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टेस्ट क्रिकेट की 5 सबसे खराब पिचें जिन पर नहीं होना चाहिये मैच, इनमे से आप कितनी जानते हैं

नई दिल्ली। भारत और बांग्लादेश के बीच रविवार शाम को खेले जाने वाले टी20 मैच से पहले कप्तान रोहित शर्मा और भारतीय टीम मैनेजमेंट यहां कि पिच से काफी खुश नजर आया। पिछली बार जब दिल्ली में आईपीएल टूर्नमेंट खेला गया था तब मैच दर मैच फिरोजशाह कोटला मैदान की पिच की आलोचना खूब हुई थी। दिल्ली की पिच पर बाउंस खत्म होता जा रहा था और तेज गेंदबाजों की गेंदें भी नीची रह रही थीं। पिच पर असमान उछाल के चलते एक्सपर्ट्स और खिलाड़ी इससे खुश नहीं थे। लेकिन इस बार कोटला की पिच को नए सिरे से तैयार किया गया है और ऐसे में यहां इस बार अच्छे उछाल की उम्मीद है।

वहीं भारत और बांग्लादेश के बीच होने वाले पहले डे-नाइट टेस्ट मैच में किस तरह कि पिच बनाई जाये जिससे शाम को पड़ने वाली ओस का असर ज्यादा न हो, इसको लेकर भी लगातार चर्चा हो रही है। पिच को लेकर जब इतनी बातें हो रही हैं तो माई खेल की टीम ने सोचा अपने पाठकों को पिचों के बारे में थोड़ी जानकारी दी जाये।

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इस लेख में आपको उन 5 पिचों की जानकारी दी जाएगी जिन्हें आईसीसी कोड ऑफ कंडक्ट के अनुसार टेस्ट क्रिकेट में सबसे खराब पिच करार दिया जाता है।

स्लो रोड पिच (The Slow Road)

स्लो रोड पिच (The Slow Road)

पिछले एक दशक में धीमी और सपाट पिचों का चलन काफी बढ़ गया है जो कि गेंदबाजों के लिये ज्यादा मददगार साबित नहीं होते हैं हालांकि इन पिचों पर बल्लेबाज के लिए तेजी से रन बना पाने में भी काफी मुश्किल होती है। आमतौर पर नतीजे सुस्त क्रिकेट के होते हैं, जिसमें बल्लेबाज आसानी से लक्ष्य का बचाव कर लेते हैं और दोनों ही टीमें मैच को आगे बढ़ा पाने में नाकाम हो जाती हैं। इंग्लैंड और वेस्टइंडीज के अलावा यूएई में इस तरह की पिचों की भरमार है। वहीं जब से क्रिकेट ऑस्ट्रेलिया ने ड्रॉप-इन पिचों का उपयोग शुरू कर दिया है तब से उन पर भी इसी रास्ते जाने का आरोप है।

उदाहरण के तौर पर एमसीजी के मैदान पर 2017 में खेला गया ऑस्ट्रेलिया बनाम इंग्लैंड मैच जिसमें पिच के सपाट होने के चलते इस मैच का कोई निर्णय नहीं निकल पाया। 2006 में जब से आईसीसी ने पिचों की रेटिंग देना शुरु किया है तब से 2 पिचों को स्लो रोड होने के चलते बेहद खराब कैटेगरी में रखा गया है।

रैंक टर्नर पिच (The Rank Turner)

रैंक टर्नर पिच (The Rank Turner)

रैंक टर्नर पिच उन्हें कहा जाता है जो जरूरत से ज्यादा स्पिनर्स के लिए मददगार होती हैं। उपमहाद्वीपिय देशों में अक्सर देखा गया है कि पिचें स्पिनर्स को ध्यान में रखकर बनाई जाती हैं जिसके लिए उन्हें किसी भी प्रकार का दोष देना गलत होगा पर ऐसी पिचें जिसमें पहले दिन से गेंद लेग स्टंप से ऑफ स्टंप की ओर तेजी से घूमें उन पिचों का होना भी खतरनाक है। ऐसी पिचों पर बल्लेबाजी किस्मत के सहारे होती है क्योंकि एक अच्छा स्पिनर किसी भी पिच पर बल्लेबाज को घुमा सकता है पर ऐसी अनुकूल परिस्थितियों वाली पिच पर वह बल्लेबाज को नचा सकता है।

स्पिनर को बस पिच की दरारों में गेंद को फेंकना होता है और बाकी का काम पिच खुद कर लेती है। इन पिचों पर अक्सर मैच को जल्दी खत्म होते देखा गया है जिसके चलते टेस्ट मैच सीमित ओवर्स की तरह लगता है।

