बीजिंग में जहां विजेंदर कुमार ने कांस्य पदक जीता वहीं अखिल कुमार और जितेंदर कुमार कांस्य पदक के करीब पहुंचकर चूक गए। इन तीनों की सफलता के बाद भारत में मुक्केबाजी को लेकर जबरदस्त उत्साह और जूनून पैदा हो गया।
इसके बाद मुक्केबाजों ने चीन में आयोजित एशियाई मुक्केबाजी चैंपियनशिप में सात पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया। भारतीय मुक्केबाजों ने एक स्वर्ण, दो रजत और चार कांस्य पदक जीते। भारतीय टीम उजबेकिस्तान और चैंपियन चीन के बाद पदक तालिका में तीसरे स्थान पर रही।
ऐसा नहीं है कि भारतीय मुक्केबाज अचानक ही अच्छा प्रदर्शन करने लगे हैं। इसे जानने के लिए 1982 में लौटना होगा जब भारत ने सियोल में आयोजित एशियाई चैंपियनशिप में दो स्वर्ण, दो रजत और एक कांस्य पदक जीता था। यह वह वक्त था जब भारत को एशिया में मुक्केबाजों का अग्रणी देश माना जाता था।
राष्ट्रीय टीम के कोच गुरबक्श सिंह संधू का कहना है, "चीन में हमारी टीम ने साबित किया कि हम एशिया की सर्वश्रेष्ठ टीमों में से एक हैं। उजबेकिस्तान और कजाकिस्तान की टीमें बहुत स्तरीय हैं लेकिन इनकी तुलना में भारतीय टीम में भी काफी दम है।"
संधू मानते हैं कि हालिया सफलताओं के कारण भारत में मुक्केबाजों की संख्या में तेजी से इजाफा हो रहा है। उन्होंने कहा, "आज हमारे पास अनेक प्रतिभाशाली मुक्केबाज हैं। उत्तरी राज्यों के अलावा पूर्वोतर के मणिपुर और असम से भी बड़ी संख्या में मुक्केबाजों की पौध तैयार हो रही है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।