एक मुलाक़ात सुशील कुमार के साथ
बीबीसी एक मुलाक़ात में इस हफ़्ते हमारे मेहमान हैं बीजिंग ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचने वाले पहलवान सुशील कुमार.
इस हफ्ते हमारे मेहमान हैं, बीजिंग ओलंपिक में इतिहास रचने वाले पहलवान सुशील कुमार.
उन निर्णायक लम्हों में जब आपको पदक मिलने का फ़ैसला होना था, उस समय कैसा लग रहा था?
सुशील कुमार: यूक्रेन के पहलवान से हारने के बाद काफ़ी निराश था. सोच रहा था कि इतनी मेहनत के बाद सब कुछ एक झटके में खत्म हो गया. मेरे कोच सतपाल जी, रामफल जी, करतार जी, राजीव तोमर और दूसरे लोग मेरे साथ थे. उन्होंने मुझे काफ़ी प्रोत्साहित किया, मेरा मनोबल बढ़ाया. फिर 45 मिनट में मैंने तीन कुश्तियां लड़ी और तीनों में जीत दर्ज की.
तीनों मुक़ाबले कैसे रहे?
सुशील कुमार: पहला मुक़ाबला अमरीकी पहलवान के साथ था. ये मुक़ाबला बहुत ज़ोरदार था. फिर टक्कर बेलारूस के पहलवान से थी. अंतिम राउंड में मैंने उसे 7-0 से पछाड़ दिया. कांस्य पदक के लिए मुक़ाबला तो बहुत कठिन था. मैं बहुत थका हुआ था, जबकि कज़ाकिस्तान का पहलवान काफ़ी तरोताज़ा था. पहला राउंड मैं जीता, दूसरे और तीसरे राउंड में ग्रिप उसके पक्ष में रही. इसके बाद मैंने ज़्यादा ज़ोर लगाया और मुक़ाबला मेरे पक्ष में रहा.
तो कांस्य पदक के मुक़ाबले के लिए आखिर तक ज़ोर लगाना पड़ा?
सुशील कुमार: बिल्कुल. दिमाग ही नहीं, शरीर का भी पूरा ज़ोर लगाना पड़ा. मेरे गुरुओं ने मुझ पर काफ़ी मेहनत की थी और ये मेहनत रंग लाई.
और यकीन था कि कांस्य पदक जीत लोगे?
सुशील कुमार: हाँ, जीत का पक्का यकीन था. यहाँ से हमारे कोच यशवीर फ़ोन पर हिदायतें देते थे कि कैसे-कैसे लड़ना है. यशवीर जी शुरू से ही मेरे साथ हैं. प्रशिक्षकों ने मेरे भीतर जीत का जज़्बा भर दिया था.
जब जीत गए तो सबसे पहले क्या किया?
सुशील कुमार: जीत गया तो खुशी हुई कि चलो मेहनत सफल हुई. फिर गद्दे से उतरकर गुरू के पैर छुए और उनका आशीर्वाद लिया.
फिर घरवालों से कब बात हुई?
सुशील कुमार: जीत के बाद मेरे घर पर मीडिया वालों का तांता लगा था. इस कारण मैं अपने घरवालों से दो-तीन दिन तक बात नहीं कर पाया.
यहाँ जश्न मनाने की ख़बरें मिलती रहती थी?
सुशील कुमार: सुनकर बहुत अच्छा लगा कि मेरी जीत से देशवासी इतने खुश हैं.
कुश्ती की दुनिया के बाहर के लोग भी अब आपको पहचानने लगे हैं. कैसा लगता है?
सुशील कुमार:अच्छा लगता है. लगता है कि मेरी भी पहचान बनी है. कुल मिलाकर मजा आ रहा है.
बीजिंग ओलंपिक वहाँ गए एथलीटों के लिए ख़ास अनुभव रहा होगा. आपका क्या अनुभव रहा?
सुशील कुमार ओलंपिक में पदक जीतने वाले दूसरे भारतीय पहलवान हैं
सुशील कुमार: बीजिंग शहर घूमने का मौका तो नहीं मिला. लेकिन ओलंपिक विलेज में सुविधाएँ बेहतरीन थीं और सब कुछ व्यवस्थित था. कुछ लोगों से मिलना-जुलना होता था, लेकिन घूमने-फिरने का मौका नहीं मिला. दूसरे खेल के खिलाड़ियों से तो मेलजोल नहीं हुआ, लेकिन कुछ पहलवानों से दोस्ती ज़रूर हुई.
अभी कुश्ती में सबसे ज़्यादा किसका बोलबाला है?
सुशील कुमार: कुश्ती में रूस का दबदबा है.
अलग-अलग देशों में कुश्ती की तकनीक अलग है क्या?
सुशील कुमार: तकनीक में अंतर नहीं है. इन्हें इस्तेमाल करने के तरीक़े अलग हैं.
आपने पहलवानी के बारे में कब सोचा?
