नई दिल्ली। देश को आजाद हुए 50 साल से ज्यादा का समय बीत चुका था और भारत लगातार धीरे-धीरे हर क्षेत्र में अपना नाम बनाने की राह पर अग्रसर था। हालांकि ओलंपिक के इतिहास में भारत के पास हॉकी, कुश्ती और टेनिस के अलावा किसी और खेल में पदक नहीं आ सका था। 20वीं सदी तक भारतीय खेल इतिहास में निशानेबाजी को लेकर चर्चा भी नहीं थी लेकिन 2004 के एथेंस ओलंपिक्स में कुछ ऐसा हुआ जिसने सब कुछ बदल कर रख दिया। नतीजा टोक्यो ओलंपिक में भारत निशानेबाजों का अपना सबसे बड़ा दल भेजने की तैयारी कर रहा है और देश को कई पदक जीतने की भी उम्मीद है।
आज हम अपने ओलंपिक के योद्धाओं को समर्पित कैंपेन ग्लोरी ऑफ इंडिया में उसी ऐतिहासिक क्षण के बारे में बात करने जा रहे हैं जिसने ओलंपिक के 104 साल के इतिहास में भारत को पहला निशानेबाजी का पदक दिलाने का काम किया। फौज में शामिल राजस्थान के कर्नल राज्यवर्धन सिंह राठौर ने 1998 में निशानेबाजी को लेकर अपने करियर की शुरुआत की। इस वक्त राठौर की उम्र लगभग 28 साल थी। फौज से करियर का आगाज करने के चलते राज्यवर्धन सिंह राठौर को देर से शुरू करने के बावजूद सीखने में ज्यादा कठिनाई नहीं हुई।
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राज्यवर्धन सिंह राठौर ने साल 1998 में करियर की शुरुआत की और बहुत जल्द अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर सफलता का परचम लहराते हुए 2002 के कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीता। मैनचेस्टर कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड जीतने के बाद राज्यवर्धन सिंह राठौर का प्रदर्शन दिन ब दिन बेहतर होता चला गया और उन्होंने पहले वर्ल्ड शॉटगन चैम्पियनशिप में ब्रॉन्ज, शूटिंग विश्व कप में गोल्ड और एशियन क्ले शूटिंग चैम्पियनशिप में गोल्ड मेडल जीता।
हालांकि राज्यवर्धन सिंह राठौर को पता था कि अगर ओलंपिक में उन्हें पदक जीतना है तो तैयारी भी विश्व स्तरीय करनी होगी। उन्होंने ओलंपिक की तैयारियों के लिये पूर्व विश्व चैम्पियन लूका मरिनी और ऑस्ट्रेलिया के पूर्व ओलंपिक गोल्ड मेडलिस्ट रसेल मार्क के अंडर ट्रेनिंग ली जिसका फायदा उनके खेल में भी हुआ और उसमें काफी सुधार भी देखने को मिला।
अपनी बेहतरीन तैयारी के दम पर राज्यवर्धन सिंह राठौर ने ओलंपिक में शानदार एंट्री की। पुरुषों की डबल ट्रैप राइफल प्रतियोगिता में यूएई के अहमद अल माकतुम, चीन के वांग झेंग और स्वीडन के हकॉन डाल्बी पदक जीतने के सबसे प्रबल दावेदार थे लेकिन राज्यवर्धन सिंह राठौर भी चुनौती के लिे तैयार थे। क्वालिफाइंग राउंड में राठौर की शुरुआत ठीक नहीं रहे लेकिन तीन मौकों पर 135 अंक हासिल कर उन्होंने फाइनल के लिये क्वालिफाई कर लिया।
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अल माकतुम ने 144 अंक हासिल कर फाइनल में क्वालिफाई किया और उनको ओलंपिक में गोल्ड मेडल जीतना तय नजर आ रहा था लेकिन सिल्वर मेडल के लिये वांग झांग और राठौर के बीच प्रतिस्पर्धा देखने को मिल रही थी। राठौर ने फाइनल राउंड में शानदार प्रदर्शन करते हुए 44 अंक हासिल किये और वांग झांग को हराते हुए निशानेबाजी में भारत के लिये पहला मेडल जीतने का काम किया।
राज्यवर्धन सिंह राठौर के ओलंपिक में पदक जीतने के बाद भारतीय निशानेबाजी ने एक नया मोड़ ले लिया जिसने देश भर के कई युवाओं को इस खेल में भारत के लिये पदक जीतने का सपना दिया। यह राज्यवर्धन सिंह राठौर की ही प्रेरणा थी कि अभिनव बिंद्रा और गगन नारंग ने आगे चलकर भारत के लिये ओलंपिक में पदक जीतने का कारनामा किया। एथेन्स ओलंपिक्स में सिल्वर जीतने के बाद राज्यवर्धन सिंह राठौर ने भारत के लिये 2006 के एशियन गेम्स में रजत जीता और 5 साल में बीस से ज्यादा अंतर्राष्ट्रीय मेडल अपने नाम किये। 2008 ओलंपिक गेम्स में राठौर भारत के ध्वजवाहक बने लेकिन वह दोबारा यह कारनामा करने में नाकाम रहे।