड़ियों की सुध कहां रहेगी। वैसे भी भारतीय हॉकी हमेशा से राजनीतिक अखाड़े का केंद्र रहा है। खींचतान और उठापटक की राजनीति में हमेशा से खिलाड़ियों के हितों की अनदेखी होती रही है। एक वक्त था जब के.पी.एस. गिल और ज्योतिकुमारन ने भारतीय हॉकी को रसातल में पहुंचाया और अब इस कुर्सी को पाने के लिए नए लोगों के बीच रस्साकशी चल रही है।
यही कारण है कि एक तरफ जहां क्रिकेट खिलाड़ी एक वर्ष में कई करोड़ कमा रहे हैं वहीं हॉकी खिलाड़ियों को 25,000 रुपये के लिए विद्रोह करना पड़ रहा है। शनिवार को बातचीत के लिए नई दिल्ली पहुंचने के बाद भारतीय टीम के कप्तान राजपाल सिंह ने साफ शब्दों में कहा था कि अपना अधिकार हासिल किए बगैर उनके साथी मैदान में नहीं उतरेंगे।
जिस देश का राष्ट्रीय खेल हॉकी हो, वहां हॉकी खिलाड़ियों की यह दुर्दशा देखकर यही कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में कोई भी मां-बाप अपने बच्चे को हॉकी खेलने के लिए प्रोत्साहित नहीं करेंगे। अगर कोई खेलना चाहेगा तो उसे कहा जाएगा कि यह खेल मत खेलो, क्रिकेट या टेनिस खेलो, मुक्केबाजी या गोल्फ खेलो क्योंकि इसमें 'चक दे इंडिया' की जगह 'चेक दे इंडिया' कहने की नौबत आती है और खाने के भी लाले पड़ जाते हैं।
सच्चाई भी यही है। अपने करियर में करोड़ों कमाने वाले क्रिकेट खिलाड़ी कुछ समय तक बिना मेहनताने या मैच फीस के खेल सकते हैं लेकिन हॉकी खिलाड़ियों के लिए यह संभव नहीं। प्रायोजकों की कमी, विज्ञापनों की कमी और बेहद कम मैच फीस के बीच देश का झंडा बुलंद रखने के लिए प्रयासरत इन खिलाड़ियों की व्यथा उन दहाड़ी मजदूरी की तरह है, जिन्हें पूरे दिन के काम के बाद भी मेहनत की पूरी कमाई नहीं मिलती।
पेशेवर होते खेल जगत में भारत में बीते दिनों में कई खेलों ने अपनी कमाई के जरिए में इजाफा किया है। क्रिकेट ने खेलों से जुड़े महासंघों और खिलाड़ियों को व्यक्तिगत तथा संगठित तौर पर पेशेवर होने के मजबूर किया। इसी का नतीजा है कि मुक्केबाजी, शतरंज, फुटबाल, गोल्फ, बैडमिंटन और यहां तक की निशानेबाजों की कमाई उस स्तर तक पहुंच गई, जहां वे बड़े सुकून के साथ अपने व्यक्तिगत प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। लेकिन राजनीतिक उठापटक के कारण हॉकी खिलाड़ियों का रास्ता और दुरूह होता चला गया। अब तो यह आलम है कि टीम के एकमात्र प्रायोजक 'सहारा इंडिया' से मिलने वाली वार्षिक तीन करोड़ की राशि में से भी खिलाड़ियों को उनका वाजिब हिस्सा नहीं मिलता।
इस पूरे मामले में देशवासियों की संवेदना हॉकी खिलाड़ियों के साथ है। देशवासी भी जानते हैं कि देश के लिए खेलना अलग बात है और अपना तथा घरवालों का पेट पालना अलग बात है। भारतीय टीम में कई ऐसे खिलाड़ी हैं, जो बेहद सामान्य परिवेश और गरीब घरों से आए हैं। उनके पास भरपूर बैंक बैलेंस नहीं, जिससे वे लगातार अपना तथा घरवालों का पेट पालते रहें। खेलते रहने के साथ-साथ उन्हें अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पैसे की भी दरकार होती है लेकिन हॉकी इंडिया को इसकी सुध नहीं।
'चक दे इंडिया' में भारतीय टीम के कोच की भूमिका अदा कर चुके बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान भी अपने ब्लॉग के माध्यम से हॉकी खिलाड़ियों की दुर्दशा और इस पूरे मामले पर खेद व्यक्त कर चुके हैं। शाहरुख ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि यह अजीब विडंबना है कि देश के लिए खेलने वाले खिलाड़ियों को अपने हक के लिए विद्रोह करना पड़ रहा है।
