नई दिल्ली, 21 जून (आईएएनएस)। सेमीफाइनल में दक्षिण अफ्रीका पर मिली जीत के बाद पाकिस्तानी टीम के कप्तान यूनुस खान ने कहा था, "इंशाल्लाह, हम अगर यह खिताब जीत गए तो आतंकी हमलों से थर्राई पाकिस्तान की अवाम के चेहरों पर मुस्कान लौट आएगी। ऐसा हुआ तो सबसे अधिक खुशी मुझे होगी क्योंकि यह क्रिकेट के कारण होगा। मैं यह भी जानता हूं कि खिताबी जीत हमारे लिए संजीवनी सरीखी होगी क्योंकि इसके जरिए हम अपने देश में क्रिकेट को फिर से जिंदा कर सकेंगे।"
कप्तान के इस भरोसे पर खरा उतरते हुए पाकिस्तानी क्रिकेटरों ने अपने देशवासियों को रविवार को वह खुशी दी, जिसका उन्हें 1992 के बाद से इंतजार था। इमरान खान की कप्तानी में विश्व कप जीतने वाली पाकिस्तानी टीम ने हाल के वर्षो में एक से एक होनहार खिलाड़ी दिए लेकिन विश्व खिताब उससे हमेशा दूर ही रहा। पिछली बार यह टीम इस खिताब के बिल्कुल करीब पहुंची थी लेकिन भारत के हाथों मिली हार के बाद उसे इससे महरूम रहना पड़ा था।।
इस साल यूनुस की प्रेरणादायी कप्तानी में खेल रही पाकिस्तानी टीम ने ऐतिहासिक लॉर्ड्स स्टेडियम में रविवार को श्रीलंका को आठ विकेट से हराकर ट्वेंटी-20 विश्व कप के दूसरे संस्करण का खिताब जीत लिया। इस तरह पाकिस्तान ने उस मिशन को पूरा कर लिया जो पिछली बार दक्षिण अफ्रीका में आयोजित टूर्नामेंट के पहले संस्करण के फाइनल में भारत के हाथों मिली हार के कारण अधूरा रह गया था।
यह जीत जाहिर तौर पर घरेलू हिंसा से त्रस्त करोड़ों पाकिस्तानियों को सुकून पहुंचाएगी। इससे न सिर्फ क्रिकेट जगत में पाकिस्तान की छवि एक बार फिर मजबूत होगी बल्कि इसकी मदद से पाकिस्तान अपने देश में क्रिकेट को फिर से जिंदा कर सकेगा। यूनुस टूर्नामेंट की शुरुआत से ही कहते आ रहे थे कि उनकी टीम के लिए यह खिताब किसी संजीवनी से कम नहीं होगा क्योंकि इसकी मदद से पाकिस्तान में क्रिकेट को 'जिंदा' रखा जा सकेगा।
आंतरिक अस्थिरता और पाकिस्तान क्रिकेट बोर्ड में जारी उठापटक से तंगहाल पाकिस्तानी अवाम का अपनी टीम पर से धीरे-धीरे भरोसा उठने लगा था लेकिन यह जीत उस भरोसे रूपी पौधे के लिए आक्सीजन का काम करेगी। हाल के दिनों में पाकिस्तानी क्रिकेट ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी 'जलालत' झेली है। सुरक्षा का हवाला देकर जहां कई देशों ने उसके यहां जाकर खेलने से इंकार कर दिया वहीं अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) ने उससे चैंपियंस ट्रॉफी और विश्व कप-2011 की मेजबानी छीन ली। आईसीसी तथा दूसरे देशों की इस बेरुखी के कारण पाकिस्तान 2008-09 सत्र में सिर्फ एक टेस्ट मैच खेल सका।
श्रीलंका की टीम ने उसके वहां जाकर खेलने की हिम्मत दिखाई लेकिन आतंकवादियों को श्रीलंकाई खिलाड़ियों की यह हिमाकत पसंद नहीं आई और उन्हें सरेराह उन पर हमला करके क्रिकेट को खून से लतपथ करने की कोशिश की। इसके बाद तो मानों पाकिस्तान से अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट का साया ही उठ गया। राजनीतिक अस्थिरता के कारण घरेलू टूर्नामेंट नहीं हो सके और खिलाड़ी अभ्यास के लिए तरसने लगे।
अंतर्राष्ट्रीय खिलाड़ियों ने इस मुश्किल के दौर में खुद को फिट बनाए रखने के लिए काफी जद्दोजहद की और फिर इस साल अप्रेल-मई में आस्ट्रेलिया के साथ पांच एकदिवसीय और एक ट्वेंटी-20 मैच खेला। भारत के साथ खराब कूटनीतिक संबंधों के कारण पाकिस्तानी खिलाड़ी इंडियन प्रीमियर लीग में भी नहीं खेल सके।
अंतर्राष्ट्रीय बिरादरी द्वारा पूरी तरह ठुकराए गए इन खिलाड़ियों के लिए यह जीत बेहद जरूरी थी क्योंकि इसके माध्यम से वे यह साबित करने में सफल रहे कि पाकिस्तान में क्रिकेट का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है लेकिन पाकिस्तानियों के अंदर इसे लेकर जोश और जूनून में कभी खत्म नहीं हो सकता।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।