उदाहरण के तौर पर भारत और साउथ अफ्रीका के बीच 2015 में नागपुर में खेला गया टेस्ट मैच, जो कि महज 3 दिन के अंदर खत्म हो गया। इस मैच में स्पिनर्स ने भारत के लिए पूरे 20 विकेट लिये थे जिसमें आर अश्विन के 12, अमित मिश्रा और रविंद्र जडेजा के 4-4 विकेट शामिल हैं। अफ्रीकी गेंदबाजों की तरफ से भी स्पिनर्स ने 11 विकेट चटकाये थे।

साल 2006 के बाद से आईसीसी ने अब तक 4 बार इस तरह की पिचों की खराब रेटिंग दी है।

ग्रीन टॉप पिच (The Green Top)

ग्रीन टॉप पिच (The Green Top)

ऐसी पिचें जिन पर हरी घास छोड़ दी जाती है सीमर्स और तेज गेंदबाजों की मदद के लिए उन्हें ग्रीन टॉप पिच कहा जाता है। हालांकि 2006 के बाद से आईसीसी ने अब तक एक भी पिच को घास छोड़ने के चलते खराब रेटिंग नहीं दी है लेकिन अक्सर देखा गया है कि ऐसी पिचों पर टॉस बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है। पहले गेंदबाजी करने वाली टीम मैच को आसानी से जीत जाती है और यह टेस्ट भी 3-4 दिनों के अंदर खत्म हो जाता है।

उदाहरण के तौर पर भारत और अफ्रीका के बीच 2010 में सेंचुरियन के मैदान पर खेला गया टेस्ट मैच।

असमान उछाल वाली पिच ( The Uneven Track)

असमान उछाल वाली पिच ( The Uneven Track)

टेस्ट क्रिकेट में कई बार देखने को मिला है कि ऐसी पिचें जहां पर दोहरा उछाल होता है वो बल्लेबाज के लिए कितनी खतरनाक साबित होती हैं। ऐसी पिचों पर कई बल्लेबाज चोटिल होता दिखाई पड़ता है। गेंद उसके सिर पर या गर्दन पर लग सकती है। अंपायर ऐसी पिचों पर मैच को रद्द करने का अधिकार रखते हैं और अगर पिच फिर भी खेलने लायक नजर आती है तो किसी को भी बल्लेबाज बंदर की तरह पिच पर गेंदों से बचता या उछलता हुआ अच्छा नहीं लगेगा जो कि गेंद के साथ बहुत कुछ कर सकते हैं।

उदाहरण के तौर पर 2008 में भारत और साउथ अफ्रीका के बीच कानपुर में खेला गया मैच। इस मैच को भले ही भारतीय टीम ने जीत लिया था लेकिन पूरे मैच के दौरान साउथ अफ्रीकी बल्लेबाज गेंद की उछाल से बचने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कर पाये। क्रिकेट के इतिहास में आज तक असमान उछाल वाली किसी भी पिच को अब तक खराब रेटिंग नहीं दी गई है लेकिन 2006 के बाद से अब तक 3 बार ऐसी पिचों को लेकर चेतावनी दी जा चुकी है।

बेल्टर पिच (The Belter)

बेल्टर पिच (The Belter)

बेल्टर उन पिचों को कहा जाता है जिनमें पिच एकदम सपाट होती है और गेंद आसानी से बल्ले तक आती है। ऐसी पिचें सीमित ओवर क्रिकेट एक बार को अच्छी लगें जिसमें खूब सारे चौके-छक्के देखने को मिल सकते हैं लेकिन टेस्ट क्रिकेट में अक्सर इस तरह की पिच मैच का एक ही नतीजा लेकर आती हैं और वो है ड्रॉ का। इन पिचों पर अक्सर देखा गया है कि बल्लेबाज तीन-तीन दिनों तक अपने शॉटस की प्रैक्टिस करता नजर आता है लेकिन गेंदबाज सिर्फ मूक दर्शक बनें रहते हैं। इन पिचों पर गेंदबाज के लिए कुछ भी नहीं होता और कुछ देर के बाद खेल पूरी तरह से सुस्त पड़ जाता है।

उदाहरण के तौर पर ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड के बीच 2015 में पर्थ के मैदान पर खेला गया टेस्ट मैच। हालांकि 2006 के बाद से आईसीसी ने इस श्रेणी किसी भी पिच को खराब करार नहीं दिया है।

Story first published: Sunday, November 3, 2019, 17:37 [IST]
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