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ODI क्रिकेट के वो 4 नियम जो पहले होते तो सचिन-गांगुली समेत कई खिलाड़ी नहीं रच पाते इतिहास

नई दिल्ली। क्रिकेट का इतिहास लगभग 150 साल पुराना हो चला है और इस दौरान इस खेल में कई बदलाव आये। गेंद के वजन और बल्ले के शेप को निर्धारित करने से लेकर मैदान पर खिलाड़ियों के खड़े होने की संख्या को भी निश्चित कर दिया है। क्रिकेट के मैदान पर इन नियमों को बनाने और उनकी देख रेख करने का काम अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट काउंसिल के जिम्मे आता है जिसका मुख्य उद्देश्य होता है कि वह क्रिकेट में गेंद और बल्ले के बीच के संतुलन को बना कर रखे। यही एक बड़ी वजह है कि पिछले डेढ़ दशक में सीमित ओवर्स क्रिकेट के नियमों में कई तरह के बदलाव देखने को मिले हैं।

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आईसीसी की ओर से किये गये इन नियमों का फायदा कभी बल्लेबाज को मिलता नजर आता है तो कहीं गेंदबाज को। इनमें से कुछ नियम ऐसे भी हैं जिनके न होने के चलते पिछली पीढ़ी के कई खिलाड़ियों को जबरदस्त फायदा मिला और वो महान खिलाड़ी से दिग्गज क्रिकेटर बन गये। यह कहना गलत नहीं होगा कि इन्हें देखते हुए ही आईसीसी ने इन नियमों में बड़ा बदलाव किया जिसने मौजूदा क्रिकेट को मुश्किल बना दिया है।

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आइये आज हम वनडे क्रिकेट के उन 3 नियमों के बारे में बात करते हैं जो कि अगर इस खेल में पहले बना दिये जाते तो भारतीय टीम के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली, सचिन तेंदुलकर समेत कई दिग्गज खिलाड़ियों को परेशानी आ सकती थी और शायद आज वह दिग्गज खिलाड़ियों की फेहरिस्त में अपना नाम शामिल कर पाने में नाकाम हो जाते।

पावरप्ले के दौरान फील्डिंग रिस्ट्रिक्शन्स

पावरप्ले के दौरान फील्डिंग रिस्ट्रिक्शन्स

वनडे क्रिकेट के इतिहास में साल 2005 से पहले 15 ओवर का पॉवरप्ले फेंका जाता था जिसमें फील्डिंग करने वाली टीम को 2 फील्डर कैचिंग पोजिशन पर खड़ा करना लाजमी होता था। आईसीसी के इस नियम के चलते बल्लेबाजों को अपने आक्रामक शॉट खेलने में आसानी होती थी। हालांकि साल 2005 में पावरप्ले के दौरान 15 ओवर को कम करके 10 कर दिया गया, जबकि साल 2012 में फील्डिंग रिस्ट्रिक्शन्स को भी हटा लिया गया। अगर यह नियम पहले हटा लिया गया होता तो कई बल्लेबाजो को तेजी से रन बनाने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ सकता था।

बाई रनर लेने पर बैन

बाई रनर लेने पर बैन

वनडे क्रिकेट में 2011 से पहले बल्लेबाजों के पास बाई रनर के रूप में एक बड़ी सुविधा दी गई थी जिसका उपयोग अक्सर मैदान पर खिलाड़ी करते हुए भी दिखाई देते थे। यह बाई रनर बल्लेबाज को चोटिल होने और मैदान पर भाग न सकने की स्थिति में दिया जाता था। इसके चलते बल्लेबाज कई बार जब थकने लगते तो वह बाई रनर को मैदान पर बुला लेते और वो उनकी जगह रन दौड़ने का काम करते।

पिछले समय के खिलाड़ियों की फिटनेस लेवल को ध्यान में रखा जाये तो अगर बाई रनर पर पहले बैन लगाया जाता तो कई खिलाड़ियों को भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ता न सिर्फ मैदान पर बल्कि खुद की फिटनेस पर भी ताकि वह बिना रनर के भी अच्छा कर सकें।

गेंदबाजी में बाउंसर फेंकने की छूट

गेंदबाजी में बाउंसर फेंकने की छूट

आईसीसी ने क्रिकेट के खेल में जो क्रांतिकारी बदलाव किये उनमें से एक सबसे अहम बदलाव गेंदबाजों को ओवर के दौरान बाउंसर फेंकने की मंजूरी देने का था। साल 2001 से पहले वनडे क्रिकेट में गेंदबाज को एक भी बाउंसर फेंकने की इजाजत नहीं थी। हालांकि उसके बाद जब इसकी इजाजत मिली तो कई खिलाड़ियों पर बुरा असर देखने को मिला।

ऑस्ट्रेलिया के बेस्ट फिनिशर माइकल बेवन और भारतीय टीम के तत्कालीन कप्तान सौरव गांगुली के करियर में तो इसका सीधा असर देखने को मिलता है। जहां माइकल बेवन को आउट करने के लिये बाउंसर आसान गेंद बन गई तो वहीं सौरव गांगुली को कई अहम मौकों पर इसके चलते अपनी विकेट गंवानी पड़ी। तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि बाउंसर के इस्तेमाल की छूट ने किस तरह से क्रिकेट को बदल दिया था। वहीं अक्टूबर 2012 के बाद से गेंदबाजों को एक ओवर में 2 बाउंसर गेंद फेंकने की छूट मिल चुकी है जिससे गेंदबाज और भी खतरनाक हो गये हैं।

पारी के दौरान 2 नई गेंदों का इस्तेमाल

पारी के दौरान 2 नई गेंदों का इस्तेमाल

साल 2011 से पहले वनडे क्रिकेट में केवल एक ही गेंद से पूरी पारी कराई जाती थी लेकिन मौजूदा समय में 2 नई गेंदों का इस्तेमाल किया जाता है। अगर यह नियम पहले बदल जाता तो पुरानी पीढ़ी के खिलाड़ियों को काफी परेशानी झेलनी पड़ती। पारी के दौरान 2 नई गेंदों के इस्तेमाल से गेंदबाज को अब देर तक स्विंग कराने का मौका मिलता है, जिसके चलते बल्लेबाजों को ज्यादा संभलकर बल्लेबाजी करनी पड़ती है। जबकि इस नियम से पहले गेंद सिर्फ 6-7 ओवर तक ही स्विंग करती थी। यही वजह है कि पुराने बल्लेबाजों को आज भी दो नए गेंद के नियम से बहुत ज्यादा परेशानी का सामना करना पड़ता है।

Story first published: Sunday, May 17, 2020, 15:14 [IST]
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