सुशील कुमार: मेरा गाँव नफजगढ़ के पास वाकड़ोला है. मुझे बचपन से ही पहलवानी का खूब शौक था. मेरा भाई भी पहलवान था. माता-पिता भी चाहते थे कि मैं पहलवानी करूँ. फिर यहाँ अखाड़े में भी खूब सुविधाएँ थी. सीनियर पहलवानों को देखकर कुश्ती करने का बढ़ावा मिला.
अच्छा अपनी दिनचर्या के बारे में कुछ बताएँ?
सुशील कुमार: सुबह साढ़े तीन बजे उठ जाते हैं. सुबह नौ बजे तक अभ्यास करते हैं. फिर खाना-पीना और दूध. फिर शाम को पाँच से सात बजे तक कसरत करते हैं. चूँकि सुबह जल्दी उठना होता है इसलिए रात को साढ़े नौ-दस बजे तक सो जाते हैं.
आपको पूरे दिन किस चीज का इंतज़ार रहता है?
सुशील कुमार: ऐसा कुछ नहीं है. मुझे मेहनत करने में मजा आता है.
तो इतनी कठोर दिनचर्या. थकान नहीं लगती?
सुशील कुमार: नहीं. हमारे कोच ऐसा कार्यक्रम बनाते हैं कि थकान नहीं होती. ट्रेनिंग इस तरह होती है कि दिमागी और शारीरिक थकान ज़्यादा नहीं होती.
खाने में क्या पसंद है?
सुशील कुमार: आलू के परांठे पसंद है. इसके अलावा कसरत के बाद दूध-बादाम भी अच्छा लगता है. चूँकि मैं शाकाहारी हूँ, इसलिए फल, दूध, मक्खन, घी खूब पसंद है. लेकिन ऐसा नहीं है कि कोई चीज बहुत ज़्यादा पसंद हो.
डॉक्टर तो कहते हैं कि दूध, मक्खन, घी खाने से मोटापा बढ़ता है?
सुशील कुमार: हम कसरत करते हैं, इसलिए ये चीजें खाते हैं. मेहनत करते हैं, इसलिए फिट हैं.
अगर पहलवान नहीं होते तो क्या होते?
सुशील कुमार: ऐसा दिमाग में कभी नहीं आया कि क्या करना है. बस शुरू से ही अच्छा पहलवान बनने की लगन थी.
आपके पिताजी का कहना है कि आप बचपन में बहुत अनुशासित थे और ज़्यादा शैतान नहीं थे. क्या ये सही बात है?
सुशील कुमार: सही होगी. अब बचपन की ज़्यादातर बातें तो याद रहती नहीं हैं. मैं पहले से ही ऐसा हूँ. फिर मेरे गुरुओं ने भी मुझे अनुशासित रहना सिखाया और कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया.
तो क्या पहलवान गुस्से वाले नहीं होते?
सुशील कुमार: पहलवान आमतौर पर बहुत शांत दिमाग वाले होते हैं. जो झगड़ा करते हैं, वो पहलवान नहीं होते, जो मारपीट जैसी हरकतें करते हैं. पहलवान को मुक़ाबले के दौरान गुस्सा आता है. उसकी कोशिश होती है कि विपक्षी पहलवान को पटकना है.
कुश्ती के दौरान सबसे अहम क्या होता है?
सुशील कुमार: सभी चीजों का ध्यान रखना होता है. संतुलन बनाए रखना होता है. चुस्ती-फुर्ती तो है ही, दिमाग का भी पूरा इस्तेमाल करना होता है.
बीजिंग ओलंपिक में पहला मुक़ाबला गंवाने के बाद सुशील ने ज़ोरदार वापसी की
कुश्ती के अलावा दूसरे खेलों में भी दिलचस्पी है?
सुशील कुमार: हाँ. हम फ़ुटबॉल, हैंडबॉल, बास्केटबॉल खेलते हैं. खेल देखने का भी खूब शौक है. रोनाल्डो, बेकहम, रोनाल्डिन्हो बेहतरीन खिलाड़ी हैं.
आप भी रोनाल्डो, रोनाल्डिन्हो की तरह स्टार बन गए हैं. लोगों से ऐसा सुनते हैं तो कैसा लगता है?
सुशील कुमार: सुनकर खुशी तो होती है, लेकिन इन बातों पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते. कौन क्या कह रहा है इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते.
फ़िल्में देखते हैं?
सुशील कुमार: फ़िल्में वगैरह कम ही देखते हैं. क्योंकि कुश्ती खेल ही ऐसा है. लगातार और नियमित कसरत और अभ्यास करना पड़ता है. ज़रा सा ध्यान बंटने से मामला बिगड़ सकता है. इसलिए मैं तो कुश्ती की सीडी ही देखता हूँ. किसी भी क्षेत्र में ले लीजिए. फिर चाहे पढ़ाई हो या फिर कुछ और. ध्यान भटका तो लक्ष्य नहीं मिल पाएगा.
हाल ही में कौन सी फ़िल्म देखी?
