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Asian Games 2018: रिक्शा चालक की बेटी स्वप्ना बर्मन ने जीता गोल्ड, तंगी में कुछ इस तरह से बीता बचपन

Asian Games 2018: Swapna Barman Clinches Gold medal for India in Heptathlon | वनइंडिया हिंदी

नई दिल्ली। जुनून,मेहनत और प्रतिभा का समीकरण मिलकर नई इबारत लिखता है।लाख मुसीबतें हो लेकिन दिल में इतिहास रचने का जज्बा हो तो कुछ भी संभव है। आवाम सफलता मिलने के बाद ही संघर्ष की कहानियों को स्वीकार करती है।एशियन गेम्स में सोना जीतने वाली स्वप्ना बर्मन की कहानी भी ऐसी ही है। गरीबी में जीवन काट कर यहां तक पहुंची स्वप्ना की कहानी किसी चमत्कार से कम नहीं है।

दांत में दर्द के बावजूद स्वप्ना बर्मन ने लड़ने का जज्बा दिखाते हुए एशियाड में भारत को पहला महिला हेप्टाथलन स्वर्ण पदक दिला दिया।स्वप्ना के दांत में भी दर्द था और इससे पहले वह पीठ के दर्द से जूझ रही थीं। शारीरिक कष्ट के अलावा स्वप्ना को मानसिक तौर पर भी काफी मजबूत रहना पड़ा।सवप्ना के पिता रिक्शा चालक हैं और कई दिनों से बीमार हैं और बिस्तर पर हैं।बेटी की इस सफलता पर आज रिक्शा चालक पिता को बधाई देने वालों का तांता लगा है।

जूतों के लिए संघर्ष:
स्वप्ना के सामने चुनौतियों का अंबार था। जन्म से ही उनके दोनों पैर में छह अंगुलियां है।इस वजह से जूते उनके पैर में ज्यादा देर तक टिकते नहीं हैं।उनके जूते जल्दी फट जातें हैं।जीत के बाद स्वप्ना ने कस्टाइज जूतों की मांग की है जो उनके पैरों को ध्यान में रखकर बनाए गए हों।स्व्प्ना को बचपन से जूतों के लिए संघर्ष करना पड़ा।अब जीत के बाद शायद स्वप्ना की इस समस्या का निवारण हो जाए।

एशियाड में जैसे ही स्वप्ना बर्मन के सोना जीतने की खबर आई तो उत्तरी बंगाल के जलपाईगुड़ी शहर में खुशी छा गई। लोग स्वप्ना बर्मन के घर जाकर बधाई देने लगे। परिवार तो खुशी से नाच उठा। स्वप्ना ने इंडोनेशिया के जकार्ता में जारी 18वें एशियाई खेलों की हेप्टाथलन स्पर्धा में स्वर्ण पदक अपने नाम किया। वह इस स्पर्धा में स्वर्ण जीतने वाली भारत की पहली महिला खिलाड़ी हैं।स्वप्ना ने 7 स्पर्धाओं में कुल 6026 अंकों के साथ पहला स्थान हासिल किया।

मां ने खुद को मंदिर में कर लिया था:
मां ने खुद को मंदिर में कर लिया था बंदः बेटी की सफलता से गदगद मां बाशोना के मुंह से शब्द ही नहीं निकल रहे थे। घरवालों के मुताबिक बेटी के सफलता की कामना के लिए वह पूरे दिन भगवान से प्रार्थना कर रहीं थीं। स्वप्ना की मां ने अपने आप को काली माता के मंदिर में बंद कर लिया था। मां ने अपनी बेटी को इतिहास रचते नहीं देखा, क्योंकि वह बेटी के लिए दुआ करने में जुटीं थीं।

बेटी के पदक जीतने के बाद बशोना ने कहा, "मैंने उसका प्रदर्शन नहीं देखा। मैं दिन के दो बजे से प्रार्थना कर रही थी।यह मंदिर उसने बनाया है। मैं काली मां को बहुत मानती हूं। मुझे जब उसके जीतने की खबर मिली तो मैं अपने आंसू रोक नहीं पाई।" घर की माली हालत की बात करें तो स्वप्ना के पिता पंचन बर्मन रिक्शा चलाते हैं, लेकिन बीते कुछ दिनों से उम्र के साथ लगी बीमारी के कारण बिस्तर पर हैं।बशोना ने बेहद भावुक आवाज में कहा, "यह उसके लिए आसान नहीं था। हम हमेशा उसकी जरूरतों को पूरा नहीं कर पाते थे, लेकिन उसने कभी भी शिकायत नहीं की।"

स्वप्ना के बचपन के कोच सुकांत सिन्हा बताते हैं कि "वह बेहद जिद्दी है और यही बात उसके लिए अच्छी भी है। राइकोट पारा स्पोर्टिग एसोसिएशन क्लब में हमने उसे हर तरह से मदद की। आज मैं बता नहीं सकता कि मैं कितना खुश हूं।" चार साल पहले इंचियोन में आयोजित किए गए एशियाई खेलों में स्वप्ना कुल 5178 अंक हासिल कर चौथे स्थान पर रही थी।

पिछले साल एशियाई एथलेटिक्स चैम्पियनशिप में भी वह स्वर्ण जीत कर लौटी थी। स्वप्ना ने 100 मीटर में हीट-2 में 981 अंकों के साथ चौथा स्थान हासिल किया था। ऊंची कूद में 1003 अंकों के साथ पहले स्थान पर कब्जा जमाया।गोला फेंक में वह 707 अंकों के साथ दूसरे स्थान पर रहीं। 200 मीटर रेस में उसने हीट-2 में 790 अंक लिए।

Story first published: Thursday, August 30, 2018, 12:44 [IST]
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