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एक नहीं दो-दो बीजिंग

By रविकांत सिंह
ओलंपिक खेलों के मेज़बान बीजिंग शहर से अलग भी एक बीजिंग है. ख़ास नहीं आम बीजिंग, जहाँ लोगों को ओलंपिक खेलों से ज़्यादा कुछ मतलब नहीं.

ओलंपिक खेलों के लिए बनी जगहों, मसलन एथलीट विलेज, मीडिया विलेज, प्रेस सेंटर में शांत और सुखद माहौल है. सब तरफ़ नई हरियाली दिखती है. लेकिन जैसे ही आप बीजिंग शहर में दाख़िल होते हैं लोगों की भीड़ आपका स्वागत करती है.

हालाँकि चीनी अधिकारी और स्वंयसेवक ओलंपिक को सफल बनाने में जी-जान से जुटे हैं, लेकिन ऐसा लगता है कि आम लोगों को ओलंपिक से बहुत कुछ लेना-देना नहीं है.

शहर में ओलंपिक खेलों के लिए आए मेहमानों को चौक चौराहों पर लोग चकित नज़रों से देखते हैं. कभी-कभी तो वे इतने विस्मित दिखते हैं कि कुछ मत पूछिए.

सिर्फ़ साइकिल और मोपेड

ऐसा लगता है कि चीनियों में कहीं पहुँचने की जल्दी नहीं होती. ज़्यादातर लोग आराम से साइकिल की सवारी करते दिखते हैं. कुछ युवाओं को बैटरी चालित मोपेड से चलते देखा जा सकता है. लेकिन बीजिंग की सड़कों पर कोई मोटर साइकिल या स्कूटर नहीं दिखता.

बीजिंग में राह चलते मुसाफ़िरों को मोटर साइकिल सवार अपनी 'करतबों' से परेशान तो नहीं करते, हाँ टैक्सी ड्राइवरों से आपको ख़ासी परेशानी हो सकती है.

ज़्यादातर टैक्सी ड्राइवर मेंडेरिन भाषा के अलावा दूसरी कोई भाषा नहीं बोलते औ न ही समझते हैं. गंतव्य के बारे में लिखित हिदायतों के बावजूद वे गतंव्य तक पहुँचने के लिए शहर के नक्शे की माँग करते हैं.

ऐसा लगता है कि ओलंपिक से जुड़ी जगहों पर मुफ़्त मिलने वाले शहर के नक्शों की माँग टैक्सी ड्राइवरों में काफ़ी है जिस पर वे एक बार नज़र डाल कर चुपचाप रख लेते हैं.

यह समझ नहीं आता कि अधिकांश लोग जो शहर के नक्शे लेकर चलते हैं वह विदेशी भाषाओं में होता है जिसे टैक्सी ड्राइवर नहीं समझते, पढ़ना तो दूर की बात है.

ऐसा लगता है कि ओलंपिक स्मारिका के रूप में इन नक्शों की माँग काले बाज़ार में ख़ूब है.

निर्दयी मौसम

बीजिंग का निर्दयी मौसम आउटडोर खेलों के लिए बेहद मुश्किल साबित हो रहा है.

ओलंपिक खेलों को कवर करने आए एक अमरीकी टेलीविज़न के सदस्यों का मौत से साक्षात्कार तब हुआ जब वे प्रसिद्ध चीनी दीवार का फ़िल्मांकन कर रहे थे. जब वे दीवार के शिखर पर शूटिंग कर रहे थे तब अचानक बिजली गिरने से वे घायल हो गए.

भला हो कि तुरंत बचाव के प्रयासों के कारण दुर्घटना टल गई.

वैष्णवों की उलझन

वैसे तो ओलंपिक खेलों में खाने-पीने के मामले में काफ़ी विविधता है लेकिन वैष्णवों को काफ़ी परेशानी झेलनी पड़ रही है. खाने के ज़्यादातर पकवानों में मांस मिला होता है.

एक वरिष्ठ भारतीय पत्रकार ने मुझे बताया कि वे पके चावल, दही और उबले आलू, पालक से अपना काम किसी तरह से चला रहे हैं.

वे कहते हैं कि जब तक उन्हें कोई इस बात आश्वासन नहीं देता कि उन्हें वैष्णव भोजन मिलेगा वे फिर कभी चीन नहीं आएँगे.

यहाँ तक कि भारतीय दूतावास में भी दक्षिण एशियाई खाने की जगहों के बारे में पता लगाने पर निराशा ही हाथ लगती है.

Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:20 [IST]
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