लिम्बाराम ने एक विधायक के घर मोटर गैरेज को अपना आशियाना बना रखा था मगर पिछले दिनों उन्हें यकायक बेदख़ल कर दिया गया.
सरकार ने अब उन्हें सहायता का आश्वासन दिया है.
राजस्थान के आदिवासी अंचल से ओलंपिक के मकाम तक पहुँचे लिम्बाराम के न तो कोई इनाम-इकराम काम आया और न ही तमगे.
विडंबना ये है कि जिस दिन उन्हें राष्ट्रीय तीरंदाज़ी का कोच नियुक्त किया गया, वे सड़क पर आ गए.
जब बेदखल हुआ तो बहुत मायूस हुआ लेकिन लोगों ने बड़ी मदद की. मुझे एहसास हुआ कि कोई तो अपना भी आशियाना होना चाहिए. लेकिन मैं अब इस झटके से उबर गया हूँ लिम्बाराम
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दरअसल, लिम्बाराम ने एक विधायक के सरकारी आवास में बने मोटर गैरेज में पनाह ले रखी थी. विधायक ने अचानक उन्हें घर से बाहर कर दिया. फ़िर लिम्बाराम को पड़ोस में एक और विधायक के मोटर गैरेज में शरण मिली.
भारत के धनुर्विद्या के कोच का नया ठिकाना यही है.
लिम्बाराम निराश्रय होने के समय को याद करते हुए कहते हैं, "मुझे झटका लगा, मैं ऐसे गाँव से आता हूँ जहाँ बुनयादी सुविधाएँ आज भी दूर की कौड़ी हैं. बेहद गरीबी में बचपन कटा और पिता का साया भी उठ गया था. जब बेदखल हुआ तो बहुत मायूस हुआ लेकिन लोगों ने बड़ी मदद की. मुझे एहसास हुआ कि कोई तो अपना भी आशियाना होना चाहिए. लेकिन मैं अब इस झटके से उबर गया हूँ".
उपेक्षा
विधायक बाबूलाल ख़ुद आदिवासी समाज से आते हैं. वे कहते हैं कि "मैंने लिम्बाराम को बाहर नहीं किया, दरअसल जगह तंग थी और दिक्कत हो रही थी".
तीन बार ओलंपिक में भारत की नुमाइंदगी कर चुके भीलों के इस लाडले को इस घटना पर कोई मलाल तो नहीं मगर दुःख ज़रूर है कि देवकाल से चली आ रही धनुर्विधा को क्रिकेट जैसे परदेसी खेलों के मुक़ाबले कोई तवज्जो नही मिलती है.
जनजाति इलाके के वकील राज ढिंढोर ख़ुद तीरंदाज़ हैं और राष्ट्रीय सीनियर में अपने हुनर का प्रदर्शन कर चुके हैं. वे कहते हैं, "हम लोग लिम्बाराम को देख कर धनुर्विद्या सीख रहे हैं. हमारा तो दिल ही टूट गया".
भारत में कुछ खेलों पर दौलत बरस रही है और खिलाड़ी मालामाल हैं. दूसरी ओर आज का अर्जुन है, उसके पास पुरखों का दिया पुरातन कौशल तो है लेकिन कोई बसेरा नहीं जिसे वो अपना कह सके.