मुकेश शर्मा
बीबीसी संवाददाता, ग्वांगजो से
पाकिस्तान ने महिला क्रिकेट में स्वर्ण पदक जीता है.
एशियाई खेल की ख़बरें लोगों तक पहुँचाने के लिए यहाँ आए पत्रकारों की एक दुविधा हर शाम को दिखती है और वो ये कि अगले दिन कौन सा खेल देखने जाएँ.
यहाँ स्टेडियम इतने दूर बने हैं कि दिन में किसी एक ही स्टेडियम में जा सकते हैं.
कोई भी स्टेडियम एक घंटे से कम दूर नहीं है और वहाँ से दूसरे स्टेडियम जाने के लिए पहले मुख्य मीडिया सेंटर वापस आना पड़ता है और तब दूसरी जगह जा सकते हैं.
मुक्केबाज़ी का स्टेडियम तक़रीबन 60 किलोमीटर और शॉटगन का 125 किलोमीटर दूर है.
पत्रकार अगले दिन के कार्यक्रम में यही देख रहे होते हैं कि भारत को कहाँ स्वर्ण पदक मिलने वाला है तो वहीं जाया जाए.
शुरुआती दिनों में निशानेबाज़ी में काफ़ी भीड़ रही मगर निशानेबाज़ों के ऐसे प्रदर्शन के बाद सबने दूसरी जगहों पर जाना शुरू किया.
गुरुवार को जब रोइंग में दो रजत पदक आए और अगले दिन भारतीय रोइंग के कुछ मुक़ाबलों के फ़ाइनल थे, तो पत्रकारों का दल लगभग डेढ़ घंटे की दूरी पर बने उसी प्रतियोगिता स्थल की ओर रवाना हुआ.
वहाँ भारत को एक स्वर्ण, एक रजत और एक काँस्य हासिल भी हुआ.
इतने पत्रकारों को देखकर बजरंगलाल टाखर और उनके कोच चकित रह गए.मीडिया की ये चकाचौंध किसे अच्छी नहीं लगती.
सानिया मिर्ज़ा शुक्रवार शाम को विष्णु वर्धन के साथ टेनिस में मिश्रित युगल का पहला मैच खेल रहीं थीं.
सौभाग्य से मुझे भी उस मैच में वहीं बैठने का मौक़ा मिल गया जहाँ भारतीय टीम बैठी थी. सानिया की माँ नसीम मिर्ज़ा भी वहीं बैठी थीं.
सानिया मिर्ज़ा की आँखें रह रह कर स्टैंड में किसी को तलाश रही थीं.
कोर्ट पर सानिया जब खेलने उतरीं तो हर शॉट के बाद उसी स्टैंड की ओर देख रहीं थीं जहाँ ये सारे वीआईपी लोग बैठे थे. मगर उनकी नज़र हर बार ऐसा लगा जैसे किसी को ढूँढ़ रही है.
पूरे मैच में सानिया लगातार उस स्टैंड की ओर देखती रहीं जबकि उनके साथ विष्णु वर्धन को मैंने एक बार भी उधर देखते नहीं देखा.
मैंने नज़र इधर उधर घुमाकर देखा कि कोई ख़ास बैठा है क्या, मगर ऐसा कोई ख़ास नहीं दिखा. बात कुछ पल्ले पड़ी नहीं कि सानिया किसे ढूँढ़ रही थीं.
वैसे शोएब मलिक सानिया के बर्थडे वाले दिन तो यहीं दिखे थे मगर इस मैच में वो दिखाई नहीं दिए.