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Tokyo Olympics में भारत की चुनौती पेश करेंगे ये 9 बॉक्सर, मिलिए बॉक्सिंग के 'नवरत्न' से

नई दिल्लीः इस बार टोक्यो ओलंपिक में भारत के 9 बॉक्सर चुनौती पेश करेंगे और हमेशा की तरह देश की पदक की उम्मीदें इस खेल से इस बार भी काफी ऊंची हैं।

2016 के रियो ओलंपिक में भारत को बॉक्सिंग में निराशा हाथ लगी थी। इस बार 24 जुलाई से बॉक्सिंग इवेंट शुरू होगा। इन 9 बॉक्सरों में 5 पुरुष हैं और 4 महिलाएं। आइए इनके बारे में जानते हैं-

अमित पंघाल (52 kg)- दुनिया के नंबर एक, टॉप सीड पंघाल से पदक की पक्की उम्मीद की जा रही है। हरियाणा का यह आर्मीमैन अपनी सटीक रणनीति और नियंत्रिक आक्रामकता के लिए चर्चित है। उनके पास पहले से ही विश्व चैंपियनशिप और राष्ट्रमंडल खेलों में रजत पदक, एशियाई खेलों का स्वर्ण पदक और कई एशियाई चैंपियनशिप पदक हैं। अपना पहला ओलंपिक खेल रहा 25 साल का यह मुक्केबाज पिछले चार साल से जबरदस्त रहा है।

मनीष कौशिक (63kg)- 25 साल के इस मुक्केबाज का भी ओलंपिक में डेब्यू है और उनको छुपा रुस्तम माना जा रहा है। उन्होंने 2018 राष्ट्रमंडल खेल (रजत), यह 2019 विश्व चैंपियनशिप (कांस्य) में अच्छा खेल दिखाया।

भिवानी के देवसर गांव के एक किसान के बेटे कौशिक ने 2008 के बीजिंग संस्करण में विजेंदर सिंह को ऐतिहासिक कांस्य जीतने के बाद से ओलंपिक सपनों को संजोया है।

पिछले साल जॉर्डन में एशियाई ओलंपिक क्वालीफायर के दौरान बाइसेप्स में चोट लगने के बाद वह लगभग 10 महीने तक एक्शन से बाहर रहे थे। लेकिन ओलंपिक का कोरोना के चलते स्थगित होना वास्तव में इस मुक्केबाज के लिए एक आशीर्वाद साबित हुआ। उन्होंने इस दौरान अपनी कई मजबूती को तराशा है।

विकास कृष्ण (69 kg) - ये टीम के अनुभवी खिलाड़ी हैं। दो बार के ओलंपियन देश के सबसे जाने-माने मुक्केबाजों में शामिल हैं।

हरियाणा से ताल्लुक रखने वाला यह मुक्केबाज हर स्टेप की योजना बनाना पसंद करता है। अनुभव के साथ आज कृष्ण एक अधिक कुशल लड़ाकू बन गए हैं।

29 वर्षीय अपने तीसरे और अंतिम ओलंपिक में भाग लेंगे और उन्होंने अपनी कुछ प्रमुख खामियों को दूर किया है - रिंग में संतुलन, क्लोज रेंज बॉक्सिंग और जैब। उनका कहना है कि उनका जैब अब लगभग परफेक्ट है।

आशीष कुमार (75 kg)- ये हिमाचल प्रदेश के सुंदर नगर से आते हैं। उन्होंने पिछले साल अपने पिता को खोने के एक महीने बाद टोक्यो के लिए जगह बनाई। 26 साल के आशीष ने अपने भार वर्ग की ओर धीरे-धीरे तरक्की की है। ये वही भार वर्ग है जिसमें विजेंदर ने इतिहास रचा था।

आशीष का ओलंपिक सफर सबसे आसान नहीं रहा है। उन्होंने पिता के रूप में बड़ी प्रेरणा खो दी और इस साल, COVID-19 ने उन्हें स्पेन में एक टूर्नामेंट के दौरान अपनी चपेट में ले लिया। हालांकि उनके एथलेटिक शरीर ने ये झटका बिना कोई लक्षण दिखाए झेल लिया।

आशीष हाल ही में हुई एशियाई चैंपियनशिप में थोड़ा से ऑफ कलर लग रहे थे जहां उनको कांस्य पदक मिला, लेकिन जिस तरह से उन्होंने रिंग के बाहर प्रतिकूल परिस्थितियों से जूझते हुए अपनी जगह यहां बनाई उसके बाद उनको हल्के में नहीं लिया जाएगा।

