चैपल ने पेशेवर तकाज़े को ताक पर रखा
अब जब राजस्थान क्रिकेट एसोसिएशन की ओर से ऑस्ट्रेलियाई टीम की आवभगत पर वाद-विवाद जोड़ पकड़ रहा है, वर्ष 2004 की यादें ताज़ा हो गई हैं जब कंगारुओं ने नागपुर टेस्ट में भारत को धूल चटाई थी.
इस जीत को इस रुप में पेश किया गया कि ऑस्ट्रेलिया ने विश्व विजय के अभियान में अंतिम बाधा पार कर ली है. सर्दियों के उस मौसम में बंगलौर टेस्ट भारत हार चुका था और उसके बाद चेन्नई में मुक़ाबला बराबर करने की उसकी सारी कोशिशों पर खेल के अंतिम दिन इंद्र देव ने पानी फेर दिया.
सबका ध्यान नागपुर टेस्ट पर था क्योंकि सिरीज़ का फ़ैसला वहीं होना था. जब मेज़बान टीम पहुँची तो पिच पर हरियाली देख हैरान रह गई.
कोई भी नहीं समझ सका कि भारतीय ऐसी विकेट कैसे तैयार कर सकते हैं जो ऑस्ट्रेलियाइयों को रास आए और मेज़बान रक्षात्मक रुख़ अपनाने पर मज़बूर हो जाएँ.
यहाँ तक कि मेहमान टीम भी इस तरह की 'मेहमान नमाज़ी' को पचा नहीं पा रही थी. तबके कप्तान सौरभ गांगुली दो दिनों तक क्यूरेटर और विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष शशांक मनोहर से मिन्नत करते रहे कि पिच पर जमाई गई घास को काट दिया जाए.
वही यादें
उस समय जगमोहन डालमिया मज़बूत स्थिति में थे और शशांक मनोहर विरोधी खेमे के अगुआई कर रहे थे. मनोहर ने गांगुली की माँग को अनसुना कर दिया.
आरसीए ने कंगारुओं के लिए मददगार पिच क्यों बनाई?
बात बढ़ी और दादा ने चोटिल होने की बात कह टीम से हटना पसंद किया. नतीजा, भारत बुरी तरह पराजित हुआ और टेस्ट सिरीज़ में भारत को भारत में हराने का ऑस्ट्रेलियाई सपना पूरा हो गया.
अब मनोहर उसी कुर्सी पर हैं जहाँ डालमिया और उसके बाद शरद पवार थे. इसलिए जयपुर में विरोधी टीम की आवभगत से उन्हें चार साल पुराने विवाद की याद आनी चाहिए.
हालाँकि हालात उस समय की तुलना में कई मायनों में काफी अलग हैं. ये सोचना मूर्खता नहीं तो बचकाना होगा कि कभी भारतीय टीम के कोच रहे ग्रेग चैपल मेज़बान टीम की बारीकियों से ऑस्ट्रेलिया को अवगत करा भारत के साथ धोखा कर रहे हैं.
सबसे पहले तो उच्च तकनीक के आज के ज़माने में शायद ही कोई ऐसा रहस्य हो जो विरोधी टीम न जानती हो. दूसरी बात, कोच के रुप में विफल रहे चैपल को छोड़ भी दीजिए तो इस तरह का कोई भी कोच किसी टीम की क्षमता में बदलाव नहीं कर सकता.
इस पेशेवर ज़माने में चैपल को यह पूरा अधिकार है कि वो किसी टीम भी टीम के साथ जुड़ें और आजीविका चलाएँ जो उनकी क्षमता में विश्वास रखता है.
एक अहम सवाल
अहम सवाल ये है कि क्या चैपल ने ऑस्ट्रेलियाइयों की राय के मुताबिक राजस्थान क्रिकेट अकादमी में विकेट तैयार कराए हैं?
चैपल पोंटिंग की टीम को 'टिप्स' दे रहे हैं
अकादमी के प्रमुख के नाते उनके पास वो सब करने का अधिका है जो इस पद पर ना रहते संभव नहीं है.
यहाँ वो दोहरी भूमिका निभा रहे थे जिन्हें परस्पर विरोधाभासी कहा जा सकता है.
ऑस्ट्रेलियाई टीम के सलाहकार के नाते उन्हें अपने हितों का ध्यान रखना है लेकिन राजस्थान क्रिकेट अकादमी के प्रमुख के नाते वो कई मायनों में भारतीय क्रिकेट हितों के प्रति भी ज़िम्मेदार हैं. या क्या मैं यहाँ ग़लत हूँ?
मैंने दुनिया भर में क्रिकेट रिपोर्टिंग के अपने ढ़ाई दशकों के इतिहास में कहीं भी ऐसा नहीं देखा जब भारतीयों की ज़रूरत के हिसाब से अभ्यास मैचों के लिए विकेट तैयार किए गए हों.
उन्हें जो है उसी से संतोष करना पड़ा और किसी मेज़बान एसोसिएशन ने नेट प्रैक्टिस के लिए स्तरीय बॉलर तक उपलब्ध नहीं कराया जबकि आरसीए ये सब सुविधाएँ ऑस्ट्रेलियाई टीम को उपलब्ध करा रहा है.