सुशील कुमार: हाल ही में धर्मेंद्र, सनी, बॉबी देओल की फ़िल्म ‘अपने देखी थी. बहुत अच्छी लगी. उसकी थीम भी खेल-खिलाड़ी पर आधारित थी. और दूसरी फ़िल्में देखने का मौका ही नहीं मिला.
कभी मन होता है कि इतने तगड़े अनुशासन को तोड़कर भाग जाएँ?
सुशील कुमार: नहीं. ऐसा नहीं है. मैं 13-14 साल से पहलवानी कर रहा हूँ. इस बात की अहमियत जानता हूँ कि अनुशासन बहुत ज़रूरी है.
सुशील कुमार: कुश्ती के दौरान चोट वगैरह लगती रहती है. दर्द भी होता है, लेकिन फिर इसका मजा भी है.
कोई तगड़ा पहलवान सामने आता है तो डर भी लगता है?
सुशील कुमार: मुक़ाबले से पहले भले ही थोड़ा बहुत डर लगे, लेकिन रिंग में घुसने के बाद ये डर खत्म हो जाता है. हर पहलवान अपने हिसाब से लड़ता है. अपने दांव लगाता है.
कुश्ती में दर्द भी होता है?
आपका फेवरिट पहलवान कौन है?
सुशील कुमार: मेरे फेवरिट और आदर्श मेरे गुरू सतपाल हैं. मैं चाहता हूँ कि मैं भी उन जैसा पहलवान बन सकूँ.
आपका पसंदीदा अभिनेता कौन है?
सुशील कुमार:फ़िल्में तो कम ही देखते हैं. धर्मेंद्र, सनी देओल पसंद हैं.
और अभिनेत्रियों में?
सुशील कुमार:उन पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया.
तो ब्रह्मचारी बने रहने का इरादा तो नहीं है. शादी करेंगे?
सुशील कुमार:इस बारे में कोच साहब ही बताएँगे. जब घरवाले और गुरुजी कहेंगे तो शादी ज़रूर करेंगे. अभी शादी के बारे में सोचा नहीं है.
भारत में क्रिकेट को इतना महत्व दिया जाता है. आपको लगता है दूसरे खेल इस कारण पिछड़े हुए हैं?
कांस्य पदक मिलने पर सुशील कुमार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा
सुशील कुमार:क्रिकेट सिर्फ़ 8-10 देशों में ही खेला जाता है. जबकि ओलंपिक में 205-207 देशों ने हिस्सा लिया था. मेरे हिसाब से मीडिया को दूसरे खेलों पर भी ध्यान देना चाहिए. मीडिया अगर कुश्ती, मुक्केबाज़ी के ज़्यादा मुक़ाबले दिखाए तो लोगों में इनके प्रति भी दिलचस्पी बढ़ेगी.
कुश्ती की दुनिया में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सुशील कुमार:अभी राष्ट्रमंडल खेलों पर हमारा ध्यान है. इन खेलों में ज़्यादा से ज़्यादा मेडल जीतने पर ध्यान है. हमें किस तरह ट्रेनिंग करनी है, हमारे कोच अभी से कार्यक्रम तैयार कर रहे हैं.
कभी ऐसा लगा कि बहुत संघर्ष करना पड़ा?
सुशील कुमार:संघर्ष तो हर क्षेत्र में करना पड़ता है. संघर्ष से कामयाबी मिलती है.
अपने परिवार में आप सबसे ज़्यादा किससे प्रेरित हैं?
सुशील कुमार:मेरी कामयाबी के पीछे मेरे पिताजी दीवान सिंह की काफ़ी मेहनत है. वो मेरे खानपान पर बहुत ध्यान देते हैं. 13-14 साल से मेरे लिए हर रोज़ घर से दूध-घी मक्खन लाते हैं.
जब आप ओलंपिक में जीते तो उन्होंने क्या कहा?
सुशील कुमार:वो बहुत खुश थे. उन्होंने कहा कि तुम्हारी मेहनत सफल हो गई. उन्होंने मुझे गले लगाया.
और मां?
सुशील कुमार: मां भी बहुत खुश है, हालाँकि बीजिंग से लौटने के बाद अभी घर जाने का समय नहीं मिला है.
जब छोटे थे और परिवार से दूर रहते थे तो क्या मुश्किल होती थी. घर वापस जाने का मन करता था?
सुशील कुमार:नहीं कभी ऐसा नहीं लगा. यहाँ बहुत प्यार मिला. ऐसा लगता था कि भाईयों के बीच रह रहे हैं. गुरुओं से माता-पिता का प्यार मिला.
सुशील आपने आगे के बारे में क्या सोचा है?
सुशील कुमार:अभी तो कुश्ती पर ही ध्यान है. बहुत दूर के बारे में अभी कुछ नहीं सोचा है.
आपको विज्ञापनों के प्रस्ताव मिल रहे हैं. कैसे प्रस्ताव स्वीकार करेंगे?
सुशील कुमार:मेरे गुरुजी और कोच ये मामला देख रहे हैं. मैं उनसे अलग नहीं चलूँगा. जो वो कहेंगे, वही करूँगा.
