फिर से पुराने अंदाज में दिख रहे हैं तेंदुलकर

नई दिल्ली, 25 फरवरी (आईएएनएस)। इंग्लैंड में वर्ष 1999 में खेले गए विश्व कप के दौरान सचिन तेंदुलकर ने ब्रिस्टल में केन्या के खिलाफ 101 गेंदों पर 140 रनों की नाबाद पारी खेली थी। यह उनके अंतर्राष्ट्रीय करियर की अब तक की सबसे तेज शतकीय पारी है। इस पारी के दौरान 138.61 के स्ट्राइक रेट से रन बटोरे थे।

वह पारी तेंदुलकर के लिए बेहद खास थी क्योंकि विश्व कप के दौरान ही उनके पिता और मराठी के मशहूर साहित्यकार रमेश तेंदुलकर का निधन हो गया था। तेंदुलकर दो दिनों की छुट्टी लेकर लंदन से मुंबई पहुंचे थे और अपने पिता की अंत्येष्टि में हिस्सा लिया था। इसके बाद तेंदुलकर ने वह बेमिसाल पारी खेली थी। तब से लेकर आज तक अर्धशतक या शतक पूरा करने के बाद तेंदुलकर नियमित तौर पर आसमान की ओर देखते हुए अपने पिता को याद करते हैं और उनका आशीर्वाद लेते हैं।

ब्रिस्टल में तेंदुलकर ने अपना 20वां एकदिवसीय शतक लगाया था लेकिन उससे पहले या फिर उसके बाद उनके बल्ले से इतनी तेज शतकीय पारी कोई और नहीं निकली। तेंदुलकर ने 1999 में हैदराबाद में अपनी दूसरी सबसे बड़ी एकदिवसीय पारी (186 नाबाद) और 2009 में हैदराबाद में ही आस्ट्रेलिया के खिलाफ 175 रनों की पारी के दौरान 124.00 के स्ट्राइक रेट से रन बटोरे थे लेकिन उनकी बल्लेबाजी में ब्रिस्टल वाली आक्रामकता नहीं दिखी।

बीते बुधवार को तेंदुलकर ने ग्वालियर में जब 200 रनों की व्यक्तिगत पारी खेलकर इतिहास रचा तो उनकी एक दशक पुरानी आक्रामक शैली की याद फिर से जाता हो गई। तेंदुलकर ने दक्षिण अफ्रीकी गेंदबाजों की जबरदस्त धुनाई करते हुए 136.05 के औसत से 147 गेंदों पर 25 चौकों और तीन छक्कों की मदद से दोहरा शतक लगाया।

यह तेंदुलकर के करियर का 46वां शतक था। ब्रिस्टल में उन्होंने अपना 20वां शतक लगाया था। ब्रिस्टल से पहले के 20 शतकों और ब्रिस्टल के बाद से 25 शतकों में तेंदुलकर की चिरपरिचित आक्रामकता गायब रही लेकिन उन्होंने कभी भी अपने प्रशंसकों को निराश नहीं किया। वक्त बदलने के साथ टीम में उनकी जिम्मेदारी बदली। धुरंधरों की मौजूदगी में खुलकर स्ट्रोक लगाने वाले तेंदुलकर जब खुद धुरंधरों की श्रेणी में शामिल हुए तब उनके बल्ले की रफ्तार थोड़ी कम हुई लेकिन रन बनाने की उनकी रफ्तार ज्यों की त्यों बनी रही।

अब जबकि तेंदुलकर को इस बात का आभास हो गया है कि उम्र के लिहाज से अब उनका करियर ढलान पर है और टीम इंडिया में महेंद्र सिंह धौनी, वीरेंद्र सहवाग, युवराज सिंह, सुरेश रैना और यूसुफ पठान जैसे तूफानी अंदाज में खेलने वाले बल्लेबाज मौजूद हैं, वह अपने बल्ले को फिर से वही तेजी देने को आतुर दिख रहे हैं जो युवा तेंदुलकर के बल्ले में हुआ करती थी।

ग्वालियर की पारी इसका प्रमाण है। 300 गेंदों की पारी में 147 गेंदें खुद तेंदुलकर ने खेलीं और 200 रन बटोरे। वह 50 ओवर तक आउट नहीं हुए। एक अरसे के बाद ऐसा हुआ है कि तेंदुलकर पूरे 50 ओवर तक टिके रहने के बाद पेवेलियन लौटे। 37 वर्ष की उम्र में एक ऐसे खिलाड़ी से इससे अधिक क्या अपेक्षा की जा सकती है, जिसके नाम 30,000 रन और 93 शतक दर्ज हों।

जिम्मेदारियों के दबाव में अपनी शैली को नया रूप और बल्ले की रफ्तार को हल्का सा विराम देने वाले तेंदुलकर को फिर से 'पुराना रूप' धरते देखकर सचमुच अच्छा लगा। इसका कारण यह है कि पिछले कुछ वर्षों से हम यह मान चुके थे कि तेंदुलकर अब सहवाग, धौनी या फिर यूसुफ जैसी तूफानी बल्लेबाजी नहीं कर सकते लेकिन ग्वालियर में उनके बल्ले के निकलती आग को देखकर देश के करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों को यकीन हो गया होगा कि जिम्मेदारियों के दबाव ने भी इस महान खिलाड़ी की फितरत को बिल्कुल नहीं बदला है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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Story first published: Thursday, February 25, 2010, 5:01 [IST]
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