ऐसा करके चैपल ने उस टीम को तो पूरी सेवा दी है जिनसे उन्हें पैसे मिले लेकिन ऐसा करते हुए उन्होंने पेशेवर तकाज़े का तनिक भी ध्यान नहीं रखा.
अब कोई सिर्फ़ उम्मीद कर सकता है कि इस वर्ष जयपुर में नागपुर, 2004 नहीं दोहराया जाए.
इस जीत को इस रुप में पेश किया गया कि ऑस्ट्रेलिया ने विश्व विजय के अभियान में अंतिम बाधा पार कर ली है. सर्दियों के उस मौसम में बंगलौर टेस्ट भारत हार चुका था और उसके बाद चेन्नई में मुक़ाबला बराबर करने की उसकी सारी कोशिशों पर खेल के अंतिम दिन इंद्र देव ने पानी फेर दिया.
सबका ध्यान नागपुर टेस्ट पर था क्योंकि सिरीज़ का फ़ैसला वहीं होना था. जब मेज़बान टीम पहुँची तो पिच पर हरियाली देख हैरान रह गई.
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यहाँ तक कि मेहमान टीम भी इस तरह की 'मेहमान नमाज़ी' को पचा नहीं पा रही थी. तबके कप्तान सौरभ गांगुली दो दिनों तक क्यूरेटर और विदर्भ क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष शशांक मनोहर से मिन्नत करते रहे कि पिच पर जमाई गई घास को काट दिया जाए.
वही यादें
उस समय जगमोहन डालमिया मज़बूत स्थिति में थे और शशांक मनोहर विरोधी खेमे के अगुआई कर रहे थे. मनोहर ने गांगुली की माँग को अनसुना कर दिया.
आरसीए ने कंगारुओं के लिए मददगार पिच क्यों बनाई?
बात बढ़ी और दादा ने चोटिल होने की बात कह टीम से हटना पसंद किया. नतीजा, भारत बुरी तरह पराजित हुआ और टेस्ट सिरीज़ में भारत को भारत में हराने का ऑस्ट्रेलियाई सपना पूरा हो गया.
अब मनोहर उसी कुर्सी पर हैं जहाँ डालमिया और उसके बाद शरद पवार थे. इसलिए जयपुर में विरोधी टीम की आवभगत से उन्हें चार साल पुराने विवाद की याद आनी चाहिए.
हालाँकि हालात उस समय की तुलना में कई मायनों में काफी अलग हैं. ये सोचना मूर्खता नहीं तो बचकाना होगा कि कभी भारतीय टीम के कोच रहे ग्रेग चैपल मेज़बान टीम की बारीकियों से ऑस्ट्रेलिया को अवगत करा भारत के साथ धोखा कर रहे हैं.
सबसे पहले तो उच्च तकनीक के आज के ज़माने में शायद ही कोई ऐसा रहस्य हो जो विरोधी टीम न जानती हो. दूसरी बात, कोच के रुप में विफल रहे चैपल को छोड़ भी दीजिए तो इस तरह का कोई भी कोच किसी टीम की क्षमता में बदलाव नहीं कर सकता.
इस पेशेवर ज़माने में चैपल को यह पूरा अधिकार है कि वो किसी टीम भी टीम के साथ जुड़ें और आजीविका चलाएँ जो उनकी क्षमता में विश्वास रखता है.
एक अहम सवाल
अहम सवाल ये है कि क्या चैपल ने ऑस्ट्रेलियाइयों की राय के मुताबिक राजस्थान क्रिकेट अकादमी में विकेट तैयार कराए हैं?
चैपल पोंटिंग की टीम को 'टिप्स' दे रहे हैं
अकादमी के प्रमुख के नाते उनके पास वो सब करने का अधिका है जो इस पद पर ना रहते संभव नहीं है.
यहाँ वो दोहरी भूमिका निभा रहे थे जिन्हें परस्पर विरोधाभासी कहा जा सकता है.
ऑस्ट्रेलियाई टीम के सलाहकार के नाते उन्हें अपने हितों का ध्यान रखना है लेकिन राजस्थान क्रिकेट अकादमी के प्रमुख के नाते वो कई मायनों में भारतीय क्रिकेट हितों के प्रति भी ज़िम्मेदार हैं. या क्या मैं यहाँ ग़लत हूँ?
मैंने दुनिया भर में क्रिकेट रिपोर्टिंग के अपने ढ़ाई दशकों के इतिहास में कहीं भी ऐसा नहीं देखा जब भारतीयों की ज़रूरत के हिसाब से अभ्यास मैचों के लिए विकेट तैयार किए गए हों.
उन्हें जो है उसी से संतोष करना पड़ा और किसी मेज़बान एसोसिएशन ने नेट प्रैक्टिस के लिए स्तरीय बॉलर तक उपलब्ध नहीं कराया जबकि आरसीए ये सब सुविधाएँ ऑस्ट्रेलियाई टीम को उपलब्ध करा रहा है.
ऐसा करके चैपल ने उस टीम को तो पूरी सेवा दी है जिनसे उन्हें पैसे मिले लेकिन ऐसा करते हुए उन्होंने पेशेवर तकाज़े का तनिक भी ध्यान नहीं रखा.
अब कोई सिर्फ़ उम्मीद कर सकता है कि इस वर्ष जयपुर में नागपुर, 2004 नहीं दोहराया जाए.
Story first published: Tuesday, November 14, 2017, 12:20 [IST]
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