सतीश कुमार (+91 kg) - ये इन खेलों के लिए क्वालीफाई करने वाले पहले सुपर हैवीवेट हैं। वे 32 वर्षीय हैं, यानी पांच पुरुषों की टीम में सबसे उम्रदराज है, लेकिन आश्चर्य की बात है, वह इस उम्र में ओलंपिक में डेब्यू कर रहे हैं। यह प्रेरणादायक भी है।

उत्तर प्रदेश के बुलंदशहर के एक और किसान के बेटे सतीश ने राष्ट्रमंडल के साथ-साथ एशियाई खेलों में भी पदक जीते हैं।

महिला बॉक्सर-

एम सी मैरी कॉम (51 kg) - भारतीय मुक्केबाजी में अगर कोई नाम है जिसे किसी परिचय की आवश्यकता नहीं है, तो वह मैरी कॉम है। 38 वर्षीय आइकन की नजर दूसरे ओलंपिक पदक पर होगी।

छह बार की विश्व चैंपियन की उपलब्धियों और पदकों की गिनती करना थोड़ा मुश्किल हो गया है। इस उम्र में भी उनके धीमे पड़ने के संकेत नहीं हैं।

मैरी कॉम, हालांकि, यह स्वीकार करती हैं कि वह धीमी हो गई हैं, लेकिन उन्होंने अपनी मसल्स में और इजाफा करके अपने पंच में और पॉवर जोड़ने का काम किया है। वह भारतीय दल की दो ध्वजवाहकों में से एक हैं।

सिमरनजीत कौर (60 किग्रा) - लुधियाना के पंजाब के चकर गांव की प्रतिभा हैं सिमरनजीत कौर। 26 वर्षीय ने अपना पहला विश्व चैंपियनशिप पदक जीतने से चार महीने पहले 2018 में अपने पिता को खो दिया था।

अपने परिवार की इकलौती कमाने वाली कौर ने रिंग के बाहर भी कई तरह की लड़ाई लड़ी, जब वह नौकरी के लिए पंजाब सरकार का दरवाजा खटखटाती रही। उन्हें अभी भी नौकरी नहीं मिली है।

आक्रामक उनकी बड़ी ताकत हैं और उनके पंच में पूरी ताकत है लेकिन वे विपक्षी के डिफेंड के सामने थोड़ा और कंट्रोल अपने गेम में लाना चाहेंगी।।

मई में जब राष्ट्रीय शिविर में वायरस का प्रकोप हुआ था, तब उनको भी COVID-19 से लड़ाई का सामना किया था और उसके लक्षण 2-3 दिनों तक काफी गंभीर थे।

लवलीना बोर्गोहेन (69 किग्रा) - टोक्यो जाने वाली महिला बॉक्सिंग टीम में सबसे कम उम्र की महिला लो-प्रोफाइल, हाई-परफॉर्मिंग एसेट है। 23 वर्षीय ने किकबॉक्सर के रूप में शुरुआत की, स्कूल में बॉक्सिंग की और तब से दो बार की विश्व चैंपियनशिप पदक विजेता (2018 और 2019) बन गई।

पिछले साल उनको कोरोना हो गया था जिसके कारण वे इटली की एक प्रशिक्षण यात्रा से चूक गईं। वे तकनीकी रूप से मजबूत मुक्केबाज मानी जाती हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि वह सबसे बड़े खेल शो में होने के दबाव का कैसे जवाब देती है।

पूजा रानी (75 किग्रा) - अनुभवी पूजा रानी अपने करियर की शुरुआत में दस्ताने पहनने में शर्म महसूस करती थीं क्योंकि "वे एक लड़की पर अजीब लगते हैं"। ओलंपियन बनने के लिए उन दिनों के बाद से 30 वर्षीय बॉक्सर ने एक लंबा सफर तय किया है।

भिवानी की मजबूत मुक्केबाजी कल्चर से निकली पूजा ने अपने पिता को भनक नहीं लगने दी थी कि वे बॉक्सिंग को लेकर इतनी सीरियस हैं। उनको खेल में कोई चोट लगती तो अपने दोस्तों के यहां पर रहकर उसको छिपाने की कोशिश करती थी।

उनकी परेशानी तब शुरू हुई जब 2016 में दिवाली समारोह के दौरान अपना हाथ जला दिया, फिर बाद में 2017 में करियर के लिए खतरा पैदा करने वाली कंधे में चोट लग गई।

उस समय वे हार मान चुकी थी लेकिन पूरी तरह से नहीं। उन्होंने अपने करियर को बचाने के लिए बहुत मेहनत की जिसका भुगतान आज उनको मिल रहा है।

Story first published: Saturday, July 17, 2021, 14:50 [IST]
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