कर्नाटक को जीत के लिए 338 रनों की जरूरत थी लेकिन उसके सभी बल्लेबाज 331 रन बनाकर पेवेलियन लौट गए। कप्तान मनीष पांडेय (144) और गणेश सतीश (75) ने चौथे विकेट के लिए 209 रनों की बहुमूल्य साझेदारी निभाकर कर्नाटक के लिए जीत की जमीन तैयार कर दी थी लेकिन बाकी के बल्लेबाज अपने काम को बखूबी अंजाम तक नहीं पहुंचा सके।
इस तरह कर्नाटक की टीम 1998-99 के बाद पहली बार इस खिताब पर कब्जा करने का मौका चूक गई। कर्नाटक ने 1998-99 में मध्य प्रदेश को हराकर इस खिताब पर कब्जा किया था। उसने अब तक इस खिताब पर छह बार कब्जा किया है।
स्कोरकार्ड पर नजर डालें तो मुंबई ने अपनी पहली पारी में विनायक समांत के 67 रनों की बदौलत 233 रन बनाए थे जबकि आविष्कार साल्वी की घातक गेंदबाजी के कारण कर्नाटक की टीम पहली पारी में 130 रन ही बना सकी थी।
दूसरी पारी में मुंबई ने धवल कुलकर्णी के 87 और अभिषेक नायर के 50 रनों की बदौलत 234 रन बनाकर कर्नाटक के सामने 338 रनों का लक्ष्य रखा था। मुंबई की ओर से पहली पारी में साल्वी ने पांच विकेट झटके थे।
कर्नाटक की टीम ने मैच के चौथे दिन गुरुवार को भोजनकाल तक छह विकेट के नुकसान पर 265 रन बना लिए थे। पांडेय और सतीश चौथे विकेट के लिए 209 रन जोड़कर विदा हो चुके थे। यहां से उसे जीत की सुगंध मिलने लगी थी लेकिन कुलकर्णी और अगरकर ने पुछल्ले बल्लेबाजों को समेटकर उसे जीत के महरूम कर दिया।
भोजनकाल के बाद कर्नाटक के बल्लेबाजों के सामने बहुत बड़ी चुनौती नहीं थी लेकिन कुलकर्णी, इकबाल अब्दुल्ला और अगरकर ने अमित वर्मा (2), स्टुअर्ट बिन्नी (17), सुनील जोशी (16), विनय कुमार (15) और एस अरविंद (10) को आउट करके अपनी टीम की जीत पक्की कर दी।
इंडियन प्रीमियर लीग में शतक लगाने वाले एकमात्र भारतीय खिलाड़ी के रूप में मशहूर पांडेय ने कप्तानी पारी खेलते हुए 151 गेंदों पर 18 चौकों और एक छक्के की मदद से 144 रन बनाए जबकि सतीश 215 गेंदों पर नौ चौकों की मदद से 75 रन बनाकर आउट हुए। तीसरे दिन का खेल खत्म होने तक कर्नाटक की टीम ने तीन विकेट के नुकसान पर 135 रन बना लिए थे।
साल्वी ने दूसरी पारी में भी तीन विकेट अपनी झोली में डाले जबकि इकबाल अब्दुल्ला को दो सफलता मिली। मुंबई ने 2008-09 सत्र में उत्तर प्रदेश को हराकर इस खिताब पर कब्जा किया था। उससे पहले 2007-08 सत्र में दिल्ली ने उत्तर प्रदेश को हराकर खिताबी जीत हासिल की थी।
वर्ष 1934 में रणजी ट्रॉफी का पहली बार आयोजन किया गया था। उस समय बांबे (आज की मुंबई) की टीम ने उत्तरी भारत की टीम को हारकर पहली खिताबी जीत हासिल की थी। 1958-59 से लेकर 1972-73 सत्र तक मुंबई ने कुल 16 बार इस खिताब पर लगातार कब्जा किया था।
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।
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