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फुटबॉल विश्व कप 2018: आख़िर पेले का नाम पेले कैसे पड़ गया?

By Bbc Hindi

वर्ल्ड कप फुटबॉल की सबसे कामयाब टीम ब्राज़ील रविवार को स्विटजरलैंड के ख़िलाफ़ मैच से अपने अभियान की शुरुआत करेगी.

मौजूदा समय के सबसे बेहतरीन फॉरवर्ड में शुमार नेमार की अगुवाई में टीम का इरादा पिछले वर्ल्ड कप की नाकामी को भुलाकर आगे बढ़ना होगा.

ब्राज़ील की टीम अपने घरेलू मैदान पर 2014 में उम्मीद से कमतर प्रदर्शन कर पाई थी, उसे चौथे स्थान से संतोष करना पड़ा था.

लेकिन विश्व कप फुटबॉल की सबसे कामयाब टीम ब्राज़ील ही है.

पांच बार की विश्व चैंपियन ब्राज़ील की इस कामयाबी में जिस खिलाड़ी का सबसे बड़ा योगदान है, दुनिया उन्हें पेले के नाम से जानती है.

पेले का करिश्मा

फुटबॉल के जादूगर कहलाने वाले पेले का करिश्मा कुछ ऐसा रहा है जिसकी बराबरी आज तक कोई फुटबॉलर नहीं कर पाया है.

उनकी मौजूदगी में ब्राज़ील ने 1958, 1962 और 1970 में फुटबॉल का विश्व कप जीता था. तीन वर्ल्ड कप हासिल करने वाले पेले दुनिया के एकलौते फुटबॉलर हैं.



इसके साथ ही सबसे कम उम्र में विश्व कप में गोल दागने, हैट्रिक बनाने और फ़ाइनल मुक़ाबला खेलने का कारनामा 60 साल बाद भी पेले के नाम पर बना हुआ है.

ब्राज़ील के फुटबॉल ही नहीं दुनिया भर में फुटबॉल को लोकप्रिय बनाने वाले पेले के करिश्मे जितनी ही दिलचस्प कहानी उनके नाम की भी है.

सबसे दिलचस्प बात तो यही है कि दुनिया भर में पेले के नाम से मशहूर शख़्स का ना तो नाम पेले था और ना ही निकनेम.

हर इंसान के एक-दो निकनेम

ब्राज़ील के छोटे से शहर मिनास गेराइस में 23 अक्टूबर, 1940 को पेले का जन्म हुआ था. पिता क्लब स्तर के फुटबॉलर थे और मां हाउसवाइफ़. मां बाप ने अपने बेटे का नाम रखा एडसन.

इस नाम को रखने की वजह के बारे में पेले ने अपने संस्मरण 'व्हाई सॉकर मैटर्स' में बताया है, ''जिस वक़्त मेरा जन्म हुआ था, ठीक उसी दौरान हमारे शहर में बिजली का बल्ब पहुंचा था, मेरे माता पिता बॉल्व की रोशनी से अभिभूत थे, तो उन्होंने इसे बनाने वाले थामस एल्वा एडिसन के सम्मान में मेरा नाम रखा एडिसन पर गलती से वो स्पेलिंग में आई शब्द नहीं रख पाए.''



इस तरह से पेले का नाम हो गया एडसन. पूरा नाम एडसन एरेंटस डो नासिमेंटो. ब्राज़ील में इसी तरह से नाम लंबे चौड़े रखे जाते हैं, लिहाजा लोगों के निकनेम भी चलन में आ जाते हैं.

ब्राज़ील में अमूमन हर इंसान के एक-दो निकनेम ज़रूर होते हैं, जिससे उनके घर परिवार उन्हें बुलाते हैं.

बेटे को फुटबॉलर बनाने का सपना

एडसन यानी पेले का भी निकनेम रखा गया - डिको. पेले के माता-पिता, भाई-बहन या जानने वाले दोस्त उन्हें डिको के नाम से बुलाते रहे.

डिको के पिता ख़ुद भी फुटबॉल खेलते थे, लेकिन महज 25 साल की उम्र में चोटिल होने की वजह से उनका फुटबॉल करियर क्लब स्तर से आगे नहीं बढ़ पाया था, लिहाजा उन्होंने अपने बेटे को फुटबॉलर बनाने का सपना देखा.

उनका परिवार अब साउ पाउलो के बाउरू शहर में रहने आ गया था.

बचपन से मिली ट्रेनिंग के चलते पेले की ख़ासियत की चर्चा गली मुहल्लों में होने लगी थी, लेकिन संसाधनों का अभाव था.

पेले कभी फटे पुराने कपड़ों से गेंद बनाकर फुटबॉल खेलते थे और कभी पड़ोस के स्टेशन से गुड्स ट्रेन का सामान ग़ायब करके उसे बेचकर गेंद के लिए पैसा जमा करते थे.

