नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) में विवादित एक-राज्य-एक-वोट जनादेश पर पुनर्विचार करने पर सहमति जताई है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐतिहासिक भूमिका निभाने वाली राज्य क्रिकेट एसोसिएशंस को दरकिनार नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को हुई सुनवाई में यह भी साफ किया कि बीसीसीआई के लिए तैयार हो रहे नए मसौदे में हो सकता है कि चयनकर्ताओं की संख्या केवल तीन तक सीमित नहीं हो। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जरूरी नहीं है कि चयनकर्ताओं की संख्या सीमित या इसके लिए किसी योग्यता जैसे उसका टेस्ट प्लेयर होना जरूरी हो।
साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक बीसीसीआई का संविधान तय नहीं हो जाता, तब तक कोई राज्य एसोसिएशन चुनाव नहीं रोक सकती। बता दें कि बीसीसीआई के अधिकारी पिछले कुछ समय से सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित कमेटी ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन (COA) के करीब-करीब हर मुद्दे पर उलझी हुई दिखे हैं।
सातवें स्टेटस रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से नियुक्त की गई विनोद राय और डायना एडुलजी की दो सदस्यीय समिति ने कार्यकारी अध्यक्ष सीके खन्ना, कार्यकारी सचिव अमिताभ चौधरी और कोषाध्यक्ष अनिरुद्ध चौधरी को हटाकर चुनाव की अनुशंसा की थी। अपनी इस स्टेटस रिपोर्ट में CoA ने कोर्ट को बताया है कि बीसीसीआई के संविधान के मुताबिक इन सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो चुका है। सीओए ने कोर्ट से ये भी सिफारिश की है कि वो लोढ़ा समिति की सिफारिशों के तहत नया संविधान नहीं अपनाने तक AGM पर भी निर्देश दे।
आपको बता दें कि करीब दो साल पहले 18 जुलाई, 2016 को सुप्रीम कोर्ट ने लोढ़ा कमेटी की 'एक राज्य एक वोट' की अनुशंसा को स्वीकार किया था और वोटिंग अधिकार के बिना बोर्ड की सदस्यता के विकल्प से इंकार किया था। 'एक राज्य एक वोट' के फैसे पर भारत के पूर्व कप्तान सुनील गावस्कर ने भी तब कहा था कि उच्चतम न्यायालय द्वारा नियुक्त जस्टिस लोढा समिति की एक राज्य एक वोट की सिफारिश से भारत में रणजी ट्रॉफी क्रिकेट का स्तर गिर सकता है। गावस्कर ने कहा था कि,''एक राज्य एक वोट की सिफारिश से कोई ऐतराज नहीं है लेकिन कई ऐसे राज्य जो प्रथम श्रेणी क्रिकेट के लिए अभी तक तैयार नहीं है, उन्हें शामिल नहीं किया जाना चाहिये क्योंकि इससे रणजी ट्राफी क्रिकेट का स्तर गिर जायेगा।"