बेंगलुरू। एक साल पहले एशियाई ओलंपिक संघ के मंच पर जब क्रिकेट को शामिल करने की बात कही गई तो भारत ने उसकी पैरवी बढ़-चढ़ कर की, लेकिन आज जब खेलने की बारी आयी तो सबसे पहले भारतीय टीम ही पीछे हट गई। क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआई के इस कदम ने क्रिकेट प्रशंसकों व आम जनता के सामने कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आखिर ऐसे क्या कारण हैं, जो टीम इंडिया ने एशियाई खेलों में हिस्सा लेने से इंकार कर दिया।
सबसे पहले हम आपको बता दें कि 1952 में एशियाई खेलों की शुरुआत भारत से ही हुई, लेकिन खेल प्रेमियों में आज बहुत कम लोग हैं, जो इस खेल की गंभीरता को समझते हैं। शायद इसके पीछे सबसे बड़ा कारण क्रिकेट का वर्चस्व है, जो पूरे देश में बढ़-चढ़ कर बोल रहा है। खैर जो भी हो, खेल प्रेमी इस बात तो आहत हैं ही कि एशिया के महासमर में हमारे देश की टीम नहीं होगी।
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सबसे पहले अगर हम आर्थिक कारणों की बात करें तो जाहिर है कि जिस तरह से इंडियन प्रीमियर लीग, क्रिकेट प्रीमियर लीग और ट्वेंटी-20 विश्व कप में धन बहाया जाता है, एशियाई खेलों में नहीं बहेगा। वहां जीतने वालों को सिर्फ मैडल मिलता है, पैसा नहीं। पैसा ही सबसे बड़ा कारण है जो आईपीएल जैसे टूर्नामेंट देसी ही नहीं विदेशी खिलाड़ियों को भी खींच लाए। ये वो प्रतियोगिताएं हैं, जहां सुबह क्रिकेट होता है और शाम को पार्टी। पार्टी भी ऐसी जिनमें फिल्मी सितारों के साथ डांस मस्ती भरी होती है। जाहिर है धन से लबालब लीग प्रतियोगिताओं में नहाने के बाद भारतीय क्रिकेटरों को एशियाई खेल कैसे रास आएंगे, यह बड़ा सवाल है।
टीम न भेजने के पीछे बीसीसीआई का तर्क है कि एशियाई खेलों के दौरान उन्हें न्यूजीलैंड की मेज़बानी करनी है। जबकि इसका हल खुद बीसीसीआई के पास भी है। रही बात खिलाड़ियों को आराम देने की तो इस तर्क को शायद कोई भी क्रिकेट प्रशंसक नहीं मानेगा। वो इसलिए क्योंकि आईपीएल की आठ टीमों के करीब 80 देसी क्रिकेटरों में से 15 तो ऐसे हैं ही, जो विश्व स्तर पर प्रदर्शन कर सकते हैं। बड़े खिलाडि़यों की बात करें तो उन्हें अच्छी तरह पता है कि टूर्नामेंट चाहे एशियाड हो या फिर आईपीएल, प्रदर्शन गिरा नहीं कि विज्ञापन घट जाएंगे। यह सवाल भी घूम-फिर कर घन पर ही आकर अटक जाता है।
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