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उन्होंने ओलम्पिक में भारत को सिल्वर मेडल दिलाया लेकिन हमने उन्हें भुला दिया

नई दिल्लीः कई बार वक्त वैसे सहज और विनम्र व्यक्ति के साथ नाइंसाफी कर देता है जो अपनी उपलब्धियों का ढिंढोरा नहीं पीटते। उनके राष्ट्रीय योगदान की चर्चा तक नहीं होती। जिस सपूत ने दुनिया में देश का मस्तक ऊंचा किया, उसे भी भूल जाते हैं। ये गुजरे जमाने की नहीं बल्कि कुछ साल पहले की बात है। ओलम्पिक रजत पदक विजेता विजय कुमार क्या याद हैं ? 2004 के ओलम्पिक में सिल्वर मेडल जीतने वाले शूटर राज्यवर्धन सिंह राठौर आज कहां से कहां पहुंच गये। लेकिन 2012 के ओलम्पिक रजत पदक विजेता विजय कुमार की शायद ही चर्चा होती है। उन्हें वह प्रतिष्ठा नहीं मिली जिसका वे हकदार रहे। हद तो ये है कि उनके साथ अफसरशाही ने बुरा सुलूक किया। क्या चमकदमक से दूर एक लोप्रोफाइल खिलाड़ी होना उनकी गलती थी ?

मेडल पर मेडल जीते फिर भी लोग अंजान

मेडल पर मेडल जीते फिर भी लोग अंजान

विजय कुमार ने 2012 के लंदन ओलम्पिक में 25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल प्रतियोगिता में रजत पदक जीता था। इस स्पर्धा में वे 2004 में ही भारत के राष्ट्रीय चैम्पियन बन चुके थे। 2006 के राष्ट्रमंडल खेलों में दो गोल्ड मेडल जीता था। 2006 के कतर एशियाई खेल में उन्हें एक स्वर्ण (टीम इवेंट) और एक कांस्य पदक मिल चुका था। 2009 के आइएसएसएफ विश्व कप में वे रजत पदक जीते थे। 2010 के राष्ट्रमंडल खेलों में उन्हें 3 स्वर्ण पदक मिला था। इसके बावजूद जब उन्होंने लंदन ओलम्पिक में रजत पदक जीता तो लोग आश्चर्य से पूछने लगे कि ये विजय कुमार कौन है ?

मन की पीड़ा

विजय कुमार उस समय लंदन के खेल गांव में ही थे। उनके बारे में जानने के लिए लोग इतने उतावले हो गये कि सीधे उन्हें ही फोन करने लगे। लोग फोन कर-कर के उनसे ही उनके बारे में पूछने लगे। कई लोगों ने बधाई देने के बहाने यह भी कह दिया कि आपका पदक तो अप्रत्याशित है। इस बात से विजय कुमार को बहुत तकलीफ हुई थी। तब उन्होंने कहा था, ये मेरा दुर्भाग्य है कि लोग मेरी खेल उपलब्धियों से अंजान हैं। विजय कुमार पहली बार लंदन ओलम्पिक में शामिल हुए थे और पहली बार में ही व्यक्तिगत स्पर्धा का रजत पदक जीत लिया। ऐसे महान खिलाड़ी को जब हिमाचल प्रदेश सरकार ने डीएसपी बनाने की घोषणा की तो अफसरशाही ने उन्हें खूब दौड़ाया। अंत में जब वे मुख्यमंत्री से मिले तब जा कर उनकी नियुक्ति हुई।

