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Tokyo Special: जिसे कभी वेटलिफ्टिंग के लायक नहीं समझा गया उसने बचायी थी भारत की लाज

Tokyo olympics
Photo Credit: Facebook

नई दिल्ली। आंध्रप्रदेश के श्रीकाकुलम जिले का एक छोटा सा गांव वूसावनिपेटा। कर्णम परिवार की एक छोटी सी लड़की ने लीक से हट कर अनोखा सपना बुना। 1987 की बात है। तब उसकी उम्र 12 साल थी। उसके स्कूल के पास ही एक साधारण सा जिम्नेजियम था। जिम्नेजियम क्या था, गांव की छोटी-मोटी व्यायामशाला थी। कुछ लड़के वहां कसरत करते थे। नीलमशेट्टी अपन्ना नामक महाशय बच्चों को कसरत करना सिखाते थे। एक दिन 12 साल की वह लड़की कोच अपन्ना के पास पहुंची। लड़कों के बीच एक लड़की को देख कर अपन्ना ने पूछा, यहां क्यों आयी हो ? लड़की ने जवाब दिया, मुझे वेटलिफ्टिंग सीखनी है। कोच ने उपहासवाली नजरों से लड़की को ऊपर से नीचे देखा फिर कहा, तुम इतनी दुबली-पतली और कमजोर दिख रही हो, भला वेटलिफ्टिंग कैसे कर पाओगी ! वेटलिफ्टर बनना हंसी खेल है क्या ? जाओ, घर चली जाओ। उस छोटी सी लड़की की उम्मीदों पर पानी फिर गया। बोझिल कदमों से घर लौटी । लेकिन अपन्ना की बात उसके दिल में कांटे की तरह चुभती रही।

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लड़की की जिद, बनूंगी तो वेटलिफ्टर ही

लड़की की जिद, बनूंगी तो वेटलिफ्टर ही

वेटलिफ्टर बनना उसके लिए आसान न था। पहले तो लोग कहने लगे कि मर्दों का खेल भला एक लड़की कैसे खेलेगी ? वजन उठाने के लिए ताकत चाहिए। वह एक छोटे से गांव में रहती थी। वहां कसरत की बात कौन पूछे, जीवन की जरूरी सुविधाएं भी बहुत कम थीं। गांव के लोग तो ये भी नहीं जानते थे कि वेटलिफ्टिंग भी कोई खेल है। लेकिन लड़की की जिद थी कि उसे हर हाल में वेटलिफ्टर ही बनना है। उसे किसी का परवाह न थी। न कोई सीखाने वाला, न कोई उपकरण, न तकनीकी ज्ञान। इसके बावजूद उसने वेटलिफ्टिंग के लिए अभ्यास शुरू कर किया। उसने दिमाग लगाया और देसी तरीके से ही बाजुओं को मजबूत करना शुरू किया। वह लड़की चार बहनें थीं। चारों को इस खेल से लगाव था। उसने वेटलिफ्टिंग के अभ्यास के लिए स्थानीय बोरबेल की वह लोहे की छड़ जिसके दोनों सिरों पर भार लगे होते हैं) का इस्तेमाल किया। छड़ साधारण होती थी जो भार से अक्सर टेढ़ी हो जाती थी। जब छड़ टेढ़ी हो जाती तो वह लड़की अपनी बहनों के साथ मिल, पूरा जोर लगा, उसे सीधा कर देती। वह यह भी नहीं जनती थी कि वेटलिफ्टिंग के लिए विशेष बेल्ट (पेट पर दबाव को कम करने के लिए) और जूतों की जरूरत होती है। बस कुछ करने की धुन थी।

छह साल में ही कायापलट

छह साल में ही कायापलट

इस अभ्यास से बाजुओं में ताकत तो आयी लेकिन बड़ी प्रतियोगितओं में शिरकत करने के लिए अभी बहुत कुछ सीखना था। उसकी जिद में ही उसका हौसला छिपा था। छह साल में ही उसकी कायापलट हो चुकी थी। 1993 में जब वह अपने गांव आयी और कोच अपन्ना से दोबारा मिली। तब तक चमत्कार हो चुका थ। उस लड़की के गले में वर्ल्ड वेटलिफ्टिंग चैम्पियनशिप का पदक लटक रहा थ। अपन्ना को थोड़ी शर्मिंदगी महसूस हुई लेकिन उस लड़की के इरादों और कामयाबी को देख कर सीना चौड़ा हो गया। इस लड़की का नाम है कर्णम मल्लेश्वरी। वे भारत की पहली महिला खिलाड़ी हैं जिन्होंने ओलम्पिक में पदक जीता है। उन्होंने सन 2000 के सिडनी ओलम्पिक में कांस्य पदक जीत था। अब वे दिल्ली खेल विश्वविद्यालय की पहली कुलपति हैं।

