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बीसीसीआई की बढ़ती ताक़त चिंताजनक

By रविकांत सिंह
ऐसा लगता है कि क्रिकेट की दुनिया को बीसीसीआई मनचाहे अंदाज़ में चला रहा है. वरिष्ठ पत्रकार रविकांत सिंह का विश्लेषण.

जहाँ कभी क्रिकेट भद्रलोगों के बीच आपसी मनोरंजन के लिए खेला जाता था वहीं अब ये बड़ी कॉर्पोरेशनों के प्रबंधन की बैठकों में पहुँच गया है.

बड़े बडे उद्योग घराने आज टेलीविज़न के दर्शकों को लुभाने की होड़ में इस खेल के बाज़ार में उतर चुके हैं.

वर्तमान में बीसीसीआई को इस ख़ासे प्रभाव को स्वीकारने में कोई संकोच भी नहीं है.

विरोध के बावजूद आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफ़ी की प्रतियोगिता को पाकिस्तान में आयोजित कराने का निर्णय इसका ताज़ा उदाहरण है.

यह जानते हुए कि क्रिकेट जगत में आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफ़ी का आईसीसी विश्व कप के बाद दूसरा स्थान है, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, न्यूज़ीलैंड और दक्षिण अफ़्रीका ने आईसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफ़ी पाकिस्तान कराने पर चिंता खुल कर जताई है.

उन्होंने कहा कि वे अपने खिलाड़ियों की सुरक्षा को ख़तरे में नहीं डालना चाहते.

चार वोट की अहमियत

बीसीसीआई की ताक़त की वजह क्या है इसे ढूंढ़ने के लिए हमें बहुत दूर जाने की ज़रुरत नहीं है.

बीसीसीआई यह सुनिश्चित कर लेना चाहती है कि दक्षिण एशिया के देशों- भारत, पाकिस्तान श्रीलंका और बांग्लादेशों से मिलने वाला चार वोट उसके समर्थन में ही रहे.

शरद पवार वर्ष 2010 में आईसीसी की बागडोर अपने हाथों में लेने वाले हैं

इस सबकी शुरुआत वर्ष 2001-2002 में तब हुई जब भारत और दक्षिण अफ़्रीका के बीच पोर्ट एलिज़ाबेथ में हुए टेस्ट मैच के बाद इंग्लैंड के पूर्व कप्तान माइक डेनेस ने सचिन तेंदुलकर समेत छह भारतीय खिलाड़ियों पर प्रतिबंध लगा दिया था.

अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (आईसीसी) ने भारत और दक्षिण अफ़्रीका के बीच सेंचुरियन में खेले जाने वाले अगले टेस्ट मैच को 'अनऑफ़िश्यल'घोषित कर दिया था फिर भी डेनेस को मैच रेफ़री के रूप में बर्ख़ास्त कर दिया गया.

जैसा कि दुबई में आईसीसी की कार्यकारी बैठक में लिए गए निर्णयों से स्पष्ट हुआ, अब आईसीसी की बैठकों में बीसीसीआई का ज़ोर चलता है.

सबसे ज़्यादा विवादास्पद वर्ष 2006 में इंग्लैंड और पाकिस्तान के बीच ओवल में हुए टेस्ट मैच में लिया गया निर्णय था. इस मैच में मैदान में मौजूद अंपायरों के निर्णय के विरुद्ध जाकर इंग्लैंड के पक्ष में निर्णय सुनाने की जगह इस मैच को 'अनिर्णीत' घोषित किया गया.

इससे पाकिस्तान को ओवल टेस्ट को ख़राब करने के दोष से छुटकारा मिल गया. ऐसा प्रतीत होता है कि इसी के बदले वर्ष 2009 में इंग्लैंड को ट्वेंटी-20 विश्व चैंम्पियनशिप की मेज़बानी करने का आश्वासन दिया गया.

यहाँ पर इस बात का उल्लेख करना ज़रूरी है कि ब्रितानी सरकार इंग्लैंड और वेल्स क्रिकेट बोर्ड (इसीबी) को स्पष्ट निर्देश दे चुकी है कि ज़िम्बाब्वे की टीम को देश में आने की अनुमति नहीं दी जाएगी.

आसीसी चैंम्पियंस ट्रॉफ़ी प्रतियोगिता पश्चिमी देशों के विरोध के बावजूद पाकिस्तान में ही होगी

एक सदी से ज़्यादा की अवधि में पहली बार आईसीसी की कार्यकारी बोर्ड की बैठक लंदन के बाहर दुबई में हुई. यह बैठक ज़िम्बाब्वे के मसले पर बातचीत के लिए ही हुई.

