
माही के पास है हर बड़ा खिताब
2007 में टी-20 वर्ल्ड कप, 2011 में वर्ल्ड कप, 2013 में चैंपियंस ट्रॉफी, दो बार चैंपियंस लीग और चेन्नई के लिए तीन बार आईपीएल का खिताब जीत चुके इस शख्स के नाम हर वो खिताब है, खिलाड़ी जिसके जीतने के सपने देखते हैं। अपने 37वें जन्मदिन की पूर्व संध्या पर भी टीम इंडिया की मुश्किल घड़ी में माही का मैजिक दिखा और उन्होंने 22 रन बटोरे, जहां दूसरे खिलाड़ी रनों के लिए संघर्ष करते दिखे। बात माही की हो और 7 के संयोग की चर्चा न हो तो कुछ अधूरा सा लगता है। 7 जुलाई को पैदा हुए धोनी शनिवार को अपना 37वां जन्मदिन मना रहे हैं, वो इस अंक को शुभ मानते हैं और जर्सी से लेकर अपने थाई गार्ड और हर एक बल्ले पर SEVEN लिखे हुए देखे जाते हैं।

मेहनत और जुनून से धोनी ने खुद लिखी अपनी कहानी
चीते की चाल, बाज की नजर और माही की फूर्ति पर कभी संदेह नहीं करते। क्रिकेट की दुनिया में शायद ही ऐसी कोई ट्रॉफी हो जो इस महान खिलाड़ी के नाम से जुड़कर सुशोभित न हुई हो। कहा जाता है कि कुछ लोग चांदी का चम्मच मुंह में लेकर पैदा होते हैं लेकिन कुछ अपनी लगन, मेहनत और जुनून से अपनी कहानी खुद लिखते हैं। महेंद्र सिंह धोनी से माही बनने का सफर कुछ ऐसा ही जिसे रांची में एक साधारण परिवार में जन्मे इस शख्स ने जिया और पूरी दुनिया में अपने नाम का डंका बजाया। क्रिकेट में एक कहावत काफी प्रचलित है "Captaincy brings some grey hairs on your chin' (कप्तानी के साथ ही आपकी दाढ़ी पकनी शुरू हो जाती है), लगभग 10 साल कप्तानी करने के बाद माही के साथ शायद यही हुआ और अब विराट भी इस सूची में शामिल हो चुके हैं। धोनी की उपलब्धियां जगजाहिर हैं और लगभग सभी क्रिकेट प्रशंसक उनसे जुड़ी हर छोटी-छोटी बात जान चुके हैं लेकिन क्रिकेट के कई किस्से ऐसे भी होते हैं जो आम लोगों को लंबे समय बाद पता चलता है। आज धोनी की एक ऐसी ही कहानी जिसे बहुत कम लोग जानते हैं। 2 अप्रैल 2011 की वो रात जिसने धोनी को देश का नया हीरो और टीम इंडिया को 28 साल बाद विश्व कप विजेता बना दिया।

2011 क्रिकेट विश्वकप की वो रात...
लेकिन उस रात टीम इंडिया के ड्रेसिंग रूम में दो किस्से ऐसे हुए थे जिसे क्रिकेट प्रशंसक जानकर आश्चर्य करते हैं। टीम इंडिया के सबसे विस्फोटक बल्लेबाज वीरेंद्र सहवाग बिना खाता खोले पवेलियन लौट चुके थे और क्रिकेट के भगवान(सचिन तेंदुलकर) जिनके लिए टीम इंडिया के सभी खिलाड़ी (खासकर युवराज सिंह) विश्व कप जीतना चाहते थे वो भी 14 गेंदों में 18 रन बनाकर पवेलियन लौट चुके थे। क्रीज पर मौजूद थे युवा विराट कोहली और बड़े मैचों में शानदार प्रदर्शन कर टीम को जिताने वाले आक्रामक गौतम गंभीर। अगर आपसे यह कहा जाए कि उस रात माही नहीं बल्कि सचिन टीम इंडिया के कप्तान थे तो शायद आपको आश्चर्य होगा लेकिन सच कुछ ऐसा ही है।

सहवाग ने खोला था ये अहम राज
पहला किस्सा सहवाग और सचिन के बीच हुआ था। सहवाग से अगर कोई पूछे के आपके करियर का बेस्ट क्रिकेटिंग मोमेंट क्या है तो वो शायद कहेंगे 'मैंने जिसे लाइव नहीं देखा' वो था टीम इंडिया का विश्व कप चैंपियन बनना। सचिन तेंदुलकर क्रिकेट में टोटके को काफी मानते हैं, पहले बायां पैड पहनना हो या फिर पुराने जमाने की क्लिप वाले पैड हों वो इन चीजों में विश्वास करते थे। एक ऐसा ही किस्सा उस रात भी हुआ था। वीरू ने एक साक्षात्कार में यह कबूल किया कि 'भगवान जी ड्रेसिंग रूम में बैठकर मैच देख रहे। थे मैं बाहर से आया और उनके पास आकर बैठ गया, मैं जैसे ही बैठा एक चौका लग गया, मैं उठकर बाहर जा रहा था तब इन्होंने कहा बैठा रह बाहर मत जा, तू यहां बैठा रहेगा तो ये अच्छा खेलेगा। फिर थोड़ी देर बातचीत चली मैं जैसे ही उठने लगा तो फिर चौका लग गया। तब इन्होंने कहा तू अब यहां से हिलेगा नहीं। वीरू ने यह भी बताया कि पाजी के बैटिंग किट में भगवान की एक तस्वीर लगी थी वो सामने खुला रखा था और हम दोनों वहीं बैठे रहे।