यूं खुली किस्मत

यूं खुली किस्मत

कर्णम मल्लेश्वरी का ये सफर बहुत मुश्किलों भरा रहा। जब वे गांव में रह कर अपनी बहनों के साथ वेटलिफ्टिंग का अभ्यास कर रहीं थी उसी दौरान उनकी बड़ी बहन कृष्णा कुमारी का चयन बेंगलुरु के इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स कैंप के लिए हो गया। कृष्णा जब बेंगलुरू गयी तो मल्लेश्वरी भी उनसे मिलने जाया करती थीं। वे जब कृष्णा के पास जाती तो स्पोर्ट्स कैंप के आधुनिक उपकरणों को देख कर अभ्यास करने का लोभ रोक नहीं पातीं। एक दिन जब वे कृष्णा के साथ वेटलिफ्टिंग कर रही थी तो स्पोर्ट्स इंस्टीट्यूट के रूसी कोच दूर से उन्हें देख रहे थे। रूसी कोच ने नोटिस किया कि इस लड़की में वेटलिफ्टिंग की नैसर्गिक प्रतिभा छिपी है। अगर इसे निखारा जाय तो यब विश्वस्तरीय प्रदर्शन कर सकती है। वे मल्लेश्वरी के पास आये और पूछा, क्या तुम वेटलिफटिंग करती हो ? मल्लेशवरी ने कहा, अपने गांव में खुद ही अभ्यास करती हूं। जो सीख है, खुद से सीखा है। कोच उनकी प्रतिभा परख चुके थे। उसी समय उन्होंने बेंगुलुरू इंस्टीट्यूट ऑफ स्पोर्ट्स के तत्कालीन डायरेक्टर वीएस प्रसाद को पत्र लिख कर मल्लेश्वरी के दाखिले की अनुशंसा कर दी। ये 1990 के एशियाई खेलों के पहले की बात है। फिर तो मल्लेश्वरी की दुनिया ही बदल गयी। रूसी कोच ने उन्हें 11 महीने तक ट्रेनिंग दी।

सिडनी ओलम्पिक में रच दिया इतिहास

सिडनी ओलम्पिक में रच दिया इतिहास

1990 में जूनियर राष्ट्रीय भारोत्तोलन प्रतियोगिता का आयोजन उदयपुर में हुआ था। मल्लेश्वरी ने 52 किलो वर्गभार स्पर्धा में शामिल हुईं और 9 राष्ट्रीय रिकॉर्ड तोड़ डाले। फिर तो वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ती चली गयीं। 1993 में उन्होंने पहली बार विश्व चैंपियनशिप का तमगा हासिल किया। 54 किलो वर्गभार में उन्होंने कांस्य पदक जीता था। एक साल बाद ही उन्होंने 1994 में विश्व चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता। यह गौरव हासिल करने वाली वे भारत की पहली महिला भरोत्तोलक बनीं। 1994 के एशियन गेम्स में सिल्वर मेडल जीता। 1997 में उन्होंने साथी वेटलिफ्टर राजेश त्यागी से शादी कर ली। लेकिन अपने बड़े लक्ष्य को भूली नहीं। शादी के बाद 1998 के एशियाई खेल में सिल्वर मेडल जीता। 2000 के सिडनी ओलम्पिक में तो उन्होंने इतिहास ही रच दिया। 69 किलो वर्गभार में उन्होंने कांस्य पदक जीता जो भारत के लिए बहुत बड़े सम्मान की बात थी। भारतीय ओलम्पिक दल के 65 खिलाडियों में सिर्फ मल्लेश्वरी ही पदक जीतने में कामयाब रहीं थी। उन्होंने भारत को खाली हाथ लौटने की शर्मिंदगी से बचाया था। जिस लड़की को कभी वेटलिफ्टिंग के लायक नहीं समझा गया था उसने एक दिन दुनिया के सामने भारत की लाज बचायी।

Story first published: Friday, June 25, 2021, 17:14 [IST]
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