बीबीसी संवाददाता
दिल्ली राष्ट्रमंडल खेल शुरु होने से पहले भारत को लेकर सिर्फ़ और सिर्फ़ नकारात्मक ख़बरें सुनने में आईं लेकिन भारतीय खिलाड़ियों ने अपने बेहतरीन प्रदर्शन से पूरा माहौल बदल दिया है.
भारत अब तक 31 स्वर्ण पदकों पर कब्ज़ा जमा चुका है. राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का ये अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन है. वर्ष 2002 में मैनचेस्टर में हुए राष्ट्रमंडल खेलों में भारत को कुल 30 स्वर्ण मिले थे. लेकिन इस बार भारत उस रिकॉर्ड को पीछे छोड़ते हुए नई कीर्तिमान की ओर बढ़ रहा है.
भारतीय निशानेबाज़ों का निशाना मानो सोने के तमगों पर ही लगा रहा तो भारतीय तीरंदाज़ों के बाण भी नहीं चूके. कुश्ती में भी पहलवानों ने अपना लोहा मनावाया. पदकों की इस बरसात में उत्तर भारतीय राज्यों पंजाब, हरियाणा और हिमाचल ने ख़ासा योगदान दिया.
भारत को मिले पदकों में से हरियाणा ने सबसे ज़्यादा पदक दिलाए हैं. अगर हरियाणा को सोने की खान कहा जाए तो ग़लत नहीं होगा. कुश्ती में हरियाणा के योगेश्वर दत्त, रविंदर सिंह, संजय कुमार, अनिल और राजेंदर ने स्वर्ण जीते हैं. रजत और कांस्य में भी हरियाणा पीछे नहीं रहा.
बेटियों ने दिखाया दम
सबसे कमाल की बात ये रही कि जो राज्य कन्या भ्रूण हत्या मामलों में आगे रहा है, उसी हरियाणा की लड़कियों ने राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का नाम ऊँचा किया है.
हरियाणा में भिवानी के एक छोटे से गाँव से आने वाली गीता दिल्ली राष्ट्रमंडल खेलों में कुश्ती में स्वर्ण जीतने वाली पहली महिला रहीं. उनकी बहन बबीता ने 51 किलोग्राम फ़्रीस्टाइल कुश्ती में रजत पर कब्ज़ा किया और जज़्बा ऐसा कि रजत मिलने पर वे कह रही थीं कि वे लाज नहीं रख पाईं.
फ़्रीस्टाइल कुश्ती में हरियाणा की ही अनीता ने सोना जीता तो हरियाणा पुलिस में काम करने वाली निर्मला देवी रजत जीतकर आई हैं. डिस्कस थ्रो में तो भारत ने इतिहास रचा. हैरानी की बात नहीं कि स्वर्ण और काँस्य जीतने वाली कृष्णा पूणिया और सीमा हरियाणा की मिट्टी से हैं. निशानेबाज़ अनिसा सईद भी फ़रीदाबाद की
भारत को खेलों में पदक जिताने वाले ज़्यादातर खिलाड़ियों की एक और ख़ास बात रही. ये खिलाड़ी किसी बड़े शहर से नहीं बल्कि भारत के छोटे-छोटे गाँवों और कस्बों से हैं और परिवार ऐसे की किसी तरह गुज़र बसर होता है.
गाँव की मिट्टी
तीरंदाज़ी में भारत के लिए स्वर्ण जीतने वाली 16 साल की दीपिका कुमारी झारखंड के एक छोटे से गाँव में रहती हैं, दीपिका के पिता ऑटो रिक्शा ड्राइवर है. वहीं दस हज़ार मीटर दौड़ में कांस्य पदक जीतने वाली कविता राउत नाशिक के गाँव से आती हैं.
उन्होंने धावक बनने का फ़ैसला इसलिए किया क्योंकि इसमें वो नंगे पैर दौड़ सकती थी.... परिवार के पास इतने पैसे नहीं थे कि जूते खऱीद सके. भारत ने जिम्नास्टिक्स और तैराकी जैसी स्पार्धओं में भी खाता खोला जहाँ लोग भारत को रत्ती भर चांस देने को भी तैयार नहीं थे.
आशीष कुमार ने एक नहीं बल्कि जिम्नास्टिक्स में दो पदक जीते. तैराकी में भी इस बार भारत की झोली खाली नहीं गई. विकलांग खिलाड़ी प्रशांत ने दिखाया कि बिना सुविधाओं के अगर वो कांस्य जीत सकते हैं तो सुविधाएँ मिलने पर क्या हो सकता है.
ये नए, बदलते, उभरते भारत का वो चेहरा है जिसमें जीवट, हिम्मत और हौसला कूट कूट कर भरा हुआ है..जिनके पैर ज़मीन पर हैं पर निगाहें आसमान पर. जो जानते हैं कि सुधार की गुंजइश है और ये भी कि ये तो महज़ शुरुआत है.. अभी कई कीर्तिमान बनाने बाकी हैं.
भारत के इन जांबाज़ों की निगाहें अब एशियाई खेलों और ओलंपिक पर हैं.