क्रिकेट लीजेंड सचिन तेंदुलकर के गुरु रमाकांत आचरेकर ने तारीफ में कभी नहीं कहे ये दो शब्द
नई दिल्ली। सचिन तेंदुलकर, क्रिकेट जगत का ऐसा नाम जिनके लिए विशेषण भी बौने दिखने लगते हैं। बुधवार को क्रिकेट के इस लीजेंड ने 46वें बसंत में कदम रखा। क्रिकेट जगत की यह हस्ती जब अपना 40वां जन्मदिन मना रहे थे तब मीडिया के सामने केक काटने को लेकर बहुत ही नर्वस थे। होटल के कॉरिडोर में उनसे अनिल कुंबले मिले और उन्होंने कहा "चिंता मत करो 40 सिर्फ एक अंक है"। तेंदुलकर की उपलब्धियों के आगे 46 भी शायद एक अंक ही है और वो आज भी क्रिकेट से उतने ही लगाव के साथ जुड़े हैं जितना 14 साल की उम्र में थे। रमाकांत आचरेकर ने क्रिकेट जगत को इस खेल का सबसे बड़ा कोहिनूर दिया जो 24 सालों तक देश ही नहीं दुनियाभर में 22 गज की पिच पर धमाल मचाते रहे। हाल में ही 87 साल की उम्र में उनका निधन हो गया है, कोच या गुरू कहीं न कहीं शिष्य के जीवन में मां-बाप से भी बड़ी भूमिका निभाते हैं। सचिन को तेंदुलकर बनाने के पीछे जिस शख्स की सबसे बड़ी भूमिका है वो हैं उनके गुरू आचरेकर, जानिए इस गुरू-शिष्य की एक अनमोल कहानी।

हमेशा मिलने जाते थे सचिन
समय-समय पर सचिन तेंदुलकर अपने कोच रमाकांत आचरेकर से मिलने जाते थे। उन्होंने हाल में दिए एक साक्षात्कार में कहा कि कोच और शिक्षक माता-पिता की तरह होते हैं। उन्होंने कहा कि हम माता-पिता से अधिक समय अपने शिक्षक के साथ बिताते हैं। दादर के शिवाजी पार्क में कोच रमाकांत आचरेकर सचिन तेंदुलकर को ट्रेनिंग दिया करते थे। उन्होंने अपने साक्षात्कार में यह भी बताया कि 'सर कभी-कभी बहुत स्ट्रिक्ट भी थे, काफी अनुशासित थे लेकिन उतना ही प्यार और दुलार भी करत थे। मैं ने भले ही कितना बेहतर खेला हो लेकिन उन्होंने कभी मुझे वेल प्लेड (Well Played) नहीं कहा, हां एक बात थी सर मुझे भेल-पुरी या फिर पानी-पुरी खिलाने के लिए ले जाते तो मुझे लग जाता था कि मैं ने आज मैदान में कुछ अच्छा किया, सर आज खुश हैं।
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तगड़ी थी कोच के साथ बॉन्डिंग
सचिन ने कोच आचरेकर के साथ अपनी बॉन्डिंग को लेकर बताया कि वो समय-समय पर मुझ पर गुस्सा भी होते थे और मेरी गलतियों को भी बताते थे। उन्होंने इस इंटरव्यू में अपने बचपन का भी जिक्र किया और बताया कि "मैं बहुत ही नटखट बच्चा था, मुझे संभालना परिवार वालों को बहुत मुश्किल होता था, मैं बहुत भाग्यशाली था कि मुझे काफी बेहतर परिवार मिला, मेरे पिताजी भी बहुत शांत स्वभाव के थे और मुझ पर कभी गुस्सा नहीं होते थे, मेरी मां भी बिल्कुल ऐसी ही थी और उन्होंने मुझे आजादी दी लेकिन मैंने इसका कभी गलत इस्तेमाल नहीं किया। संयोग से मुझे कोच भी इतने ही अच्छे मिले।"

सचिन एक बार पैदा होते हैं
जब सचिन स्कूल में अभ्यास करते थे तो उनके कोच आचरेकर एक रुपये का सिक्का स्टंप पर रख देते थे और सभी गेंदबाजों से बोलते थे कि अगर उन्होंने सचिन का विकेट लिया तो वह सिक्का उनका हो जाएगा, लेकिन अगर सचिन का विकेट पूरे सेशन में कोई नहीं ले पाता था, तो वह सिक्का तेंदुलकर के नाम हो जाता था। सचिन ने कुल 13 सिक्के जीते और उसे अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा गिफ्ट मानते हैं। सचिन ने क्रिकेट जगत में दुनिया की एक से एक उपलब्धि हासिल की लेकिन उनकी सादगी आज भी दुनियाभर के नवोदित खिलाड़ियों के लिए एक मिसाल है। क्रिकेट में क्रिकेटर और क्रिकेट खिलाड़ी तो कई पैदा हो सकते हैं लेकिन सचिन एक बार ही पैदा होते हैं और एक ही रहेंगे।
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