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शानदार निशानेबाज-

शानदार निशानेबाज-

हिमाचल प्रदेश के रहने वाले विजय कुमार के पिता बांकू राम सेना में सूबेदार थे। विजय कुमार बचपन में उनकी बंदूक देख कर बड़े हुए थे। जब उनके पिता घर में शूटिंग प्रैक्टिस की बात करते तो वे बहुत रोमाचिंत होते। वे सेना में बहाल हो कर शूटर बनने का सपन देखने लगे। उनका सपना सच हुआ। उनका चयन सेना में हो गया। शूटिंग में उनकी दिलचस्पी देख कर उनका तबादला आर्मी मार्क्समैनशिप यूनिट में कर दिया गया। वे रूसी प्रशिक्षक की देखरेख में रैपिड फायर और सेंटर फयर पिस्टल शूटिंग का अभ्यास करने लगे। 2004 में वे 25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल स्पर्धा में राष्ट्रीय चैम्पियन बन गये। इसके बाद वे सफलता की सीढ़ियां चढ़ते चले गये। 2012 के लंदन ओलम्पिक में अधिकतर लोग अभिनव बिंद्रा और गगन नारंग से ही पदक की आशा कर रहे थे। अभिनव 2008 के बीजिंग ओलम्पिक में शूटिंग का गोल्ड मेडल जीत चुके थे। लेकिन वे 2012 में उन्हें कोई पदक नहीं मिला। वे पहले दौर में ही बाहर हो गये थे। गगन नांरग केवल कांस्य पदक ही जीत पाये। लेकिन विजय कुमार ने सबको चौंकाते हुए रजत पदक पर कब्जा जमा लिया।

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ऐसे जीता रजत पदक

लंदन ओलम्पिक में जब 25 मीटर रैपिड फायर पिस्टल प्रतियोगिता शुरू हुई तो विजय कुमार क्वालिफाइंग राउंड में छठे सथान पर रहे। इसकी वजह से उनकी पदक दावेदारी को कमजोर माना जाना लगा। लेकिन इसके बाद उन्होंने ध्यान एकाग्र किया। सटीक निशाना लगा कर वे सेमीफाइनल में पहुंचे और चौथे स्थान पर रहे। फिर फाइनल में स्थान बनाया। फाइनल में उन्होंने बेहतरीन निशाना साधा। क्यूबा के ल्यूरिस पूपो ने 34 अंक हासिल कर स्वर्ण पदक जीता। विजय कुमार ने 30 अंक के साथ रजत पदक प्राप्त किया। चीन के दिंग फेंग 27 अंक के साथ तीसरे स्थान पर रहे और कांस्य पदक पाया। पदक जीतने पर विजय कुमार ने कहा था, जब मैं फाइनल में पहुंच गया था तो मुझे पदक जीतने का भरोसा हो चुका था। मैंने अपनी भावनाओं को काबू में रखा और सारा ध्यान टारगेट हिट करने में लगाया। इस बड़ी उपलब्धि पर हिमाचल प्रदेश सरकार ने विजय कुमार को एक करोड़ रुपये का पुरस्कार दिया था।

ऐसे विशिष्ट खिलाड़ी की कद्र न की

ऐसे विशिष्ट खिलाड़ी की कद्र न की

सेना में 15 साल की सेवा के बाद विजय कुमार 2017 में रिटायर हो गये। फिर उन्होंने पढ़ाई शुरू की। बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन में बीए की डिग्री हासिल की। खेल में उनके विशिष्ट योगदान को देख कर हिमाचल प्रदेश सरकार ने उन्हें सीधे डिप्टी सुपरिन्टेंडेट ऑफ पुलिस (डीएसपी) बनाने की घोषणा की थी। लेकिन अफसर उनकी फाइल दबाये बैठे रहे। दो साल तक वे अपनी नियुक्ति के लिए दौड़ते रहे। विजय कुमार पद्मश्री, अर्जुन अवार्ड, राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार से सम्मानित खिलाड़ी हैं। इसके बाद भी अधिकारियों ने उनकी कद्र नहीं की। अंत में वे हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर से मिले। आखिरकर फरवरी 2019 में उन्हें डीएसपी के पद पर नियुक्त किया गया।








Story first published: Thursday, July 1, 2021, 11:50 [IST]
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