'चक दे इंडिया' में कबीर खान की भूमिका अदा करने वाले शाहरुख के मुताबिक इन खिलाड़ियों पर आरोप लगता है कि ये देश के लिए स्वर्ण पदक नहीं जीतते लेकिन क्या कोई बता सकता है कि जब अपना तथा घरवालों का पेट पालने की चिंता दिमाग पर हावी हो तो भला स्वर्ण पदक किसे दिखेगा। और फिर इस बात की क्या गारंटी है कि स्वर्ण पदक जीतने के बाद भी उन्हें उनका हक मिल ही जाएगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
यश राज फिल्म्स के बैनर तले बनी मशहूर फिल्म 'चक दे इंडिया' के माध्यम से हॉकी सहित तमाम खेलों के लिहाज से मशहूर हुआ 'चक दे इंडिया' का नारा इन दिनों हॉकी खिलाड़ियों के लिए 'चेक दे इंडिया' में परिवर्तित हो चुका है। भारतीय टीम के खिलाड़ियों ने शनिवार को हॉकी इंडिया (एचआई) से बातचीत के बाद शिविर में हिस्सा लेना स्वीकार किया था लेकिन रविवार देर रात एक बार फिर उन्होंने अपना इरादा बदल दिया।
खिलाड़ियों का कहना है कि उन्हें आश्वासन नहीं बल्कि भुगतान चाहिए। खिलाड़ियों के मुताबिक शनिवार को हुई बैठक के बाद हॉकी इंडिया के प्रमुख अशोक कुमार मट्टू ने उन्हें बिल्कुल वही आश्वासन दिए, जो उन्हें पिछले एक वर्ष से दिए जा रहे थे। अब खिलाड़ियों का कहना है कि उन्हें लिखित तौर पर जवाब चाहिए, तभी वे अभ्यास के लिए मैदान में उतरेंगे।
2008 के बीजिंग ओलंपिक में खेलने का अधिकार हासिल नहीं करने पाने की किरकिरी झेल चुकी भारतीय टीम के पास अपनी मेजबानी में विश्व कप जीतकर इस दाग को धोने का अच्छा मौका है लेकिन इन दिनों जो हालात चल रहे हैं, उन्हें देखते हुए इसकी संभावना दूर-दूर तक नजर नहीं आती।
खिलाड़ियों द्वारा बगावत किए जाने से परेशान हॉकी इंडिया पहले ही अंदरूनी परेशानियों से जूझ रहा है। विश्व कप के शुरू होने में डेढ़ महीने का वक्त रह गया है लेकिन हॉकी इंडिया के बहुप्रतिक्षित चुनाव में लगातार देरी हो रही है। पूर्व निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार हॉकी इंडिया का चुनाव 29 जनवरी को होना था लेकिन अब उसके भी टलने के आसार बनते दिख रहे हैं।
हॉकी इंडिया ने कहा कि इसकी तदर्थ समिति इस तिथि पर चुनाव नहीं करा पाएगी। इसके कारण चुनाव की नई तिथि की घोषणा के लिए उसे 21 दिनों का नोटिस देना होगा। इसके बाद ही वह अपने पदाधिकारियों को बुलाकर चुनाव की प्रक्रिया पूरी कर पाएगी। कुछ राज्यों के संघों की मान्यता प्रक्रिया ने हॉकी इंडिया के इस काम को और मुश्किल बना दिया है।
ऐसे में जबकि हॉकी इंडिया खुद कई मुश्किलों से जूझ रही है, उसे खिलाड़ियों की सुध कहां रहेगी। वैसे भी भारतीय हॉकी हमेशा से राजनीतिक अखाड़े का केंद्र रहा है। खींचतान और उठापटक की राजनीति में हमेशा से खिलाड़ियों के हितों की अनदेखी होती रही है। एक वक्त था जब के.पी.एस. गिल और ज्योतिकुमारन ने भारतीय हॉकी को रसातल में पहुंचाया और अब इस कुर्सी को पाने के लिए नए लोगों के बीच रस्साकशी चल रही है।
यही कारण है कि एक तरफ जहां क्रिकेट खिलाड़ी एक वर्ष में कई करोड़ कमा रहे हैं वहीं हॉकी खिलाड़ियों को 25,000 रुपये के लिए विद्रोह करना पड़ रहा है। शनिवार को बातचीत के लिए नई दिल्ली पहुंचने के बाद भारतीय टीम के कप्तान राजपाल सिंह ने साफ शब्दों में कहा था कि अपना अधिकार हासिल किए बगैर उनके साथी मैदान में नहीं उतरेंगे।
