नई दिल्ली, 10 दिसम्बर (आईएएनएस)। पाकिस्तानी हाकी टीम के बेमिसाल डिफेंडर ब्रिगेडियर मंजूर हुसैन आतिफ के योगदान को पूरा हाकी जगत हमेशा याद रखेगा।
आतिफ ने 80 वर्ष की उम्र में कैंसर से लंबी लड़ाई लड़ने के बाद शनिवार को इस दुनिया को अलविदा कह दिया था।
एक दौर था जब गठीले बदन वाले आतिफ पाकिस्तानी हॉकी टीम की रक्षा पंक्ति की धुरी हुआ करते थे। उन्होंने कई मौकों पर भारत समेत दुनिया के कई धुरंधरों की गोल दागने की कोशिश बड़ी आसानी से नाकाम कर दी थी।
आतिफ उस दौर में पाकिस्तानी हाकी टीम का हिस्सा थे जब 1965 और 1971 के युद्ध के बावजूद दोनों देशों में हाकी के मुकाबले जारी रहे।
वर्ष 1960 में जब पाकिस्तान ने हाकी में ओलंपिक का स्वर्ण पदक जीता तो उसमें आतिफ की भूमिका महत्वपूर्ण थी। उन्होंने वर्ष 1964 में टोक्यो ओलंपिक के दौरान पाकिस्तानी हाकी टीम की कप्तानी भी की।
टोक्यो ओलंपिक में स्वर्ण पदक जीतने वाली भारतीय हाकी टीम का हिस्सा रहे हरबिंदर सिंह कहना है कि आतिफ की अगुवाई वाली उस टीम को हराना बेहद मुश्किल था। उनके मुताबिक आतिफ में एक सैन्य अधिकारी और एक सज्जन व्यक्ति के गुण कूट-कूट कर भरे थे।
उल्लेखनीय है कि एक हाकी खिलाड़ी के अलावा सैन्य अधिकारी के रूप में भी आतिफ ने पाकिस्तान की सेवा की। वर्ष 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय वे युद्धबंदी भी रहे।
हाकी को अलविदा कहने के बाद भी हाकी से आतिफ का लगाव बना रहा। वर्ष 1982 में जब पाकिस्तान ने मुंबई में आयोजित विश्व कप जीता तो वे पाकिस्तान हाकी महासंघ के सचिव थे।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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