सतपालजी आप सुशील के गुरू हैं. हालाँकि सुशील ने पदक जीतकर खुद को साबित कर दिया है, लेकिन ये बताएँ कि सुशील आपके कैसे चेले थे?
सतपाल:मैं ये कहूँगा कि सुशील बहुत समर्पित, अनुशासित और मेहनती हैं. हर चीज को बहुत ध्यान से करना, तकनीक में उन्हें महारत हासिल है. सुशील का कुश्ती लड़ने का तरीक़ा शानदार है. कब आक्रमण करना है, कब बचाव करना है, इसका अंदाज़ा उन्हें भली-भाँति है.
कुश्ती लड़ने के लिए मेहनत, दौड़-भाग, वर्जिश तो होती ही है. इसके अलावा काफ़ी खेल तो दिमाग में भी होता होगा. इसकी तैयारी कैसे करवाते हैं?
सतपाल:हम 10-12 मिनट तक पहलवानों को योग करवाते हैं. कुश्ती दिमाग का खेल है. पहलवान कब क्या दाँव लगाएगा और इसकी काट क्या है. ये फ़ैसला सेकंड के कुछ हिस्से में करना होता है.
सुशील कब से आपके साथ हैं?
सतपाल:सुशील जब 11 साल के थे, तब मेरे अखाड़े में आ गए थे. सुशील में जो तेज़ी-फुर्ती थी उसे देख मुझे शुरू में ही इनमें छुपी प्रतिभा का पता चल गया था. पहले साल में ही 35 किलो भार वर्ग में दिल्ली में इन्होंने पहला स्थान हासिल किया, अगले साल 42 किलो में राष्ट्रीय प्रतियोगिता में पहला स्थान और फिर विश्व कैडेट में गोल्ड मेडल जीता.
यशवीर और सतपाल सुशील के गुरू हैं और सुशील की लगन के कायल हैं
मैंने भी 3000 से अधिक कुश्तियां जीती है. करीब 40 बार देश का प्रतिनिधित्व किया है. सुशील के पास अब काफ़ी अनुभव है. एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और ओलंपिक का अनुभव. हम सभी मिल बैठकर कुश्ती के नियमों, दांव पेंचों, तकनीक पर चर्चा करते हैं. सुशील ओलंपिक में वाकई गोल्ड के हक़दार थे.
मेरी वहाँ जापानी पहलवानों से बातचीत हुई. उनका कहना था कि सुशील के बराबर वज़न वाले सभी पहलवान उनकी ताक़त से डरते हैं. सुशील का कहना है कि उसका लक्ष्य अब 2010 के राष्ट्रमंडल खेल, एशियाई खेल और 2012 के लंदन ओलंपिक खेल हैं.
हम बचपन से पहलवानों के बारे में सुनते आए हैं. गामा पहलवान, गुरु हनुमान और आप. लेकिन ओलंपिक में सिर्फ दूसरी बार पदक आया. मतलब किस्सा कहानियां बहुत हैं, लेकिन पदक नहीं?
सतपाल:उसका कारण ये है कि पहले कुश्तियां अखाड़ों में लड़ी जाती थी. कुश्तियां 3-3 घंटों तक लड़ी जाती थी. अब नियम बदल गए हैं. पहले धोबीपाट, बकरा पछाड़, हाथी चिंघाड़ जैसे दांव होते थे. अब कुश्ती गद्दे पर होती है. इसका नुक़सान हमारे देश के पहलवानों को हुआ.
इंटरव्यू के दौरान हमें ये पता चला कि सुशील कड़े अनुशासन में रहते हैं. आप सुशील के कोच हैं. कहीं आना-जाना नहीं. कैसे होता है ये सब?
यशवीर सिंह:ये अपनी-अपनी सोच है. जब तक हम लक्ष्य लेकर नहीं चलेंगे, तब तक उसे हासिल भी नहीं कर सकते. मसलन पढ़ाई ही लीजिए. आईआईटी, आईएएस बनने के लिए 17-18 घंटे पढ़ना पड़ता है. दूसरी बातों से लेना-देना नहीं होता.
वैसे भी कुश्ती और दूसरे खेलों में अंतर है. कुश्ती में ब्रह्मचर्य की बहुत बड़ी भूमिका है. अगर पहलवान का ध्यान दूसरी तरफ जाएगा तो वह लक्ष्य से भटक जाएगा.
तो पहलवानों को लड़कियों से दूर रखना है?
यशवीर सिंह:बिल्कुल. लड़कियों से ही नहीं. हर उस चीज़ से जिससे उसका ध्यान भटक सकता है, उससे पहलवानों को दूर रखते हैं.
शादी तो होने देंगे बच्चों की?
यशवीर सिंह:बिल्कुल. शादी से हमें कोई ऐतराज नहीं है. 2012 के लंदन ओलंपिक खेलों के बाद हम खुद ही बोलेंगे कि अब शादी कर लो.