जिस देश का राष्ट्रीय खेल हॉकी हो, वहां हॉकी खिलाड़ियों की यह दुर्दशा देखकर यही कहा जा सकता है कि आने वाले दिनों में कोई भी मां-बाप अपने बच्चे को हॉकी खेलने के लिए प्रोत्साहित नहीं करेंगे। अगर कोई खेलना चाहेगा तो उसे कहा जाएगा कि यह खेल मत खेलो, क्रिकेट या टेनिस खेलो, मुक्केबाजी या गोल्फ खेलो क्योंकि इसमें 'चक दे इंडिया' की जगह 'चेक दे इंडिया' कहने की नौबत आती है और खाने के भी लाले पड़ जाते हैं।
सच्चाई भी यही है। अपने करियर में करोड़ों कमाने वाले क्रिकेट खिलाड़ी कुछ समय तक बिना मेहनताने या मैच फीस के खेल सकते हैं लेकिन हॉकी खिलाड़ियों के लिए यह संभव नहीं। प्रायोजकों की कमी, विज्ञापनों की कमी और बेहद कम मैच फीस के बीच देश का झंडा बुलंद रखने के लिए प्रयासरत इन खिलाड़ियों की व्यथा उन दहाड़ी मजदूरी की तरह है, जिन्हें पूरे दिन के काम के बाद भी मेहनत की पूरी कमाई नहीं मिलती।
पेशेवर होते खेल जगत में भारत में बीते दिनों में कई खेलों ने अपनी कमाई के जरिए में इजाफा किया है। क्रिकेट ने खेलों से जुड़े महासंघों और खिलाड़ियों को व्यक्तिगत तथा संगठित तौर पर पेशेवर होने के मजबूर किया। इसी का नतीजा है कि मुक्केबाजी, शतरंज, फुटबाल, गोल्फ, बैडमिंटन और यहां तक की निशानेबाजों की कमाई उस स्तर तक पहुंच गई, जहां वे बड़े सुकून के साथ अपने व्यक्तिगत प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं। लेकिन राजनीतिक उठापटक के कारण हॉकी खिलाड़ियों का रास्ता और दुरूह होता चला गया। अब तो यह आलम है कि टीम के एकमात्र प्रायोजक 'सहारा इंडिया' से मिलने वाली वार्षिक तीन करोड़ की राशि में से भी खिलाड़ियों को उनका वाजिब हिस्सा नहीं मिलता।
इस पूरे मामले में देशवासियों की संवेदना हॉकी खिलाड़ियों के साथ है। देशवासी भी जानते हैं कि देश के लिए खेलना अलग बात है और अपना तथा घरवालों का पेट पालना अलग बात है। भारतीय टीम में कई ऐसे खिलाड़ी हैं, जो बेहद सामान्य परिवेश और गरीब घरों से आए हैं। उनके पास भरपूर बैंक बैलेंस नहीं, जिससे वे लगातार अपना तथा घरवालों का पेट पालते रहें। खेलते रहने के साथ-साथ उन्हें अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए पैसे की भी दरकार होती है लेकिन हॉकी इंडिया को इसकी सुध नहीं।
'चक दे इंडिया' में भारतीय टीम के कोच की भूमिका अदा कर चुके बॉलीवुड अभिनेता शाहरुख खान भी अपने ब्लॉग के माध्यम से हॉकी खिलाड़ियों की दुर्दशा और इस पूरे मामले पर खेद व्यक्त कर चुके हैं। शाहरुख ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि यह अजीब विडंबना है कि देश के लिए खेलने वाले खिलाड़ियों को अपने हक के लिए विद्रोह करना पड़ रहा है।
'चक दे इंडिया' में कबीर खान की भूमिका अदा करने वाले शाहरुख के मुताबिक इन खिलाड़ियों पर आरोप लगता है कि ये देश के लिए स्वर्ण पदक नहीं जीतते लेकिन क्या कोई बता सकता है कि जब अपना तथा घरवालों का पेट पालने की चिंता दिमाग पर हावी हो तो भला स्वर्ण पदक किसे दिखेगा। और फिर इस बात की क्या गारंटी है कि स्वर्ण पदक जीतने के बाद भी उन्हें उनका हक मिल ही जाएगा।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:29 [IST]
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