राहुल द्रविड़: क्रिकेट का एक ऐसा योद्धा जो खुद में एक ब्रांड बन गया

राहुल द्रविड़: क्रिकेट का एक ऐसा योद्धा जो खुद में एक ब्रांड बन गया

नई दिल्ली। राहुल द्रविड़ क्रिकेट के माइलस्टोन हैं। यह कहना न केवल उन्हें सम्मान देना है बल्की यह सम्मान क्रिकेट के लिए भी है कि क्रिकेट में राहुल द्रविड़ जैसे खिलाड़ी हुए हैं जिन्होंने समय के साथ बदलते इस प्रतिस्पर्धी क्रिकेट में न केवल अपने खेल के कौशल से क्रिकेट को अमीर किया है; बल्कि अपनी शालीनता से भद्रजनों के खेल कहे जाने वाले क्रिकेट पर से भरोसा टूटने नहीं दिया। खेल के साथ साथ अपनी और खेल की गरिमा बनाए रखने वाले खिलाड़ी बिरले होते हैं। राहुल द्रविड़ उनमें से एक हैं। जब द्रविड़ की चर्चा हो रही है तो उनके बनाए गए रिकॉर्ड्स की चर्चा करना भी जरूरी है क्योंकि क्रिकेट अपने अन्य विशेषताओं के साथ साथ आंकड़ो का भी खेल है। लेकिन द्रविड़ के 47वें जन्मदिन पर केवल उनके आंकड़ों पर ही चर्चा करना मुख्य हमारा उद्देश्य नहीं है। भारतीय क्रिकेट में राहुल द्रविड़ कैसे अंडररेटेड रहे, उन्होंने टीम हित में कैसे अपने खुद के हित कि परवाह नहीं की और वो अब भी अपनी उसी लगन से भारतीय क्रिकेट को समृद्ध करने में क्यों लगे हैं, इन बातों की चर्चा करेंगे।

ये हैं राहुल द्रविड़ के कुछ रिकॉर्ड्स

ये हैं राहुल द्रविड़ के कुछ रिकॉर्ड्स

सन 1996 में द्रविड़ टीम इंडिया के लिए अपना पहला वनडे और पहला टेस्ट मैच खेले थे। उनका यह सफर बगैर रूके अगले 16 बरसों तक जारी रहा। द्रविड़ टेस्ट मैचों में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले दुनिया के चौथे बल्लेबाज हैं। उनके नाम टेस्ट मैचों में सबसे ज्यादा गेंदें खेलने का भी रिकॉर्ड है। राहुल अपने क्रिकेट करियर में 31,258 गेंदों का सामना किया और कुल 736 घंटे क्रीज पर बिताए, जो कि एक वर्ल्ड रेकॉर्ड है। द्रविड़ वर्ल्ड क्रिकेट के ऐसे पहले बल्लेबाज हैं, जिन्होंने टेस्ट क्रिकेट खेलने वाली दुनिया की सभी 10 टीमों के खिलाफ शतक जड़ा है। टेस्ट मैचों में तीसरे नंबर पर सबसे ज्यादा रन बनाने का रेकॉर्ड भी उनके ही नाम है। उन्होंने 52 के औसत से बल्लेबाजी करते हुए नंबर 3 की पोजिशन पर 10,524 रन बनाए। उनके नाम पर 32,039 रनों की पार्टनरशिप करने का रेकॉर्ड है। उन्होंने 50 रन से ज्यादा की कुल 126 साझेदारियां कीं, जबकि 100 रन से ज्यादा की 88 पार्टनरशिप कीं। गैर-विकेटकीपर फील्डर के तौर पर उन्होंने 164 टेस्ट मैचों में 210 से ज्यादा कैच पकड़े थे, यह भी एक वर्ल्ड रेकॉर्ड है। टेस्ट क्रिकेट में द्रविड़ के खेले गए 164 मैचों की 286 पारियों में 36 शतक और 63 अर्धशतक हैं वहीं 344 एकदिवसीय मैचों की 318 पारियों में 12 शतक और 83 अर्धशतक शामिल हैं। इतना ही नहीं, धीमी और क्लासिकल पारियां खेलने के लिए मशहूर द्रविड़ का नाम किसी भारतीय खिलाडी द्वारा लगाए गए तेज अर्धशतक में दूसरे नंबर पर है। उन्होंने न्यूजीलैंड के खिलाफ 22 गेंदों पर अर्धशतक बनाकर सनसनी फैला दिया था।