सुशील के बारे में और कुछ बताएँ?
यशवीर सिंह:मैं 1995 से सुशील के साथ हूँ. सुशील बहुत शर्मीला है. घूमने-फिरने का उसे कोई शौक नहीं है. प्रेक्टिस और मुक़ाबला. सुशील या तो कुश्ती लड़ेगा या फिर आराम करेगा. सुशील अनुशासन में रहने वाले हैं और बहुत विनम्र हैं.ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद भी उनमें जरा भी घमंड नहीं है. वो आज भी बड़ों और गुरुओं का आदर करते हैं.
इस हफ्ते हमारे मेहमान हैं, बीजिंग ओलंपिक में इतिहास रचने वाले पहलवान सुशील कुमार.
उन निर्णायक लम्हों में जब आपको पदक मिलने का फ़ैसला होना था, उस समय कैसा लग रहा था?
सुशील कुमार: यूक्रेन के पहलवान से हारने के बाद काफ़ी निराश था. सोच रहा था कि इतनी मेहनत के बाद सब कुछ एक झटके में खत्म हो गया. मेरे कोच सतपाल जी, रामफल जी, करतार जी, राजीव तोमर और दूसरे लोग मेरे साथ थे. उन्होंने मुझे काफ़ी प्रोत्साहित किया, मेरा मनोबल बढ़ाया. फिर 45 मिनट में मैंने तीन कुश्तियां लड़ी और तीनों में जीत दर्ज की.
तीनों मुक़ाबले कैसे रहे?
सुशील कुमार: पहला मुक़ाबला अमरीकी पहलवान के साथ था. ये मुक़ाबला बहुत ज़ोरदार था. फिर टक्कर बेलारूस के पहलवान से थी. अंतिम राउंड में मैंने उसे 7-0 से पछाड़ दिया. कांस्य पदक के लिए मुक़ाबला तो बहुत कठिन था. मैं बहुत थका हुआ था, जबकि कज़ाकिस्तान का पहलवान काफ़ी तरोताज़ा था. पहला राउंड मैं जीता, दूसरे और तीसरे राउंड में ग्रिप उसके पक्ष में रही. इसके बाद मैंने ज़्यादा ज़ोर लगाया और मुक़ाबला मेरे पक्ष में रहा.
तो कांस्य पदक के मुक़ाबले के लिए आखिर तक ज़ोर लगाना पड़ा?
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और यकीन था कि कांस्य पदक जीत लोगे?
सुशील कुमार: हाँ, जीत का पक्का यकीन था. यहाँ से हमारे कोच यशवीर फ़ोन पर हिदायतें देते थे कि कैसे-कैसे लड़ना है. यशवीर जी शुरू से ही मेरे साथ हैं. प्रशिक्षकों ने मेरे भीतर जीत का जज़्बा भर दिया था.
जब जीत गए तो सबसे पहले क्या किया?
सुशील कुमार: जीत गया तो खुशी हुई कि चलो मेहनत सफल हुई. फिर गद्दे से उतरकर गुरू के पैर छुए और उनका आशीर्वाद लिया.
फिर घरवालों से कब बात हुई?
सुशील कुमार: जीत के बाद मेरे घर पर मीडिया वालों का तांता लगा था. इस कारण मैं अपने घरवालों से दो-तीन दिन तक बात नहीं कर पाया.
यहाँ जश्न मनाने की ख़बरें मिलती रहती थी?
सुशील कुमार: सुनकर बहुत अच्छा लगा कि मेरी जीत से देशवासी इतने खुश हैं.
कुश्ती की दुनिया के बाहर के लोग भी अब आपको पहचानने लगे हैं. कैसा लगता है?
सुशील कुमार:अच्छा लगता है. लगता है कि मेरी भी पहचान बनी है. कुल मिलाकर मजा आ रहा है.
बीजिंग ओलंपिक वहाँ गए एथलीटों के लिए ख़ास अनुभव रहा होगा. आपका क्या अनुभव रहा?
सुशील कुमार ओलंपिक में पदक जीतने वाले दूसरे भारतीय पहलवान हैं
सुशील कुमार: बीजिंग शहर घूमने का मौका तो नहीं मिला. लेकिन ओलंपिक विलेज में सुविधाएँ बेहतरीन थीं और सब कुछ व्यवस्थित था. कुछ लोगों से मिलना-जुलना होता था, लेकिन घूमने-फिरने का मौका नहीं मिला. दूसरे खेल के खिलाड़ियों से तो मेलजोल नहीं हुआ, लेकिन कुछ पहलवानों से दोस्ती ज़रूर हुई.
अभी कुश्ती में सबसे ज़्यादा किसका बोलबाला है?
सुशील कुमार: कुश्ती में रूस का दबदबा है.
अलग-अलग देशों में कुश्ती की तकनीक अलग है क्या?
सुशील कुमार: तकनीक में अंतर नहीं है. इन्हें इस्तेमाल करने के तरीक़े अलग हैं.
आपने पहलवानी के बारे में कब सोचा?