9-10 साल की उम्र में डिको अपने साथियों को तेजी से छकाने लगे थे और उन्हें कोई पकड़ नहीं पाता था, लिहाजा उनका नया नाम पड़ गया, गैसोलिना.

इस नाम की वजह ये थी वे गैस की तरह से तेज भागते थे. पेले के मुताबिक ये नाम उन्हें कुछ हद तक पसंद भी आया.

लेकिन उनका नाम पेले कैसे पड़ा. इसको लेकर कई तरह के दावे किए जाते हैं. जो दावा जोरशोर से किया जाता है, वो ये है कि गेलिक भाषा में पेले का मतलब फुटबॉल होता है, लिहाजा उनका नाम पेले पड़ गया.



लेकिन इस दावे को सच नहीं माना जा सकता, क्योंकि गेलिक आयरलैंड के आसपास की भाषा है और उसका कोई शब्द उस ज़माने में हज़ारों मील दूर बाउरू, ब्राज़ील कैसे पहुंच गया होगा, इसका कोई ठोस आधार नहीं मिलता.

पेले शब्द हिब्रू भाषा में भी है, जहां उसका मतलब चमत्कार है. लेकिन नाइज़ीरिया के किसी शब्द का उस वक्त ब्राज़ील तक पहुंचना भी असंभव था.

ऐसे में सवाल यही है कि पेले का नाम, पेले कैसे पड़ गया. उस दौर में ब्राज़ील में पुर्तगाली भाषा का चलन था और उसमें पेले शब्द का कोई मतलब नहीं निकलता था.

लेकिन बावजूद इसके जब 15 साल की उम्र में ब्राज़ील के मशहूर क्लब सैटोंस से पेले जुड़े तो उनका नाम पेले पड़ चुका था.

पेले नाम रखने जाने के सच के बारे में पेले ने 'व्हाई सॉकर मैटर्स' में बताया है, कोई ठीक-ठीक नहीं बता पाता है कि पेले नाम कहां से आया. लेकिन मेरे मामा जॉर्ज ने जो बताया है, उस पर विश्वास किया जा सकता है.

पेले के मामा जॉर्ज, उनके साथ ही रहते थे और कई साल तक उनकी नौकरी के चलते ही पेले के परिवार का भरन-पोषण होता रहा.

जॉर्ज के मुताबिक़, बाउरू की स्थानीय फुटबॉल क्लब टीम के एक गोलकीपर का नाम था बिले, ये वही क्लब था जिसमें पेले के पिता भी खेलते थे. बिले अपनी शानदार गोलकीपिंग के चलते बेहद लोकप्रिय थे.

''दूसरी ओर बचपन में डिको को कई मुकाबलों में गोलकीपर की भूमिका भी निभानी होती थी, जब वे शानदार बचाव करते थे, तो लोग कहने लगे थे कि ये दूसरा बिले है, या देखो ये ख़ुद को बिले मानने लगा है.''

''देखते-देखते ये बिले कब पेले में बदल गया है, इसका किसी को अंदाजा भी नहीं हुआ. हालांकि ये वो दौर था जब डिको, साथियों से भिड़ जाया करते थे कि किसने मुझे पेले बुलाया, क्यों बुलाया, मेरा नाम तो ठीक से लो.''



बहरहाल, आस पड़ोस के लोग उन्हें पेले के नाम से लोग जानने लगे थे, लेकिन आधिकारिक तौर पर पेले कहने का चलन उन्हें सैंटोस क्लब से जुड़ने के बाद ही शुरू हुआ.

अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि सैंटोस के प्रबंधकों ने पेले को एक ब्रैंड के तौर पर बदलने में अहम भूमिका निभाई. इसका ज़िक्र करते हुए पेले ने व्हाई सॉकर मैटर्स में लिखा है, "पेले एक अलग पहचान बन चुका था, एडसन बाउरू से आने वाले एक ग़रीब लड़का था, जिसे अपने घर परिवार की याद आती थी, लेकिन दूसरी ओर पेले था जो टीनएज में ही राइजिंग स्टार था, जिससे उम्मीद की जा रही थी कि वो दुनिया का सबसे बड़ा एथलीट बनेगा."

"एडसन जहां अपने में सिमटा और संकोची लड़का था, वहीं पेले हज़ारों की भीड़ में कैमरे के सामने सहज ढंग से मुस्कुरा सकता था, एक ही आदमी के दो रूप थे, दो भिन्न वास्तविकताएं. एक को मैं जानता था, दूसरा नया था, बदल रहा था और मुझे डराता भी था."

16 साल की उम्र में सैंटोस ने जिस पेले ब्रैंड को बनाया, उसकी चमक आज छह दशक बाद भी कायम है और पेले 78 साल की उम्र में दुनिया भर में फ़ुटबॉल के ब्रैंड एम्बैस्डर बने हुए हैं.

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Story first published: Sunday, June 17, 2018, 18:08 [IST]
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