
अलग प्रारूप में अलग कप्तान के साथ ताल-मेल बिठाना
भारतीय क्रिकेट के इतिहास में हमने पिछले दो दशक में फैन्स को हर प्रारूप में एक ही कप्तान देखने को मिला है, ऐसे में कोच और कप्तान के बीच ड्रेसिंग रूम में एक आसान लेकिन बढ़िया जुगलबंदी देखने को मिलती है। हालांकि विराट कोहली के टी20 प्रारूप की कप्तानी से इस्तीफा देने के बाद रोहित शर्मा को टीम की कमान सौंपी गई है और इससे भारतीय टीम एक बार फिर से स्प्लिट कैप्टेंसी के दौर में आ गई है। महेंद्र सिंह धोनी ने टेस्ट प्रारूप की कप्तानी छोड़ने के बाद कुछ समय तक सीमित ओवर्स प्रारूप में कप्तानी करना जारी रखा था लेकिन बाद में उन्होंने भी हर प्रारूप की कमान छोड़कर बतौर खिलाड़ी खेलना जारी रखा।
टी20 प्रारूप के बाद वनडे प्रारूप में भी रोहित शर्मा को टीम की कमान दी जाने की बात की जा रही है और माना जा रहा है कि विराट कोहली टेस्ट प्रारूप में टीम का नेतृत्व करना जारी रखेंगे। ऐसे में राहुल द्रविड़ को अलग-अलग प्रारूप में अलग-अलग कप्तान के साथ काम करना होगा।ऐसे में बतौर कोच उनकी चुनौती बढ़ जाती है क्योंकि हर प्रारूप में अलग-अलग कप्तान होने से टीम में टकराव की उम्मीद बढ़ जाती है। राहुल द्रविड़ के सामने चुनौती होगी कि ड्रेसिंग रूम में एक ऐसा माहौल तैयार करें जहां पर हर प्रारूप में अलग कप्तान होने के बावजूद खिलाड़ियों के बीच कोई दरार न आये और भारतीय टीम अपने अच्छे प्रदर्शन को जारी रखे।

केएल राहुल को फ्यूचर कैप्टेन के तौर पर तैयार करना
कोच द्रविड़ के पास अगली चुनौती होगी भारतीय टीम के अगले कप्तान को तैयार करना। चयनकर्ताओं ने कोहली के बाद रोहित को टीम की कमान जरूर सौंपी है लेकिन उनकी नजर टीम के अगले कप्तान पर भी है, ताकि जब रोहित खेल को अलविदा कहें तो भारतीय टीम में आसानी से ट्रॉन्जिशन हो सके। रोहित शर्मा 34 साल के हो चुके हैं और उनके करियर में 4 या 5 साल का खेल और बाकी है, ऐसे में कोच द्रविड़ की जिम्मेदारी होगी कि वो कप्तानी के लिये ऐसे खिलाड़ी को तैयार करें जो कि आने वाले समय में तीनों प्रारूप की कप्तानी संभाल सके। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए चयनकर्ताओं ने केएल राहुल को उपकप्तान बनाया है, हालांकि भविष्य के कप्तान के दावेदारों में ऋषभ पंत, श्रेयस अय्यर और सूर्यकुमार यादव का भी नाम शामिल है। राहुल द्रविड़ को यहां पर सभी खिलाड़ियों की क्षमता के अनुसार समझना होगा कि किसे टीम की कमान सौंपी जा सकती है और उसे भविष्य के कप्तान के रूप में तैयार करना होगा।

आईसीसी टूर्नामेंट में भारत को दबाव से जूझना सिखाना
भारतीय कोच राहुल द्रविड़ के लिये अगली चुनौती आईसीसी टूर्नामेंट के दौरान भारत के प्रदर्शन में सुधार करने पर होगी। 2013 के बाद से खेले गये अब तक के सभी आईसीसी टूर्नामेंट की बात की जाये तो भारतीय टीम हमेशा अच्छा प्रदर्शन करते हुए नॉकआउट स्टेज में क्वालिफाई कर जाती है लेकिन जहां पर उसे दबाव का सामना करना पड़ता है वह बिखर कर बाहर हो जाती है। इसी के चलते भारतीय टीम को 3 बार फाइनल और 3 बार सेमीफाइनल में हार का सामना करना पड़ा है। वहीं 2021 के टी20 विश्वकप में भी जब न्यूजीलैंड के खिलाफ उसे वर्चुअल नॉकआउट मैच खेलना पड़ा तो टीम वहां पर भी दबाव में दिखी और हार के चलते सेमीफाइनल में जगह नहीं बना पायी।
ऐसे में कोच द्रविड़ के सामने यह सबसे बड़ी चुनौती होगी कि वो खिलाड़ियों को इस दबाव से निपटने के लिये मानसिक रूप से तैयार करें और उन कमियों को दूर करें जिसकी वजह से यह समस्या पनपती है। अगर द्रविड़ ऐसा करने में कामयाब हो जाते हैं तो भारतीय टीम से आईसीसी का खिताब ज्यादा दूर नहीं रहेगा।