सुशील कुमार: मेरा गाँव नफजगढ़ के पास वाकड़ोला है. मुझे बचपन से ही पहलवानी का खूब शौक था. मेरा भाई भी पहलवान था. माता-पिता भी चाहते थे कि मैं पहलवानी करूँ. फिर यहाँ अखाड़े में भी खूब सुविधाएँ थी. सीनियर पहलवानों को देखकर कुश्ती करने का बढ़ावा मिला.
अच्छा अपनी दिनचर्या के बारे में कुछ बताएँ?
सुशील कुमार: सुबह साढ़े तीन बजे उठ जाते हैं. सुबह नौ बजे तक अभ्यास करते हैं. फिर खाना-पीना और दूध. फिर शाम को पाँच से सात बजे तक कसरत करते हैं. चूँकि सुबह जल्दी उठना होता है इसलिए रात को साढ़े नौ-दस बजे तक सो जाते हैं.
आपको पूरे दिन किस चीज का इंतज़ार रहता है?
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तो इतनी कठोर दिनचर्या. थकान नहीं लगती?
सुशील कुमार: नहीं. हमारे कोच ऐसा कार्यक्रम बनाते हैं कि थकान नहीं होती. ट्रेनिंग इस तरह होती है कि दिमागी और शारीरिक थकान ज़्यादा नहीं होती.
खाने में क्या पसंद है?
सुशील कुमार: आलू के परांठे पसंद है. इसके अलावा कसरत के बाद दूध-बादाम भी अच्छा लगता है. चूँकि मैं शाकाहारी हूँ, इसलिए फल, दूध, मक्खन, घी खूब पसंद है. लेकिन ऐसा नहीं है कि कोई चीज बहुत ज़्यादा पसंद हो.
डॉक्टर तो कहते हैं कि दूध, मक्खन, घी खाने से मोटापा बढ़ता है?
सुशील कुमार: हम कसरत करते हैं, इसलिए ये चीजें खाते हैं. मेहनत करते हैं, इसलिए फिट हैं.
अगर पहलवान नहीं होते तो क्या होते?
सुशील कुमार: ऐसा दिमाग में कभी नहीं आया कि क्या करना है. बस शुरू से ही अच्छा पहलवान बनने की लगन थी.
आपके पिताजी का कहना है कि आप बचपन में बहुत अनुशासित थे और ज़्यादा शैतान नहीं थे. क्या ये सही बात है?
सुशील कुमार: सही होगी. अब बचपन की ज़्यादातर बातें तो याद रहती नहीं हैं. मैं पहले से ही ऐसा हूँ. फिर मेरे गुरुओं ने भी मुझे अनुशासित रहना सिखाया और कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया.
तो क्या पहलवान गुस्से वाले नहीं होते?
सुशील कुमार: पहलवान आमतौर पर बहुत शांत दिमाग वाले होते हैं. जो झगड़ा करते हैं, वो पहलवान नहीं होते, जो मारपीट जैसी हरकतें करते हैं. पहलवान को मुक़ाबले के दौरान गुस्सा आता है. उसकी कोशिश होती है कि विपक्षी पहलवान को पटकना है.
कुश्ती के दौरान सबसे अहम क्या होता है?
सुशील कुमार: सभी चीजों का ध्यान रखना होता है. संतुलन बनाए रखना होता है. चुस्ती-फुर्ती तो है ही, दिमाग का भी पूरा इस्तेमाल करना होता है.
बीजिंग ओलंपिक में पहला मुक़ाबला गंवाने के बाद सुशील ने ज़ोरदार वापसी की
कुश्ती के अलावा दूसरे खेलों में भी दिलचस्पी है?
सुशील कुमार: हाँ. हम फ़ुटबॉल, हैंडबॉल, बास्केटबॉल खेलते हैं. खेल देखने का भी खूब शौक है. रोनाल्डो, बेकहम, रोनाल्डिन्हो बेहतरीन खिलाड़ी हैं.
आप भी रोनाल्डो, रोनाल्डिन्हो की तरह स्टार बन गए हैं. लोगों से ऐसा सुनते हैं तो कैसा लगता है?
सुशील कुमार: सुनकर खुशी तो होती है, लेकिन इन बातों पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते. कौन क्या कह रहा है इस पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते.
फ़िल्में देखते हैं?
सुशील कुमार: फ़िल्में वगैरह कम ही देखते हैं. क्योंकि कुश्ती खेल ही ऐसा है. लगातार और नियमित कसरत और अभ्यास करना पड़ता है. ज़रा सा ध्यान बंटने से मामला बिगड़ सकता है. इसलिए मैं तो कुश्ती की सीडी ही देखता हूँ. किसी भी क्षेत्र में ले लीजिए. फिर चाहे पढ़ाई हो या फिर कुछ और. ध्यान भटका तो लक्ष्य नहीं मिल पाएगा.
हाल ही में कौन सी फ़िल्म देखी?
