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ना उम्र की सीमा है...

By Staff

प्रदीप मैगज़ीन

वरिष्ठ खेल पत्रकार

कई चीज़ों के लिए हम युवा होने को बड़ा श्रेय देते हैं. ख़ासकर खेलों में जहाँ युवा होना वरदान है और ढ़लती उम्र किसी अभिशाप जैसा है.

खेलों की ज़बरदस्त प्रतिस्पर्धा में सिर्फ़ वही दौड़ सकते हैं, जिनका शरीर खच्चरों की तरह बोझ झेल सकता हो.

अपवाद दुर्लभ हैं और बहुत दुर्लभ हैं. समय के चक्र सबके लिए चलता है बशर्ते कि आप सचिन तेंदुलकर न हों. कोलंबो की भीषण गर्मी और उमस के बीच उन्होंने जिस तरह की बल्लेबाज़ी दिखाई, वो लाजवाब थी.

तेंदुलकर 36 साल के हो चुके हैं और उनके शरीर का शायद ही कोई हिस्सा बचा हो, जिसमें चोट न लगी हो.

कभी तो ये चोटें बेहद गंभीर थी-मसलन कई साल पहले उनकी कमर का दर्द- उस समय हममें से कई लोग उनके भाग्य को कोसते थे कि क्यों वो इस कुशल मूर्तिकार के हाथ से छेनी छीनने की साज़िश रच रहा है.

लेकिन जब कभी भी उनके शरीर में चोट लगी और उनके क्रिकेट मैदान से बाहर रहने का ख़तरा बना, तेंदुलकर ने और अधिक मानसिक मज़बूती और ज़ोरदार इच्छाशक्ति के साथ वापसी की.

जुनून

तेंदुलकर वो शख्सियत हैं, जिन्हें लोग जीनियस कहते नहीं थकती थी, दरअसल अब वो पुरोधा बन चुके हैं. अगर वो क्रिकेट इतिहास के महानतम बल्लेबाज़ नहीं हैं तो इसमें कोई शक नहीं कि वो महानतम बल्लेबाज़ों में से एक हैं. इसे बार-बार दोहराने की भी ज़रूरत नहीं है क्योंकि दुनिया भी ये जानती है.

आंकड़ों में तो उन्होंने दुनिया के तमाम बल्लेबाज़ों को पछाड़ा ही है और अब भी उनका बल्ला लगातार चल रहा है. उन्होंने हक़ीक़त में वो उपलब्धियां हासिल की हैं, जिनके बारे में उन्होंने कभी सपने में भी सोचने का साहस नहीं किया होगा.

अब उन्हें क्या हासिल करना बाक़ी है या फिर क्या साबित करना बाक़ी है? शायद कुछ नहीं, लेकिन तेंदुलकर इन सबके लिए नहीं हैं. बल्लेबाज़ी को लेकर उनमें अजब तरह का जुनून है और इससे वो जो ख़ुशी हासिल करते हैं, वो शायद जीने के लिए उनके प्यार से कहीं अधिक है.

तो जोश, उत्साह, अच्छे प्रदर्शन की भूख और शतक बनाने के बावजूद आउट होने की हड़बड़ी नहीं होने का पुराना पैमाना सिर्फ़ युवा खिलाड़ी पर ही क्यों लागू होना चाहिए.

प्रेमदासा स्टेडियम में तेंदुलकर की पारी में वे सभी स्ट्रोक्स शामिल थे, जो एक समय इस युवा खिलाड़ी में दिखे थे और जिनके बूते उन्हें जीनियस कहा जाने लगा था.

उनका फ़ुटवर्क हमेशा की तरह फुर्तीला था. ऑफ़साइड पर उनके स्ट्रोक्स ठीक वैसे ही थे, जैसा कि हर कोई उनकी पारियों में देखता आया है.

ऑफ स्टंप पर पड़ी गेंद को कलाई के सहारे ऑनसाइड में खेलना, ऐसे शॉट हैं जो कोई भी बल्लेबाज़ अपने करियर के मुख्य दौर में खेलता है न कि करियर के ढलान पर.

प्रेमदासा स्टेडियम में उन्होंने बल्लेबाज़ी का ऐसा प्रदर्शन किया, जिस पर ख़ुद उन्हें भी फ़ख्र होगा. और जब शरीर ने भी उनका साथ देने से इनकार कर दिया, तब भी उन्होंने खेलने का हौसला नहीं छोड़ा.

हर रन पर अपने रनर के लिए उनकी तेज़ आवाज़ ये बताने के लिए काफ़ी है कि उनमें इस खेल को लेकर कितनी तीव्र इच्छा है और वो क्रिकेट के इतर ज़िंदगी नहीं देखते.

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:24 [IST]
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