तेजस्विनी की मां सुनीता ने कहा, "तेजस्विनी ने शीर्ष पर पहुंचने के लिए बहुत कड़ी मेहनत की है। उसने कोल्हापुर का नाम रोशन कर दिया है।"
तेजस्विनी ने रविवार को 50 मीटर एयर राइफल स्पर्धा में अंकों के आधार पर विश्व रिकार्ड की बराबरी करते हुए स्वर्ण पदक जीता था। यह मुकाम हासिल करने वाली वह भारत की पहली महिला निशानेबाज हैं।
तेजस्विनी ने कुल 597 अंक हासिल किए। उन्होंने 100,100,100, 99,99, 99 अंकों के साथ पोलैंड की निशानेबाज एवा जोआना नोवाकोवस्का की बराबरी की लेकिन 41 स्कोर टैली के साथ उन्हें स्पर्धा का विजेता घोषित किया गया।
तेजस्विनी ने इस स्पर्धा में 1998 में रूस की निशानेबाज मैरिना बोबकोवा द्वारा स्थापित विश्व रिकार्ड की बराबरी की। 29 वर्षीया तेजस्वनी ने मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों में एयर राइफल में दो स्वर्ण पदक जीता था।
29 वर्षीया तेजस्विनी ने इस वर्ष फरवरी में अपने पिता को खो दिया था। उनका मां का कहना कि पिता की मौत ने उनकी बेटी को परेशान कर दिया था।
बकौल सुनीता, "मेरे पति के देहांत के बाद तेजस्विनी काफी परेशान थी। उसका प्रशिक्षण काफी प्रभावित हुआ था लेकिन उसने तमाम मुश्किलों और शोक से खुद को अलग किया और अभ्यास में जुट गई। उसने अपने पिता से प्रेरणा लेकर यह खिताबी जीत हासिल की है।"
सुनीता बताती हैं कि तेजस्विनी ने 13 वर्ष की उम्र में निशानेबाजी में दिल लगाना शुरू कर दिया था। उन्होंने कहा, "तेजू (तेजस्विनी) को राइफल बहुत पसंद थी और यही कारण है कि उसने एनसीसी कैम्प में हिस्सा लिया था। उसने निशानेबाजी में करियर बनाने का फैसला किया था और हमने इस काम में उसकी भरपूर मदद करने का फैसला किया था।"
"शुरुआत में तेजू ने जयसिंह कुसाले से प्रशिक्षण प्राप्त किया। जयसिंह एक बेहतरीन निशानेबाज हैं। उनके पास अमेरिका में प्रशिक्षण देने का अनुभव है। जयसिंह की शागिर्द बनकर तेजू ने अपनी नींव मजबूत की। तेजू अभी भी जयसिंह को नहीं भूली है।"
सावंत परिवार 2006 तक किराए के मकान में रहा करता था लेकिन 2006 मेलबर्न राष्ट्रमंडल खेलों में दो स्वर्ण पदक जीतने के बाद राज्य सरकार ने उन्हें 5000 वर्ग फुट का एक प्लॉट इनाम में दिया। इसी पर सावंत परिवार ने अपना बंगला बनवाया।
वर्ष 2008 में तेजस्विनी की नियुक्ति जिला खेल विभाग में हुई। कोल्हापुर के जिला खेल अधिकारी राजेंद्र गढगे ने कहा, "उन्हें पुणे में ऑफिसर ऑन स्पेशल ड्यूटी (ओएसडी) नियुक्त किया। हमें उनकी सफलता पर गर्व है। ओएसडी बनने के बावजूद वह बच्चों को एक शिक्षक की तरह प्रशिक्षित करती हैं। उनके अंदर दंभ बिल्कुल नहीं है।"
इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।