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हरभजन ने चुना अपना पसंदीदा कप्तान, बोले- जिंदगी भर कर्ज नहीं चुका पाऊंगा

नई दिल्ली। हर किसी की सफलता के पीछे किसा ना किसी का हाथ रहता है। हरभजन सिंह को भी अपना करियर निखारने के लिए एक समय किसी के सहारे की जरूरत थी। फिर ऐसे शख्स ने उनका हाथ थामा, जो हरभजन के लिए बेहद खास और पसंदीदा कप्तान भी बन गया। हरभजन ने 24 दिसंबर को अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट से संन्यास का ऐलान किया। उन्होंने अपने 23 साल के क्रिकेट करियर के दाैरान कई उतार-चढ़ाव देखे। हरभजन ने कई खुलासे किए, जिनसे फैंस शायद अभी तक अनजान थे। जगवाणी समाचार पत्र के पत्रकार रमनदीप सिंह सोढ़ी से बात करते हुए हरभजन ने अपना फेवरेट कप्तान चुना।

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जिंदगी भर कर्ज नहीं चुका पाऊंगा

जिंदगी भर कर्ज नहीं चुका पाऊंगा

जब उनसे सवाल किया गया कि उनका फेवरेट कप्तान काैन हैं तो पूर्व स्पिनर ने बिना कोई संकोच किए तुरंत साैरव गांगुली का नाम लिया। माैजूदा समय के बीसीसीआई अक्ष्यक्ष गांगुली की कप्तानी में हरभजन खेल चुके हैं। हरभजन के अनुसार, वही वो शख्स थे जिन्होंने मुश्किल दाैर में उनका हाथ थामा था। हरभजन ने कहा, ''मेरे फेवरेट कप्तान हमेशा गांगुली रहेंगे। उनका मैं जिंदगी भर कर्ज नहीं चुका पाऊंगा।'' अपनी जिंदगी का टर्निंग प्वाइंट भी हरभजन ने गांगुली को माना है। हरभजन ने कहा, ''जिंदगी का सबसे टर्निंग प्वाइंट गांगुली से जुड़ा है जिन्होंने उस समय मेरा हाथ थामा जब मैं नेशनल अकादमी से बाहर हो गया था। हालांकि मैं रणजी ट्राॅफी में बहुत अच्छा कर रहा था, लेकिन जो चयनकर्ता थे वो मुझे पसंद नहीं करते थे क्योंकि वो अपने पसंदीदा खिलाड़ियों को टीम में लाना चाहते थे। वो कहते थे कि हम इसे नहीं लेंगे। रणजी में 4 मैचों में 28 विकेट लेने पर भी मुझे जगह नहीं मिली थी, लेकिन गांगुली ने मेरा हाथ पकड़कर चयनकर्ताओं को कहा कि इस खिलाड़ी को एक बार देख लेना चाहिए। जब फिर गांगुली ने मुझे खेलने के माैके दिए और 2001 में टेस्ट सीरीज में मैंने 32 विकेट ले लिए, हैट्रिक ले ली। अगर उस समय गांगुली ने मेरा हाथ नहीं थामा होता था तो मैं क्रिकेट छोड़ देता।''

भगवान ने मेरी सुनी

भगवान ने मेरी सुनी

हरभजन ने आगे कहा, ''मुझे परिवार चलाना था क्योंकि मेरे पिता जी गुजर चुके थे। मेरी जरूर जाॅब थी एयर इंडिया में लेकिन वहां महीने का 8 हजार रूपए मिलता था। इस जाॅब के कारण मैं विदेश भी नहीं गया था। अगर एयर इंडिया की जाॅब तब मेरे पास नहीं होती तो शायद मैं विदेश में चला जाता क्योंकि यहां मेरे पास पैसा कमाने का कोई साधन नहीं था। लेकिन यह था कि मैंने क्रिकेट के साथ हमेशा मेहनत की। भगवान ने मेरी सुनी। उनका शुक्रिया जितना करूं उतना ही कम है।''

बाहर होने की कगार पर थे हरभजन

बाहर होने की कगार पर थे हरभजन

गाैर हो कि हरभजन ने 1998 में डेब्यू किया था। 1999 में उन्हें 5 टेस्ट खेलने का माैका मिला था, जिसमें उन्होंने 14 विकेट लिए थे। लेकिन इसके बाद उन्हें नजरअंदाज किया जाने लगा। हरभजन को साल 2000 में एक भी अतंरराष्ट्रीय मैच खेलने को नहीं मिला। लेकिन वह घरेलू क्रिकेट में लगातार मेहनत करते दिखे, जिसका फल उन्हें फिर 2001 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ हुई तीन टेस्ट मैचों की बाॅर्डर-गावस्कर ट्राॅफी में मिला। इस सीरीज में हरभजन को शामिल करने के लिए गांगुली ने ही पूरा जोर लगाया था। वहीं हरभजन ने भी पीछे मुड़कर नहीं देखा और सीरीज में 32 विकेट लेकर सबको अपना दीवाना बना लिया, साथ ही हैट्रिक भी ली। यह टेस्ट में हैट्रिक लेने वाले पहले भारतीय गेंदबाज बने थे। इसके बाद हरभजन ने टीम में अपनी जगह पक्की बना ली। इसके बाद साल 2013 तक हरभजन ने लगाताक क्रिकेट खेला।

Story first published: Sunday, December 26, 2021, 10:28 [IST]
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