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मंदी के आलम में नोटों की बरसात

By Staff

पिछले दिनों टेलीविज़न पर दिखाए गए दृश्यों से कम से कम क्रिकेट प्रशंसकों को तो फ़ख्र हुआ होगा कि संकट के इस दौर में भी उनके पसंदीदा खेल पर पैसे की बरसात हो रही है.

वाकया आईपीएल के लिए क्रिकेटरों की नीलामी का है. आईपीएल टीमों के मालिकान के चमचमाते चेहरे और उनके पास बैठे कुछ सोचते-विचारते से टीमों के सीईओ कुछ अलग सी तस्वीरें पेश कर रहे थे.

ख़ासकर तब, जब क्रिकेटरों के लिए तख्तियाँ उठाकर बोलियाँ लगाई जा रही थी और क्रिकेटरों की कीमत लाखों डॉलर में आँकी गई.

दमकते चेहरे

यहाँ तक कि भारतीय क्रिकेट बोर्ड के सचिव भी खरीदारों में शामिल रहे. आईपीएल की धारणा को साकार करने वाले ललित मोदी 'सोल्ड' की हर आवाज़ पर गर्व से चमकते-दमकते से नज़र आए.

शुक्र है आईपीएल की कमान ललित मोदी जैसे शख्स के हाथों में है, जिनकी बदौलत मंदी के दौर में एक-एक पैसा बचाने की जुगत कर रहे उद्योगपति ट्वंटी-20 के लिए ज़मकर खर्च करने को तैयार हैं.

कल्पना कीजिए कि टेलीविजन चैनलों की टीआरपी रेटिंग का तब क्या होता अगर दर्शकों से ये कहा जाता कि अपने गृह राज्य राजस्थान में भ्रष्टाचार और कई अन्य गड़बड़ियों के गंभीर आरोप झेल रहा ये वही शख्स है जो अब भी शांत है और पूरी तल्लीनता से काम कर रहा है.

एक और शख्स की बात करते हैं. उनका नाम है विजय माल्या. उन्होंने एक अंग्रेज़ खिलाड़ी को साढ़े सात करोड़ रुपये में ख़रीदा और ख़ास बात ये रही कि उनके चेहरे पर शिकन तक नहीं दिखी.

एंड्रयू फ्लिंटफ़ के लिए चेन्नई की सुपर किंग्स ने साढ़े सात करोड़ रुपये की बोली लगाई

माल्या ने पीटरसन के लिए बोली लगाई और पीटरसन इस बोली के हक़दार भी थे.

ये अलग बात है कि विजय माल्या अपनी एयरलाइंस को घाटे से उबारने के लिए सरकार से मदद माँग रहे हैं.

साथ ही वे पायलट के वेतन में भी कटौती कर रहे हैं, लेकिन जब बात भारत के असली धर्म यानी क्रिकेट और उस खेल की आती है जो भारत को माल्या की एयरलाइंस के मुक़ाबले ज़्यादा बेहतर तरीके से जोड़ता है तो माल्या के भी पीछे हटने का सवाल कहाँ उठता है. आख़िर आईपीएल का मामला अपने किसी कर्मचारी की नौकरी जाने के मुद्दे से बहुत बड़ा जो है.

स्लमडॉग मिलियनेयर

दुनिया भर में छाई मंदी की परवाह न करते हुए दो अंग्रेज क्रिकेटरों को करोड़ों की पेशकश कर आखिरकार क्रिकेट में हमने अपना लोहा मनवा ही दिया.

हमसे ये कहा जा रहा है कि अपने लिए लगी बोलियों से पीटरसन और एंड्यू फ्लिंटफ़ सकते में हैं. क्योंकि कुछ ही दिन पहले अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पिछले साल भारी बोनस लेने वाले आला बैंक अधिकारियों को जमकर लताड़ा था और उनकी हरक़त को बेहद ग़ैरज़िम्मेदाराना करार दिया था.

ग़ौरतलब है कि ये वही वित्तीय संस्थान हैं जिन्हें संभालने के लिए अब अमरीकी जनता के टैक्स का एक बड़ा हिस्सा लगाया जा रहा है.

ओबामा ने तो यहाँ तक कह दिया कि जिन कंपनियों को सरकारी वित्तीय पैकेज से मदद चाहिए, उनको अपने अधिकारियों के वेतन की सीमा पाँच लाख डॉलर यानी करीब ढ़ाई करोड़ रुपये निर्धारित करनी होगी.

इन दो अंग्रेज क्रिकेटरों को इस सीमा से तीन गुना रकम देना असली की स्लमडॉग करोड़पति कहानी है.

इसका प्रोडक्शन, डायरेक्शन और पटकथा लेखन भारतीयों ने किया है. ये वो स्लमडॉग करोड़पति फ़िल्म नहीं है जिसके लिए ऑस्कर मिलने का हम इस महीने इंतज़ार कर रहे हैं.

जय हो.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:19 [IST]
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