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सवाल सिर्फ़ तटस्थ मैदानों का ही नहीं....

बात घरेलू क्रिकेट की हो रही है. राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्टार पैदा करने वाले घरेलू क्रिकेट को ऐसे अनाथ बच्चे की तरह देखा जा सकता है जो मालिक की तलाश में है.

ऐसे व्यस्त अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कैलेंडर में घरेलू क्रिकेट ख़बर बना जब किसी के लिए शायद ये बता पाना भी मुश्किल हो कि कौन किसके ख़िलाफ़ खेल रहा है.

रणजी ट्रॉफी मैचों को अख़बारों में खूब जगह मिली. दुर्भाग्यवश ख़बरें ऐसी थी जो या तो बल्लेबाज़ों के धाँसू प्रदर्शनों से अटी पड़ी थी या फिर एकतरफा मुक़ाबलों से.

ख़लनायक एक बार फिर विकेट ही था, जिसे क्रिकेट में बार-बार कोसा जाता है.

मुक़ाबलों के लिए 'तटस्थ' मैदान इसका विकल्प था जिससे घरेलू टीमों को मेज़बानी का ग़ैरज़रूरी लाभ न मिले. यानी बोर्ड नहीं चाहता कि मेज़बान टीम ऐसे विकेट तैयार करे जो उसकी ताक़त के मददगार हों.

हैरानी नहीं होनी चाहिए कि अक्सर ज्वलंत मुद्दों पर भी चुप्पी साधे रखने वाले सचिन तेंदुलकर ने भी तटस्थता के मुद्दे पर बोर्ड के फ़ैसले को सही नहीं माना

हैरानी नहीं होनी चाहिए कि अक्सर ज्वलंत मुद्दों पर भी चुप्पी साधे रखने वाले सचिन तेंदुलकर ने भी तटस्थता के मुद्दे पर बोर्ड के फ़ैसले को सही नहीं माना

कहा गया कि दिलचस्प मुक़ाबलों के लिए ज़रूरी है कि क्रिकेट स्पोर्टिंग विकेट पर खेला जाए और ये सिर्फ़ तटस्थ मैदानों पर ही हो सकता था.

यही वजह रही कि मुंबई का उत्तर प्रदेश से मुक़ाबला हैदराबाद में हुआ. जबकि सेमी फ़ाइनल मुक़ाबले नागपुर और चेन्नई में खेले गए.

यहाँ तक तो ठीक था, लेकिन दोनों सेमी फ़ाइनल मुक़ाबले जिन विकेटों पर खेले गए उन पर बल्लेबाज़ों को आउट करना माउंट एवरेस्ट पर चढ़ने सरीखा था.

हाँ, फ़ाइनल मैच का विकेट उतना ख़राब नहीं था, लेकिन ज़हीर ख़ान ने अपनी तेज़ गेंदबाज़ी का ऐसा जलवा बिखेरा कि मुक़ाबला एकतरफा बन गया.

नुक़सान

लोग सोच रहे थे कि तटस्थ मैदानों पर मुक़ाबले खेलने के मामले में चेन्नई और नागपुर दूसरों के लिए मिसाल बनेंगे.

सचिन ने भी इस मुद्दे पर मुँह खोला है

ऐसा इसलिए भी कि भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड में इन दोनों शहरों का प्रतिनिधित्व है और बोर्ड के अध्यक्ष और सचिव इन शहरों से हैं.

लेकिन ऐसी सुस्त और बेजान विकेट तैयार कर उन्होंने दूसरों के लिए मिसाल क़ायम करने के बजाय तटस्थ मैदान पर मैच खेलने की अवधारणा को नुक़सान ही पहुँचाया.

तटस्थ मैदानों पर मुक़ाबलों का दूसरा पहलू भी है. सवाल ये है कि चेन्नई के दर्शक ऐसे मैच को देखने क्यों स्टेडियम में जाएँगे जिसमें उनकी टीम ही नहीं है.

ये तो ठीक वैसा ही है जैसे दिल्ली ऑस्ट्रेलिया-इंग्लैंड मैच की मेज़बानी करे. यहाँ तक कि खिलाड़ी भी अपने दर्शकों के बीच खेलना चाहते हैं.

हैरानी नहीं होनी चाहिए कि अक्सर ज्वलंत मुद्दों पर भी चुप्पी साधे रखने वाले सचिन तेंदुलकर ने भी तटस्थता के मुद्दे पर बोर्ड के फ़ैसले को सही नहीं माना.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:21 [IST]
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