बिजी शेड्यूल में भारतीय खिलाड़ियों का वर्कलोड मैनेजमेंट
कोच द्रविड़ के सामने अगली चुनौती टीम इंडिया के कड़े शेड्यूल के बीच भारतीय खिलाड़ियों के वर्कलोड को मैनेज करना होगा। टीम मैनेजमेंट के लिये वर्कलोड को संभालना काफी लंबे समय से बड़ी समस्या रही है, हालांकि कोरोना वायरस के बाद इसने गंभीर रूप ले लिया है। भारतीय टीम के क्रिकेट कैलेंडर पर नजर डालें तो यह किसी भी अन्य टीम के मुकाबले ज्यादा बिजी नजर आता है और क्योंकि टीम की फैन फॉलोइंग बहुत ज्यादा है तो चयनकर्ता से लेकर मैनेजमेंट तक सिर्फ अच्छे नतीजों की उम्मीद करते हैं। यही कारण है कि भारतीय खिलाड़ी लगातार 6-9 महीने बिना किसी ब्रेक के खेलते नजर आते हैं।
कोरोना वायरस से पहले ही यह बिजी शेड्यूल काफी थकाऊ होता था लेकिन इस महमारी के आने के बाद खिलाड़ियों को बायोबबल में रहकर खेलना पड़ता है जिसके असर उनकी मेंटल हेल्थ पर देखने को मिल रहा है। विश्वकप से बाहर होने के बाद पूर्व हेड कोच रवि शास्त्री और भारतीय खिलाड़ियों ने इस मुद्दे से होने वाली परेशानी के बारे में बात की थी। ऐसे में कोच द्रविड़ के सामने यह सबसे बड़ी समस्या होगी कि वो लगातार बिजी शेड्यूल के बीच खिलाड़ियों को बराबर आराम दे सकें। टीम के प्रमुख खिलाड़ियों को वो जरूरी आराम मिल सके, जिससे आईसीसी टूर्नामेंट में उनके प्रदर्शन पर कोई प्रभाव न पड़े।

भारत की एक कोर टीम तैयार करने पर नजर
भारतीय टीम में 2011 विश्वकप के बाद से ही कभी भी टीम पूरी तरह से दुरुस्त नजर नहीं आयी है। इस दौरान कभी टीम को चौथे नंबर के बल्लेबाज की कमी से जूझना पड़ा है तो कभी स्पिनर्स से तो कभी पेस बॉलिंग ऑलराउंडर। ऐसे में जब टीम अच्छा प्रदर्शन करते हुए आईसीसी टूर्नामेंट के नॉकआउट स्टेज में पहुंचती है तो वहां पर उसकी यह कमी खुलकर बाहर आ जाती है। ऐसे में भारतीय कोच राहुल द्रविड़ की नजर एक कोर टीम तैयार करने पर होगी। कोच द्रविड़ के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनके पास इस कमी को दूर करने के लिये बहुत सारे प्रतिभाशाली खिलाड़ी है लेकिन टीम में किसी एक ही जगह मिल सकती है। ऐसे में हेड कोच को भविष्य के टूर्नामेंट का ध्यान रखते हुए ऐसे खिलाड़ियों का चयन करना होगा जो अपनी भूमिका निभा सकें। इसके साथ ही उन्हें चुने गये खिलाड़ियों को बैक करने की भी जरूरत होगी वरना अनिश्चितता की भावना के चलते खिलाड़ी अपना बेस्ट प्रदर्शन नहीं कर पायेंगे। इतना ही नहीं खिलाड़ियों को टीम में उनके रोल को लेकर पूरी क्लैयरिटी होनी चाहिये ताकि वो उसी पर ध्यान देते हुए काम कर सकें।

अगले विश्वकप के लिये सही स्पिनर्स का चयन
भारतीय क्रिकेट में पिछले कुछ समय में जो चर्चित विषय रहा है वो है स्पिनर्स, 2017 की चैम्पियन्स ट्रॉफी फाइनल में हार के बाद टीम मैनेजमेंट ने कलाई के स्पिनर्स को मौका देने का फैसला किया और फिंगर स्पिनर्स को बाहर कर दिया। नतीजन कुलदीप यादव और युजवेंद्र चहल की जोड़ी भारत के लिये खेलती नजर आयी लेकिन जडेजा-अश्विन की जोड़ी बाहर हो गई। हालांकि जब 2021 विश्वकप आया तो चयनकर्ताओं ने फिर से फिंगर स्पिनर्स को मौका देकर कलाई के स्पिनर्स को बाहर कर दिया। ऐसे में राहुल द्रविड़ के सामने अगली बड़ी चुनौती यह रहेगी कि ऑस्ट्रेलियाई पिचों का ध्यान रखते हुए वह किस तरह के स्पिनर्स को बैक करते हैं या फिर वो दोनों बॉलिंग टाइप स्पिनर्स के साथ जाने का फैसला करते हैं।


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