सुशील कुमार: हाल ही में धर्मेंद्र, सनी, बॉबी देओल की फ़िल्म ‘अपने देखी थी. बहुत अच्छी लगी. उसकी थीम भी खेल-खिलाड़ी पर आधारित थी. और दूसरी फ़िल्में देखने का मौका ही नहीं मिला.
कभी मन होता है कि इतने तगड़े अनुशासन को तोड़कर भाग जाएँ?
सुशील कुमार: नहीं. ऐसा नहीं है. मैं 13-14 साल से पहलवानी कर रहा हूँ. इस बात की अहमियत जानता हूँ कि अनुशासन बहुत ज़रूरी है.
सुशील कुमार: कुश्ती के दौरान चोट वगैरह लगती रहती है. दर्द भी होता है, लेकिन फिर इसका मजा भी है.
कोई तगड़ा पहलवान सामने आता है तो डर भी लगता है?
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कुश्ती में दर्द भी होता है?
आपका फेवरिट पहलवान कौन है?
सुशील कुमार: मेरे फेवरिट और आदर्श मेरे गुरू सतपाल हैं. मैं चाहता हूँ कि मैं भी उन जैसा पहलवान बन सकूँ.
आपका पसंदीदा अभिनेता कौन है?
सुशील कुमार:फ़िल्में तो कम ही देखते हैं. धर्मेंद्र, सनी देओल पसंद हैं.
और अभिनेत्रियों में?
सुशील कुमार:उन पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया.
तो ब्रह्मचारी बने रहने का इरादा तो नहीं है. शादी करेंगे?
सुशील कुमार:इस बारे में कोच साहब ही बताएँगे. जब घरवाले और गुरुजी कहेंगे तो शादी ज़रूर करेंगे. अभी शादी के बारे में सोचा नहीं है.
भारत में क्रिकेट को इतना महत्व दिया जाता है. आपको लगता है दूसरे खेल इस कारण पिछड़े हुए हैं?
कांस्य पदक मिलने पर सुशील कुमार की खुशी का ठिकाना नहीं रहा
सुशील कुमार:क्रिकेट सिर्फ़ 8-10 देशों में ही खेला जाता है. जबकि ओलंपिक में 205-207 देशों ने हिस्सा लिया था. मेरे हिसाब से मीडिया को दूसरे खेलों पर भी ध्यान देना चाहिए. मीडिया अगर कुश्ती, मुक्केबाज़ी के ज़्यादा मुक़ाबले दिखाए तो लोगों में इनके प्रति भी दिलचस्पी बढ़ेगी.
कुश्ती की दुनिया में सबसे बड़ी चुनौती क्या है?
सुशील कुमार:अभी राष्ट्रमंडल खेलों पर हमारा ध्यान है. इन खेलों में ज़्यादा से ज़्यादा मेडल जीतने पर ध्यान है. हमें किस तरह ट्रेनिंग करनी है, हमारे कोच अभी से कार्यक्रम तैयार कर रहे हैं.
कभी ऐसा लगा कि बहुत संघर्ष करना पड़ा?
सुशील कुमार:संघर्ष तो हर क्षेत्र में करना पड़ता है. संघर्ष से कामयाबी मिलती है.
अपने परिवार में आप सबसे ज़्यादा किससे प्रेरित हैं?
सुशील कुमार:मेरी कामयाबी के पीछे मेरे पिताजी दीवान सिंह की काफ़ी मेहनत है. वो मेरे खानपान पर बहुत ध्यान देते हैं. 13-14 साल से मेरे लिए हर रोज़ घर से दूध-घी मक्खन लाते हैं.
जब आप ओलंपिक में जीते तो उन्होंने क्या कहा?
सुशील कुमार:वो बहुत खुश थे. उन्होंने कहा कि तुम्हारी मेहनत सफल हो गई. उन्होंने मुझे गले लगाया.
और मां?
सुशील कुमार: मां भी बहुत खुश है, हालाँकि बीजिंग से लौटने के बाद अभी घर जाने का समय नहीं मिला है.
जब छोटे थे और परिवार से दूर रहते थे तो क्या मुश्किल होती थी. घर वापस जाने का मन करता था?
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सुशील आपने आगे के बारे में क्या सोचा है?
सुशील कुमार:अभी तो कुश्ती पर ही ध्यान है. बहुत दूर के बारे में अभी कुछ नहीं सोचा है.
आपको विज्ञापनों के प्रस्ताव मिल रहे हैं. कैसे प्रस्ताव स्वीकार करेंगे?
सुशील कुमार:मेरे गुरुजी और कोच ये मामला देख रहे हैं. मैं उनसे अलग नहीं चलूँगा. जो वो कहेंगे, वही करूँगा.
सतपालजी आप सुशील के गुरू हैं. हालाँकि सुशील ने पदक जीतकर खुद को साबित कर दिया है, लेकिन ये बताएँ कि सुशील आपके कैसे चेले थे?
