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नया कुछ भी हैं है आईपीएल में

प्रदीप मैगज़ीन

वरिष्ठ खेल पत्रकार

मुझे मानना होगा कि मैं उन लोगों को सराहे बग़ैर नहीं रह सकता जो इंडियन प्रीमियर लीग यानी आईपीएल का बेहद गहराई से विश्लेषण कर रहे हैं, दर्शकों को टीमों की अंदरूनी रणनीति बता रहे हैं और यहाँ तक कि कप्तानों को जीत का नुस्ख़ा भी सुझा रहे हैं.

मौजूदा और पूर्व खिलाड़ी हर गेंद पर चौका और छक्का जड़ने की कोशिशों की जिस बेहतरीन अंदाज़ से व्याख्या करते हैं उसके लिए तो मेरे मन में उनके प्रति सम्मान पहले से कई गुना बढ़ गया है.

उनकी कल्पनाशीलता की तो जितनी दाद दी जाए कम है, ख़ासकर तब जब वे गेंदबाज़ों की ग़लतियाँ गिनाते हैं.

मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि हज़ारों लोग जो स्टेडियम तक पहुँचते हैं और लाखों लोग जो टेलीविज़न के साथ चिपके रहते हैं, कैसे हर उस लम्हे का लुत्फ़ उठाते हैं जो उन्हें मुहैया कराया जा रहा है.

गेंद पर जितनी ज़ोर से प्रहार किया जाता है और जैसे ही ये गेंद दर्शक स्टैंड तक पहुँचती है इसे लपकने का उत्साह देखते ही बनता है. उस दिन की कल्पना कीजिए जब बल्लेबाज़ द्वारा मारी गई इस गेंद को पकड़ने वाले दर्शक को लाखों रुपये का पुरस्कार दिया जाएगा.

एकरसता

नाचती, बल खाती चीयरलीडर्स, स्टेडियम में फ़िल्म स्टार और वो भी दर्शकों के बीच बैठे हुए, दुनिया के धुरंधर बल्लेबाज़ गेंद को मिसाइल की तरह हवा में उड़ाते हुए, ये नज़ारा वाकई रोमांचित कर देने वाला है.

और आख़िर के रोमांचक पल जब जीत के लिए गेंदों और रनों का फासला बहुत कम रह जाता है. इतना कम कि आपके लिए तनाव के इन लम्हों को सहन करना बहुत मुश्किल हो जाता है.

फिर भी मुझ जैसे लोगों की तादाद भी कुछ कम नहीं है जो इस बेहतरीन नज़ारे को एकतरफा और एकरसता भरा मानते हैं. हर मैच देखते हुए ऐसा लगता है मानों पिछला मुक़ाबला दोहराया जा रहा हो और जब हर गेंद को सीमा रेखा पार करने के इरादे से खेला जाए तो फिर कैसा रोमांच.

कुछ समय तक तो ये सब अच्छा लगेगा, लेकिन महीने भर तक इन मैचों का रीप्ले देखना शायद हर किसी को मनोरंजक न लगे.

हर खेल में विधा के प्रतिद्वंद्वी पहलू होते हैं और खेल का लुत्फ तभी आता है जब मैदान के नियम और माहौल दोनों टीमों के पक्ष में हो. यहाँ तो बल्लेबाज़ सम्राट है तो गेंदबाज़ कंगाल. खेल इस कदर बल्लेबाज़ों के पक्ष में है कि गेंदबाज़ों की जगह मशीनों को दी जा सकती है- जो बल्लेबाज़ की तरफ गेंद उछाले और बल्लेबाज़ जितनी ज़ोर से हो सके, उसे पीट सके.

हाँ, कुछेक अपवाद भी हैं, जब कोई गेंदबाज़ हैट्रिक ले लेता है और मुक़ाबले को एकतरफ़ा बना देता है. लेकिन उसे प्रशंसा मिलनी तो दूर, वो न केवल दर्शकों बल्कि इस खेल में करोड़ों रुपये निवेश करने वालों की नज़रों में 'मजा ख़राब करने वाला' बन जाता है.

आईपीएल को देखकर मुझे क्रिश्चियन एंडरसन की कहानी 'द एम्परर्स क्लोथ्स' (The Emperor's Clothes) याद आती है, जिसमें राजा को ये यक़ीन दिलाया जाता है कि जो पोशाक उनके लिए बनाई दा रही है वो उन लोगों को दिखाई नहीं देगी जो या तो बेवकूफ़, मूर्ख हैं या फिर अपने काम में फिट नहीं हैं.

फिर राजा को नंगा कर भरोसा दिलाया जाता है कि उनके लिए सोने और रेशम की बनी पोशाक बनाई गई है. तब राजा समेत हर शख़्स को इस डर से उस 'अदृश्य' पोशाक की तारीफ़ करनी पड़ी कि कहीं उसे ही मूर्ख न समझ लिया जाए.

इस कहानी में एक बच्चा ही था जो सच बोलता है. मैं भी खुद को 'मूर्ख' करार दिए जाने के जोखिम पर बच्चे के सुर में सुर मिला रहा हूँ 'राजा ने कुछ भी नहीं पहना है.'

(लेखक हिंदुस्तान टाइम्स के खेल सलाहकार हैं)

Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:33 [IST]
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