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बल्लेबाजों, गेंदबाजों के कौशल से ज्यादा पिच तय कर रही है मैच का फैसला, क्रिकेट में क्या है ये मामला

नई दिल्लीः क्रिकेट में इस बात को लेकर काफी बहस छिड़ गई है की एक अच्छी पिच किसको कहा जाएगा? अगर कोई पिच तेज गेंदबाजों की इतनी मदद करती है की बैटिंग करने वाली टीम 50-100 रनों के अंदर की सिमट जाती है और वह टेस्ट मैच 2 या 3 दिन के अंदर ही खत्म हो जाता है तो ऐसी पिच को भी घटिया ही करार दिया जाता है। जब कोई पिच स्पिनरों की इतनी ज्यादा मदद करें की मैच 2 या 3 दिन में फिर से खत्म हो जाए तो वह भी बेहद ही खराब कही जाती है।

पिचें 'अच्छी' और 'बुरी' क्यों हैं?

पिचें 'अच्छी' और 'बुरी' क्यों हैं?

टर्निंग पिचों को काफी खराब नजरिया से विदेशी क्रिकेटरों की नजरों में देखा जाता है। अब सवाल यहां पर यह है एक अच्छी पिच होती क्या है? क्या कोई पिच तेज गेंदबाजों की मदद करें तो इसमें उसका गुनाह है? क्या कोई पिच स्पिनरों की जन्नत साबित हो तो यह भी उस विकेट का गुनाह है? इस सवाल का जवाब देना इतना आसान नहीं है। हर परिस्थितियों में कहीं ना कहीं यही लगता है कि क्रिकेट में बल्लेबाजी को ही फायदा पहुंचाने की कोशिश की जाती रही है। हालांकि, जिन पिचों पर बहुत ही आराम से रन बनते हैं, उस विकेट को भी पाटा विकेट बोल देते है।

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बल्लेबाजों और गेंदबाजों के कौशल पर पिच की प्रकृति भारी-

बल्लेबाजों और गेंदबाजों के कौशल पर पिच की प्रकृति भारी-

यानी क्रिकेट का खेल तो बल्लेबाजों या गेंदबाजों के कौशल से ज्यादा पिच की प्रकृति पर अधिक निर्भर हो रहा है। यह किसी भी खेल के स्टैंडर्ड के लिए एक अजीब सी स्थिति है क्योंकि आपके पास बल्लेबाजों या गेंदबाजों के आंकड़ों के लिए कई सारे वैरियेबल्स मौजूद रहते हैं। अगर आप इस ग्रह पर क्रिकेट को रिप्रजेंट करने वाले सर्वश्रेष्ठ क्रिकेटरों की जमात का हिस्सा हैं तो कायदे में आपको दुनिया की किसी भी पिच पर बैटिंग और बॉलिंग करने का कौशल आना चाहिए। पिच भले ही कितनी भी खतरनाक हो लेकिन वहां बल्लेबाज का काम क्या है? आखिर वह बल्लेबाज क्यों है, क्योंकि वह गेंदों को खेलना जानता है। ऐसे में क्या उस बल्लेबाज के पास चुनौतीपूर्ण विकेट पर तकनीकी कौशल या संघर्ष करने की अपनी कला दिखाने की काबिलियत नहीं होनी चाहिए?

न्यूरोमस्कुलर सिस्टम कुछ खास तरह की पिचों पर खेलते हुए ही ट्रेंड होते हैं-

न्यूरोमस्कुलर सिस्टम कुछ खास तरह की पिचों पर खेलते हुए ही ट्रेंड होते हैं-

ठीक ऐसी ही स्थिति पाटा विकेट के लिए है जहां गेंदबाजों के पास उस तरह का हुनर होना चाहिए क्योंकि वह एक ऐसा खिलाड़ी है जो जिंदगी में सबसे अधिक काम गेंदबाजी का ही करता आया है और उसको अपने करियर के अंत तक गेंदबाजी ही करनी है। ऐसे में क्या उसके पास इन सपाट विकेटों पर बल्लेबाजों को परेशान करने का और विकेट निकालने का कौशल नहीं होना चाहिए?

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लेकिन हम देखते हैं क्रिकेट में इन बातों से ज्यादा पिचों की चर्चाएं बहुत ज्यादा होती हैं। आजकल क्रिकेट में जो हो रहा है उसको देखते हुए हम केवल यही आकलन निकाल सकते हैं कि बल्लेबाज खास परिस्थितियों में ही खेलते हुए बड़े होते हैं और उनके न्यूरोमस्कुलर सिस्टम कुछ खास तरह की पिचों पर खेलते हुए ही ट्रेंड होते हैं। खिलाड़ियों के रिप्लेक्स, खिलाड़ियों के माइंड प्रोग्राम यह सभी तब तहस-नहस हो जाते हैं जब उनको एक बिल्कुल अलग तरह की पिचें दे दी जाती है। तब अचानक वे पिचें भयानक बन जाती हैं और उनको बहुत खराब करार दे दिया जाता है।

खेलने का प्रीसेट माइंड प्रोग्राम-

खेलने का प्रीसेट माइंड प्रोग्राम-

हर खिलाड़ी का अपने देश की पिचों पर खेलने का एक प्रीसेट माइंड प्रोग्राम होता है और जब वही खिलाड़ी बाहर खेलने के लिए जाते हैं तो विदेशी परिस्थितियों में कौशल दिखाने को ही असली परीक्षण माना जाता है। यहां हम एक बात तो समझ चुके हैं कि क्रिकेट भले ही एक गेंदबाज और बल्लेबाज के बीच खेला जाता है लेकिन निर्णायक भूमिका में पिच ही होती है।

बता दें कि भारत और इंग्लैंड के बीच अहमदाबाद के चौथे टेस्ट मैच के लिए भी टर्निंग ट्रैक ही होने की उम्मीद है। टीम इंडिया के उपकप्तान अजिंक्य रहाणे ने कहा कि यह पिच भी ऐसी ही होगी जैसी की चेन्नई में दूसरे और अहमदाबाद में तीसरे मैच के दौरान थी।

Story first published: Thursday, March 4, 2021, 11:57 [IST]
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