जब यह स्पष्ट हो गया कि ज़िम्बाब्वे क्रिकेट बोर्ड के अधिकारियों को इंग्लैंड जाने के लिए वीज़ा नहीं दिया जाएगा तब आईसीसी ने लंदन की जगह बैठक दुबई में करने का फ़ैसला किया.

फिर बीसीसीआई ने ज़िम्बाब्वे क्रिकेट बोर्ड के अध्यक्ष पीटर चिनगोका को मना लिया कि ज़िम्बाब्वे इंग्लैंड में होने वाली ट्वेंटी-20 चैंम्पियनशिप से अलग रहे.

साथ ही बीसीसीआई ने ज़िम्बाब्वे से आईसीसी की पूर्ण सदस्यता बरक़रार रखने और चैंम्पियनशिप में भाग लेने पर मिलने वाली पूरी राशि ज़िम्बाब्वे को देने के लिए भी पीटर चिनगोका को मना लिया. टूर्नोमेंट के लिए यह राशि लाखों डॉलर में है.

इंग्लैंड क्रिकेट बोर्ड के पास बीसीसीआई की मध्यस्थता को मानने के अलावा कोई और चारा नहीं था. इसलिए भी नहीं क्योंकि आईसीसी की बागडोर दक्षिण अफ़्रीका के रे माली के हाथों से डेविड मोरगन के हाथों में दी जा रही थी.

लेकिन मोरगन को ज़्यादा स्वतंत्रता मिलने वाली नहीं है क्योंकि बीसीसीआई के शरद पवार की उनके कामकाज पर नज़र रहेगी और वे वर्ष 2010 में आइसीसी की बागडोर अपने हाथों में लेने वाले हैं.

दक्षिण एशियाई ब्लॉक ने आईसीसी के पूर्ण सदस्य ज़िंम्बाब्वे के वोट को भी अपनी झोली में डाल लिया है. इससे क्रिकेट की दुनिया पूरी तरह से दो गुटों में बँट गई है.

हर कोई जानता है कि विश्व क्रिकेट की 70 प्रतिशत आमदनी भारत से ही आती है. लेकिन अब बीसीसीआई ने यह सुनिश्चित करना शुरु कर दिया है कि क्रिकेट की दुनिया में सिर्फ़ उसकी ही आवाज़ सुनी जाए. बीसीसीआई की बढ़ती ताक़त 'भयावह' होती जा है.

आईसीएल से टकराव

ट्वेंटी-20 टूर्नामेंट इस वर्ष के उत्तरार्द्ध में शारजाह में खेले जाने की संभावना है

बीसीसीआई ने आईसीसी के 'फ़्यूचर टूअर प्रोगाम' में ख़ासे धनी इंडियन प्रीमियर लीग के लिए भी रास्ता निकाल लिया है.

बीसीसीआई के अधिकारियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि चैंम्पियंस लीग मैच में उन खिलाड़ियों को भाग नहीं लेने दिया जाएगा जिन्होंने 'विद्रोही' इंडियन क्रिकेट लीग (आईसीएल) में भाग लिया था.

चूँकि आईसीएल के खिलाड़ियों को 'काउँटी क्रिकेट' में खेलने की पाबंदी नहीं है, इंग्लैंड बीसीसीआई के इस निर्णय से ख़ासा परेशान है. ऐसा इसलिए कि अप्रैल 30 को आए न्यायालय के एक नर्देश के कारण 25 साईसीएल खिलाड़ी 18 में से 15 काउँटीस की ओर से खेल रहे हैं.

आईपीएल के सर्वेसर्वा ललित मोदी चैंम्पियंस लीग मैच के लिए ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड, दक्षिण अफ़्रीका और भारत के अलावे संभावित देशों में श्रीलंका और पाकिस्तान का नाम दे चुके हैं.

ट्वेंटी-20 टूर्नामेंट इस वर्ष के उत्तरार्द्ध में शारजाह में खेले जाने की संभावना है.

संयुक्त अरब अमीरात में खेले जाने वाले मैचों के संदर्भ में लगे मैच फ़ीक्सिंग के आरोपों के बाद वहाँ अंतर्राष्ट्रीय मैच खेले जाने पर पाबंदी लगा दी गई थी, तब से संयुक्त अरब अमीरात खिन्न था. यह संयुक्त अरब अमीरात को शांत करने की दिशा में एक क़दम है.

यह एक सत्य है कि भारत क्रिकेट की दुनिया को चला रहा है. जिस तरीके बीसीसीआई अपने कामों को अंज़ाम दे रहा है उससे बाद इस बारे में बहुत कुछ कहने को रह भी नहीं जाता है.

Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:19 [IST]
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