यह ध्यान देने योग्य है कि सचिन और ध्यान चंद्र के नाम का राजनीतिक लाभ लेने का ही प्रयास किया जा रहा है। हालांकि यह भी एक सच है कि सचिन को मीडिया, कार्पोरेट और प्रशंसक सभी का समर्थन मिल रहा है साथ ही क्रिकेट में धन की अधिकता और बीसीसीआई के प्रभाव ने सरकार को ये कदम उठाने पर मजबूर किया है। जबकि ध्यानचंद्र के अविश्वसनीय खेल ने भी हॉकी को वो ऊंचाईयां नहीं दी हैं, जो सचिन के खेल ने क्रिकेट को दी। सचिन और ध्यान चंद्र की तुलना करना बेमानी है पर आज के दौर में बाजारवाद की ताकत को कोई नजरअंदाज नहीं कर सकता है, फिर भी सचिन की मेहनत, समर्पण और व्यक्तित्व युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है, इससे कभी इनकार नहीं किया जा सकता है।
जदयू नेता ने किया विरोध
जदयू नेता शिवानंद तिवारी ने कहा कि सचिन ने अगर देश के लिए खेला है तो उन्होने करोड़ो रूपये भी कमाये हैं। ऐसा कहकर न सिर्फ खिलाडि़यों को हतोत्साहित किया जा रहा है, बल्कि उन उभरते खिलाडि़यों के समर्पण को भी नजरअंदाज किया जा रहा है जो कि भारत का प्रतिनिधित्व करने का सपना देखते हैं। हालांकि राजनीतिज्ञों द्वारा खिलाडि़यों को भारत रत्न देने का पक्ष लेने या विरोध करने में राजनीतिक लाभ पाने की मंशा साफ देखी जा सकती है।
राव की बात पर नहीं दिया ध्यान
प्रोफेसर सीएनआर राव ने इस बात पर नाराजगी दिखाई की हमारे देश में रिसर्च के लिए कम फंड दिया जाता है। उनका कहना है कि शोध को आगे बढ़ाने के लिए अवार्ड दे देना ही काफी नहीं है, बल्कि इसके लिए राज्य सरकारों और केंद्र सरकारों को भी संजीदगी दिखानी चाहिए। राव की इस बात को किसी भी कांग्रेस विरोधी पार्टी ने समर्थन नहीं दिया क्योंकि यह मुद्दा लोकप्रियता से जुड़ा हुआ नहीं है और न ही इससे आम जनता का अधिक सरोकार है।
अन्य शख्सियतें भी हैं दावेदार
सचिन और राव को भारत रत्न देने की घोषणा के साथ ही भाजपा नेता मांग करने लगे हैं कि भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी को यह सम्मान दिया जाना चाहिए। इसके अलावा टीडीपी नेता चंद्रबाबू नायडू का कहना है कि आंध्र नेता एन टी रामाराव समाज में दिये गये अपने योगदान के कारण इस अवार्ड के हकदार हैं। यह बेहद शर्मनाक है कि राजनीतिक दलों में से कोई भी दल समाजिक हित में काम करने वाले अन्य और कम लोकप्रिय लोगों का नाम इस सम्मान के लिए आगे नहीं कर रहा है।