पेशेवर क्रिकेटर बनने का सपना पालने वाले एक युवा के लिए यह किसी सपने के सच होने जैसा है लेकिन भारतीय क्रिकेट टीम में शामिल होने के लिए मनीष को अभी सफलता की कई और सीढ़ियां चढ़नी होंगी। उनके सामने पहली सीढ़ी सेमीफाइनल की है, जहां शनिवार को उनका सामना चेन्नई सुपर किंग्स के दिग्गज गेंदबाजों से होगा।
मुथैया मुरलीधरन, लक्ष्मीपति बालाजी, जैकब ओरम और शादाब जकाती की गेंदों का प्रहार झेलते हुए मनीष अगर अपनी टीम को फाइनल तक पहुंचाने में सफल रहे तो वह निश्चित तौर पर भारतीय टीम की ओर जाने वाली सफलता की एक और बड़ी सीढ़ी चढ़ने में सफल रहेंगे।
पेशेवर क्रिकेट का सर्वोच्च शिखर मानी जाने वाली भारतीय टीम तक पहुंचने के लिए मनीष को काफी मेहनत करनी होगी। अपने अब तक के करियर की सबसे बड़ी पारी के दौरान न तो उनकी शैली में कोई खोट नजर आई और न ही उनके मनोबल में कोई कमी दिखी लेकिन आने वाले दिनों में प्रदर्शन में निरंतरता बनाए रखना उनके लिए बड़ी चुनौती हो सकती है।
मनीष का जन्म 10 सितंबर, 1989 को कर्नाटक के नांतीलाल नामक स्थान पर हुआ। उनके पिता उन्हें सेना में भर्ती कराना चाहते थे लेकिन मनीष की इच्छा पेशेवर क्रिकेटर बनने की थी। पिता ने अपने बेटे की जिद को मानते हुए उन्हें इस साल दिसंबर तक का समय दिया था। पिता ने कहा था कि दिसंबर तक पेशेवर क्रिकेटर नहीं बन पाने की सूरत में उन्हें सेना में भर्ती होने के लिए अर्जी देनी होगी।
कर्नाटक के लिए रणजी ट्रॉफी खेल चुके मनीष ने बिल्कुल सही समय पर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवाकर न सिर्फ अपनी टीम को सेमीफाइनल में पहुंचाया बल्कि अपने पिता को भी इस बात का सबूत दे दिया कि उनकी किस्मत में पेशेवर क्रिकेटर ही बनना लिखा है।
मनीष ने कर्नाटक के लिए पांच रणजी मैच खेले हैं। पांच मैचों की आठ पारियों में उन्होंने एक बार नाबाद रहते हुए 193 रन बनाए हैं। उनका सर्वोच्च व्यक्तिगत स्कोर 64 रन रहा है और उनके बल्ले से दो अर्धशतक निकले हैं। गुरुवार से पहले मनीष ने 12 ट्वेंटी-20 मैच खेले थे, जिसमें उन्होंने एक अर्धशतक की मदद से 136 रन बनाए थे।
जाहिर तौर पर यह रिकार्ड बहुत बढ़िया नहीं है लेकिन इसके बावजूद प्रतिभा के धनी मनीष 2008 में मुंबई इंडियंस टीम में जगह बनाने में सफल रहे थे। मुंबई इंडियंस टीम की ओर से उन्हें पिछले साल कोई मौका नहीं मिला, लिहाजा रॉयल चैलेंजर्स टीम के मालिक विजय माल्या ने 'ट्रांसफर विंडो' के जरिए मनीष को इस साल फरवरी में अपनी टीम में ले लिया।
शुरुआती 13 मैचों तक दिग्गजों के जमावड़े के कारण मनीष को इस साल भी एक बार भी मैदान में उतरने का मौका नहीं मिला लेकिन अहम मैच में उन्हें अंतिम-11 में शामिल करके रॉयल चैलेंजर्स के चयनकर्ताओं ने एक बड़ा जुआ खेला। मनीष ने इस मौके भरपूर फायदा उठाया और शानदार शतक ठोककर खुद को साबित किया।
मनीष अंडर-17 और अंडर-19 स्तर पर कर्नाटक राज्य क्रिकेट संघ की टीम के लिए खेल चुके हैं। इसके अलावा वह 2008 में अंडर-19 विश्व कप जीतने वाली टीम का भी हिस्सा रहे थे, लेकिन उन्हें ज्यादा मौका नहीं मिला था।
मुंबई इंडियंस के लिए खेलने वाले विराट कोहली भी 2008 में विश्व कप जीतने वाली अंडर-19 टीम के सदस्य थे। विराट अपने प्रदर्शन के बूते नाम बटोरने में सफल रहे। इस कारण उन्हें भारतीय टीम में भी जगह मिली लेकिन मनीष इस मामले में पिछड़ गए।
क्रिकेट के जानकारों का मानना है कि मनीष में काफी आगे तक जाने की संभावना है। इसका कारण यह है कि महज 19 साल का होने के बावजूद वह अपनी पारी को बहुत सलीके से संवारते हैं। डेक्कन चार्जर्स के खिलाफ जब कालिस मात्र सात रन के कुल योग पर पेवेलियन लौट गए थे, तब मनीष ने बहुत संयम के साथ विकेट पर टिके रहने का फैसला किया था।
अपनी पारी के दौरान कभी आक्रामक और कभी संयम से भरपूर तेवर दिखाने वाले मनीष ने कमजोर गेंदों पर जमकर प्रहार किया और अच्छी गेंदों का सम्मान किया। समय पड़ने पर मनीष ने स्ट्राइक को बहुत चालाकी से परिवर्तित किया और अपनी टीम को बड़ा स्कोर देने के लिए बड़े छक्के भी लगाए। उनका हॉफ-फ्लिक और हॉफ-स्वीप शॉट उन्हें राहुल द्रविड़ की तरह बैंगलोर के उन खिलाड़ियों की जमात में लाकर खड़ा करता है जो क्रिकेट में बड़ा नाम कमाने के लिए पैदा हुए हैं।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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