दिग्गज के कंधों पर बैठ माही बने कैप्टन कूल
दूसरा किस्सा माही और सचिन से जुड़ा है। पूरी दुनिया जानती है सचिन ने धोनी के स्किल और क्रिकेटिंग ब्रेन को देखते हुए सबसे पहले उनका नाम कप्तान के लिए आगे बढ़ाया था और बाकी तो इतिहास ही है। धोनी ने भी कई मौकों पर साक्षात्कार में यह माना है कि अगर टीम इंडिया में सचिन, सहवाग, राहुल और लक्ष्मण जैसे दिग्गज नहीं होते तो वो कभी एक सफल कप्तान नहीं बनते। सचिन टीम के कप्तान नहीं होने के बावजूद माही की मदद एक अप्रत्यक्ष कप्तान के रूप में हमेशा करते थे। इस बात का भी खुलासा सहवाग ने ही किया। माही के कप्तानी के शुरुआती दिनों में सचिन फील्ड सजाने, किससे अगले ओवर गेंद करानी है या अब कौन बैटिंग के लिए जाएगा इसके लिए भले ही नहीं टोकते थे लेकिन कुछ अहम निर्णय मिसाल बन गए। उन्होंने बताया कि चाहे टीम में कप्तान कोई भी रहा हो, दादा हों, राहुल या फिर कुंबले और माही, पाजी का मकसद सिर्फ यही होता था कि मैं इसे कैसे मदद कर सकता हूं। टीम में एक समय ऐसा भी था जब पाजी कप्तान नहीं होने के बावजूद टीम के कई अहम फैसले लेते थे। खुद माही को बहुत नहीं बोलते थे लेकिन इनका संदेशवाहक मैं होता था। ये मुझे हमेशा कहते थे कि "लाला माही को ये बोल, लाला माही को इसको यहां रखने को बोल रहे हैं। मैं उसे जाकर बोलता था भाई पाजी ऐसे बोल रहे हैं, इन दोनों के बीच में मैं फंस जाता था। वीरू ने यह भी बताया कि एक बार मोहाली में इन्होंने मुझे कहा था कि तू जा न माही को बोल कि गौतम गंभीर को पुश करे कि वो खेले तो मैं ने कहा आप खुद गौतम को क्यों नहीं बोलते तो इन्होंने कहा मैं किसी खिलाड़ी को नहीं बोल सकता।

पहली बार माही को सचिन ने दिया डायरेक्ट मैसेज
वर्ल्ड कप 2011, वानखेड़े स्टेडियम में उस समय पिच पर गंभीर और विराट बल्लेबाजी कर रहे थे। युवराज सिंह अपने जीवन के सबसे बेहतरीन फॉर्म में थे। धुंआधार बल्लेबाजी और शानदार गेंदबाजी से 'मैन ऑफ द सीरीज' बने युवी को वर्ल्ड कप के फाइनल में विराट के आउट होने के बाद बल्लेबाजी के लिए नहीं भेजा गया तो पूरी दुनिया हैरान रह गई लेकिन इसके पीछे की कहानी के स्क्रिप्ट लिखने वाले हैं सचिन तेंदुलकर जिन्होंने पहली बार माही को डायरेक्ट मैसेज पास किया। जब सचिन और सहवाग एक साथ बैठकर ड्रेसिंग रूम में मैच देख रहे थे ठीक उसी पल माही ड्रेसिंग वहां आए सचिन ने माही से कहा 'अगर राइटी आउट हुआ तो राइटी जा और अगर लेफ्टी आउट हो तो लेफ्टी जाना', इतना कहने के बाद माही जैसे ही टॉयलेट गए, थोड़ी देर बात विराट कोहली आउट हो गए और सचिन की बात मानकर माही ने युवराज को भेजने की जगह खुद को प्रमोट किया और बाकी क्या हुआ पूरी दुनिया जानती है। युवारज को पहले नहीं भेजने पर आज तक पूरी दुनिया में क्रिकेट फैंस और आलोचकों के बीच माही अपने निर्णय पर आलोचना झेलते हैं लेकिन यह फैसला उनका नहीं बल्कि खुद क्रिकेट के भगवान का था। माही ऐसे नहीं बनते हैं। दुनिया में क्रिकेट खेलने वाले खिलाड़ी तो कई आए हैं और आते रहेंगे लेकिन सिर्फ किस्मत से कोई धोनी नहीं बनता। माही को परिभाषित करने के लिए तीन शब्द काफी हैं 'शानदार कप्तान, जानदार विकेटकीपर और बेस्ट क्रिकेटिंग माइंड' जो शायद भारत को फिर न मिले।


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