भारतीय क्रिकेट में राहुल द्रविड़ कैसे अंडररेटेड रहे

भारतीय क्रिकेट में राहुल द्रविड़ कैसे अंडररेटेड रहे

इसे राहुल द्रविड़ के कैरियर की विडंबना ही कहा जा सकता है कि एक शानदार क्लासिकल बल्लेबाज को क्रिकेट के जीनियसओं के साथ खेलना पड़ा। ऐसे संयोग का होना विडंबना ही कहा जाएगा क्योंकि एक तरफ आप क्रिकेट के महानतम खिलाड़ियों के साथ ड्रेसिंग रूम साझा करते हैं, उनके साथ खेलते हैं तो दूसरी तरफ आपके खामोशी से किए गए शानदार प्रदर्शन उन जीनियसओं के सामने अंडरेटेड रह जाता है। राहुल द्रविड़, सौरभ गांगुली के साथ टीम में आए थे जहाँ पहले से ही महानतम सचिन तेंदुलकर और वी वी एस लक्ष्मण जैसे धाकड़ बल्लेबाज मौजूद थे। यह वह दौर था जहाँ सचिन के जलवे थे। सचिन के खेल से टीम की हार-जीत का प्रायः अनुमान हो जाता था। उस समय राहुल ने अपनी एक राह पकड़ी और मध्यक्रम के एक छोड़ को खामोशी से संभालते रहे। चूंकि उस समय टीम एक इकाई के रूप में मजबूत होकर खेलने की प्रारंभिक अवस्था मे थी इसलिए टीम के रिजल्ट में पिछड़ जाने से इस योद्धा की गाथा अनकही रह जाती थी। लेकिन द्रविड़ अपने मजबूत इरादों से हमेशा डटे रहे। वे बस अपने खेल को निखारते रहे, कभी हीरो बनने की चाहत नहीं दिखाई। क्रिकेट के प्रति उनकी यही दीवानगी, लगन, समर्पण और शालीनता उनके कौशल के साथ मिलकर क्रिकेट का एक अलग ब्रांड बन गया जिसका नाम राहुल द्रविड़ है।

राहुल द्रविड़ ने टीम हित में कैसे अपने हित की परवाह नहीं की?

राहुल द्रविड़ ने टीम हित में कैसे अपने हित की परवाह नहीं की?

राहुल द्रविड़ ऐसे खिलाड़ियों में से एक रहे हैं जिन्होंने टीम हित को सबसे ऊपर रखा। राहुल द्रविड़ मूल रूप से एक विशुद्ध बल्लेबाज थे। टीम जब एक इकाई के रूप प्रदर्शन करने की प्रारंभिक अवस्था में थी तब गांगुली की अगुवाई में टीम में एक प्रयोग किया गया। वह प्रयोग था विकेटकीपिंग का। जिसमें यह माना गया कि अगर टीम का कोई स्थापित खिलाड़ी यह जिम्मा उठा ले तो एक अतिरिक्त विशुद्ध बल्लेबाज को टीम में खिलाकर टीम को अतिरिक्त मजबूती दी जा सकती है। टीम के इस प्रयोग के 'मैटेरियल' राहुल द्रविड़ रहे। राहुल को मिली यह अतिरिक्त जिम्मेदारी दोधारी थी। अमूमन खिलाड़ियों पर अतिरिक्त जिम्मेदारी उसके खेल को प्रभावित करता है। हाल ही में सन्यास ले चुके इरफान पठान इसके आदर्श उदाहरण हैं। लेकिन द्रविड़ ने अपने हित के ऊपर टीम हित को तरजीह दिया और इस अतिरिक्त जिम्मेदारी का वहन करते हुए अपने खेल के स्तर को उठाये रखा। किसी खिलाड़ी का इस प्रतिस्पर्धी दौर में टीम हित के लिए ऐसा जज़्बा विरले ही हैं। इसलिए भी द्रविड़ अपने आप में एक ब्रांड हैं।

राहुल द्रविड़ अब क्या कर रहे हैं

राहुल द्रविड़ अब क्या कर रहे हैं

राहुल द्रविड़ अपने सन्यास के बाद भारतीय टीम के निर्माण में बगैर किसी शोर के लगे हुए हैं। उन्होंने किसी बड़े विकल्प की तरफ देखने की जगह भारतीय क्रिकेट की अगली पीढ़ी को सलाह देने और ढालने का विकल्प चुना। यह द्रविड़ को सबसे अलग और शानदार बनाता है। राहुल द्रविड़ नें 2015 में भारत ए और भारत अंडर -19 टीमों के कोच के रूप में काम करना शुरू किया था। उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान भारतीय बेंचमार्क को जितना मजबूत किया है उतना आजतक इससे पहले भारतीय टीम का बेंचमार्क नहीं रहा था। आज के उभरते टेस्ट सितारे मयंक अग्रवाल, पृथ्वी शाह हों या हनुमा विहारी इसके पीछे राहुल द्रविड़ का ही दिवार है। लोकेश राहुल, ऑलराउंडर विजय शंकर, शुभमन गिल, उन्मुक्त चंद, करुण नायर, हरमीत सिंह और संजू सैमसन जैसे युवा प्रतिभा को बगैर किसी शोर के तराशने वाले भी राहुल द्रविड़ ही हैं। ऐसा द्रविड़ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि क्रिकेट उनका प्यार है उनका जुनून है। और यह जुनून आज भी कायम है जब वे राष्ट्रीय क्रिकेट अकादमी में क्रिकेट संचालन निदेशक हैं।

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Story first published: Saturday, January 11, 2020, 17:23 [IST]
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