सतपाल:मैं ये कहूँगा कि सुशील बहुत समर्पित, अनुशासित और मेहनती हैं. हर चीज को बहुत ध्यान से करना, तकनीक में उन्हें महारत हासिल है. सुशील का कुश्ती लड़ने का तरीक़ा शानदार है. कब आक्रमण करना है, कब बचाव करना है, इसका अंदाज़ा उन्हें भली-भाँति है.
कुश्ती लड़ने के लिए मेहनत, दौड़-भाग, वर्जिश तो होती ही है. इसके अलावा काफ़ी खेल तो दिमाग में भी होता होगा. इसकी तैयारी कैसे करवाते हैं?
सतपाल:हम 10-12 मिनट तक पहलवानों को योग करवाते हैं. कुश्ती दिमाग का खेल है. पहलवान कब क्या दाँव लगाएगा और इसकी काट क्या है. ये फ़ैसला सेकंड के कुछ हिस्से में करना होता है.
सुशील कब से आपके साथ हैं?
सतपाल:सुशील जब 11 साल के थे, तब मेरे अखाड़े में आ गए थे. सुशील में जो तेज़ी-फुर्ती थी उसे देख मुझे शुरू में ही इनमें छुपी प्रतिभा का पता चल गया था. पहले साल में ही 35 किलो भार वर्ग में दिल्ली में इन्होंने पहला स्थान हासिल किया, अगले साल 42 किलो में राष्ट्रीय प्रतियोगिता में पहला स्थान और फिर विश्व कैडेट में गोल्ड मेडल जीता.
यशवीर और सतपाल सुशील के गुरू हैं और सुशील की लगन के कायल हैं
मैंने भी 3000 से अधिक कुश्तियां जीती है. करीब 40 बार देश का प्रतिनिधित्व किया है. सुशील के पास अब काफ़ी अनुभव है. एशियाई खेलों, राष्ट्रमंडल खेलों और ओलंपिक का अनुभव. हम सभी मिल बैठकर कुश्ती के नियमों, दांव पेंचों, तकनीक पर चर्चा करते हैं. सुशील ओलंपिक में वाकई गोल्ड के हक़दार थे.
मेरी वहाँ जापानी पहलवानों से बातचीत हुई. उनका कहना था कि सुशील के बराबर वज़न वाले सभी पहलवान उनकी ताक़त से डरते हैं. सुशील का कहना है कि उसका लक्ष्य अब 2010 के राष्ट्रमंडल खेल, एशियाई खेल और 2012 के लंदन ओलंपिक खेल हैं.
हम बचपन से पहलवानों के बारे में सुनते आए हैं. गामा पहलवान, गुरु हनुमान और आप. लेकिन ओलंपिक में सिर्फ दूसरी बार पदक आया. मतलब किस्सा कहानियां बहुत हैं, लेकिन पदक नहीं?
सतपाल:उसका कारण ये है कि पहले कुश्तियां अखाड़ों में लड़ी जाती थी. कुश्तियां 3-3 घंटों तक लड़ी जाती थी. अब नियम बदल गए हैं. पहले धोबीपाट, बकरा पछाड़, हाथी चिंघाड़ जैसे दांव होते थे. अब कुश्ती गद्दे पर होती है. इसका नुक़सान हमारे देश के पहलवानों को हुआ.
इंटरव्यू के दौरान हमें ये पता चला कि सुशील कड़े अनुशासन में रहते हैं. आप सुशील के कोच हैं. कहीं आना-जाना नहीं. कैसे होता है ये सब?
यशवीर सिंह:ये अपनी-अपनी सोच है. जब तक हम लक्ष्य लेकर नहीं चलेंगे, तब तक उसे हासिल भी नहीं कर सकते. मसलन पढ़ाई ही लीजिए. आईआईटी, आईएएस बनने के लिए 17-18 घंटे पढ़ना पड़ता है. दूसरी बातों से लेना-देना नहीं होता.
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तो पहलवानों को लड़कियों से दूर रखना है?
यशवीर सिंह:बिल्कुल. लड़कियों से ही नहीं. हर उस चीज़ से जिससे उसका ध्यान भटक सकता है, उससे पहलवानों को दूर रखते हैं.
शादी तो होने देंगे बच्चों की?
यशवीर सिंह:बिल्कुल. शादी से हमें कोई ऐतराज नहीं है. 2012 के लंदन ओलंपिक खेलों के बाद हम खुद ही बोलेंगे कि अब शादी कर लो.
सुशील के बारे में और कुछ बताएँ?
यशवीर सिंह:मैं 1995 से सुशील के साथ हूँ. सुशील बहुत शर्मीला है. घूमने-फिरने का उसे कोई शौक नहीं है. प्रेक्टिस और मुक़ाबला. सुशील या तो कुश्ती लड़ेगा या फिर आराम करेगा. सुशील अनुशासन में रहने वाले हैं और बहुत विनम्र हैं.ओलंपिक में कांस्य पदक जीतने के बाद भी उनमें जरा भी घमंड नहीं है. वो आज भी बड़ों और गुरुओं का आदर करते हैं.
Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:20 [IST]
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