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चिंता एशियाई खेलों के आयोजन की

By Staff

प्रदीप मैगज़ीन

वरिष्ठ खेल पत्रकार

राष्ट्रमंडल खेलों के काउंटडाउन के मौजूदा दौर में उत्साह से ज़्यादा घबराहट का माहौल बन रहा है कि क्योंकि हर दिन ख़बर आ रही है कि शायद हम समय पर सारी तैयारी नहीं कर पाएँ.

हालाँकि समय पर सब कुछ तैयार हो सके इसके लिए बुनियादी ढाँचे के निर्माण का काम युद्धस्तर पर चल रहा है, लेकिन हर किसी को ये डर सता रहा है कि कहीं भारत की आर्थिक ताक़त और आयोजन क्षमता को प्रदर्शित करने का लक्ष्य राष्ट्र के लिए शर्मिंदगी का कारण नहीं बन जाए.

अब इस बहस में पड़ने का कोई मतलब नहीं है कि क्या भारत को इतनी बड़ी खेल प्रतियोगिता के आयोजन की ज़िम्मेदारी लेनी चाहिए थी. हमारी कामना है कि खेलों का आयोजन बिना किसी विघ्न के संपन्न हो और दुनिया एक राष्ट्र के रूप में हमारी प्रगति का साक्षात्कार करे.

इस समय चिंता की बात ये है कि हम 2019 के एशियाई खेलों के आयोजन के फ़ायदे-नुक़सान पर ठीक से बहस नहीं कर रहे. उल्लेखनीय है कि भारतीय ओलंपिक संघ इस प्रतियोगिता के आयोजन का दावा औपचारिक तौर पर पेश कर चुका है.

क्या हमें इस बात का अहसास है कि इस तरह के बड़े अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों पर हज़ारों करोड़ रुपये ख़र्च तो होते हैं, लेकिन उसका फ़ायदा बहुत ज़्यादा नहीं होता. निसंदेह आयोजन करने वाले नगर में सड़कें और फ़्लाइओवर बन जाते हैं, सार्वजनिक परिवहन की स्थिति सुधर जाती है. लेकिन इन कामों के लिए किसी अंतरराष्ट्रीय खेल प्रतियोगिता के आयोजन का बहाना ज़रूरी नहीं है.

असल सवाल ये है कि क्या ऐसे आयोजन भारत को खेलों की दुनिया में एक मज़बूत ताक़त के रूप में उभरने में मददगार होते हैं? बीते दिनों के उदाहरणों से साफ़ है कि विशालकाय स्टेडियमों से खेलों का स्तर नहीं सुधरता. भारत के संदर्भ में ज़रूरत इस बात की है कि निचले स्तर पर प्रशिक्षण केंद्र स्थापित करने और ऊपर के स्तर पर बड़े खिलाड़ियों के लिए कोचिंग सेंटर खोलने पर पैसे ख़र्च किए जाएँ ताकि हमारे खिलाड़ी दुनिया के बेहतरीन खिलाड़ियों से मुक़ाबला कर सकें.

सुविधाओं और खेल-संस्कृति के अभाव में हम बड़े खेल आयोजनों से पैदा हुए उत्साह का फ़ायदा नहीं उठा सकते.

ये तो हुआ समस्या का एक पहलू. दूसरा ज़्यादा महत्वपूर्ण सवाल ये है कि क्या भारत जैसे देश को किसी खेल आयोजन पर अरबों डॉलर ख़र्च करने चाहिए, जबकि देश में अमीरों और ग़रीबों के बीच की खाई बहुत ज़्यादा बड़ी हो?

एशियाई खेलों का आयोजन ओलम्पिक के आयोजन जैसा ही होता है. राष्ट्रमंडल खेलों की 17 की तुलना में एशियाई खेलों में 42 प्रतिस्पर्द्धाएँ होती हैं. राष्ट्रमंडल खेलों के मुक़ाबले एशियाई खेलों में प्रतियोगिता भी ज़्यादा कड़ी होती है क्योंकि चीन, जापान और दक्षिण कोरिया जैसे देश भी भाग ले रहे होते हैं.

और यदि भारत को 2019 के एशियाई खेलों की मेज़बानी मिलती है तो उसके आयोजन पर लगभग 40 अरब डॉलर ख़र्च करने पड़ सकते हैं. इतनी ही राशि चीन में 2008 के ओलम्पिक खेलों के आयोजन पर ख़र्च हुई थी.

ये कोई छोटी रकम नहीं है, और अंत में इसका भार किसे उठाना पड़ेगा? ज़ाहिर है करदाताओं को.

हम देख रहे हैं कि राष्ट्रमंडल खेलों के आयोजन पर इतने पैसे ख़र्च हो रहे हैं कि सरकार को और धन जुटाने में मुश्किलें पेश आ रही हैं. जब भारत ने मेज़बानी का दावा किया था तो राष्ट्रमंडल खेलों पर 900 करोड़ रुपये ख़र्च होने का अनुमान था, लेकिन अगले एक दशक में ये आंकड़ा 40 हज़ार करोड़ को पार कर चुका है, और अंतत: 50 हज़ार करोड़ तक पहुँच सकता है.

कहाँ से आ रहा है ये पैसा? एक रिपोर्ट के अनुसार अनुसूचित जातियों के लिए आवंटित 700 करोड़ रुपये इस मद में डाले जा चुके हैं. यदि ग़रीबों के लिए आवंटित धन को खेलों के आयोजन में लगाना पड़े तो निश्चय ही हमारी तय प्राथमिकताओं में भयानक गड़बड़ी है.

इसलिए भारतीय ओलंपिक संघ को राष्ट्रीय गौरव के नाम पर एशियाई खेलों के आयोजन की कोशिश नहीं करने दी जानी चाहिए, क्योंकि खेलों के आयोजन पर उसे तो कुछ भी ख़र्च नहीं करना पड़ेगा. सरकार इस बात पर गंभीरता से विचार करे कि एशियाई खेलों जैसे भारी-भरकम आयोजन पर अरबों डॉलर ख़र्च करने का कोई मतलब भी है?

Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:40 [IST]
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