जब चोटिल होने के बावजूद पाकिस्तान पर भारी पड़े बलबीर, जानें उनके करियर से जुड़े कुछ किस्से
नई दिल्ली। खेल जगत के लिए आज का दिन यानी कि 25 मई बेहद दुखभरा साबित हुआ क्योंकि हाॅकी के पूर्व महान खिलाड़ी बलबीर सिंह सीनियर दुनिया को अलविदा कह गए हैं। न्होंने मोहाली के फोर्टिस अस्पताल में दम तोड़ा जिसकी जानकारी अस्पताल के डायरेक्टर अभिजीत सिंह ने दी। बलवीर को 13 मई की सुबह दिल का दौरा पड़ा जिससे उनकी हालत नाजुक बनी हुई थी। वह आईसीयू में भर्ती थे और उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया था। बलबीर की माैत पर सभी दिग्गज दुखी हैं। वह भले ही अब हमारे बीच में ना हों, लेकिन उनका दिया योगदान कभी ना भूला पाने वाला है। खासकर वो लम्हा, जब उन्होंने चोटिल होने के बावजूद पाकिस्तान पर दवाब डालने की सफलता पाई थी। आइए जानें उनके करियर से जुड़े कुछ किस्से-

चोटिल हुए लेकिन गुप्त रखी गई सूचना
देश को ओलंपिक खेलो में तीन बार(1948), 1952, 1956) गोल्ड मेडल दिलाने में भूमिका निभाने वाले बलबीर ने 1956 में हुए विश्व कप में चोटिल होने के बावजूद देश के लिए खेला था। 1956 के मेलबर्न ओलंपिक हॉकी टीम के कप्तान बलबीर सिंह थे। पहले मैच में भारत ने अफनिस्तान को 14-0 से हराया लेकिन भारत को सबसे बड़ा झटका तब लगा जब कप्तान बलबीर सिंह के दाँए हाथ की उंगली टूट गई। बीबीसी से बात करते हुए बलबीर ने कहा था, "मैं अफगानिस्तान के खिलाफ पांच गोल मार चुका था, तभी मुझे बहुत बुरी चोट लग गई। ऐसा लगा किसी ने मेरी उंगली के नाख़ून पर हथौड़ा चला दिया हो। शाम को जब एक्स-रे हुआ तो पता चला कि मेरी उंगली में फ़्रैक्चर हुआ है। नाखून नीला पड़ गया था और उंगली बुरी तरह से सूज गई थी।"
बलबीर सिंह ने आगे बताया था, "हमारे मैनेजर ग्रुप कैप्टेन ओपी मेहरा, चेफ डे मिशन एयर मार्शल अर्जन सिंह और भारतीय हॉकी फ़ेडेरेशन के उपाध्यक्ष अश्वनी कुमार के बीच एक मंत्रणा हुई और ये तय किया गया कि मैं बाकी के लीग मैचों में नहीं खेलूंगा... सिर्फ सेमीफाइनल और फाइनल में मुझे उतारा जाएगा। मेरी चोट की खबर को गुप्त रखा जाएगा। वजह ये थी कि दूसरी टीमें मेरे पीछे कम से कम दो खिलाड़ियों को लगाती थीं जिससे दूसरे खिलाड़ियों पर दबाव कम हो जाता था।"

फिर फाइनल में पाकिस्तान को दी मात
बहरहाल भारतीय टीम जर्मनी को हरा कर फाइनल में पहुंची। फाइनल में भारत का मुक़ाबला पाकिस्तान से था। ये उनका पाकिस्तान से पहला मुक़ाबला था लेकिन इसका इंतजार दोनों देशों के खिलाड़ी 1948 से ही कर रहे थे। भारत की टीम बहुत ज्यादा दबाव में थी। भारत पर दबाव ज्यादा था, क्योंकि अगर पाकिस्तान को रजत पदक भी मिलता तो उनके लिए ये संतोष की बात होती। लेकिन भारत के लिए स्वर्ण से नीचे का कोई पदक निराशापूर्ण बात होती। मैच से एक दिन पहले बलबीर सिंह बहुत ही तनाव में थे। भारत ने फाइनल में पाकिस्तान को 2-1 से हरा कर विश्व कप हॉकी जीता। इसके बात भारत ने कभी भी विश्व कप में जीत नहीं हासिल की।

1948 में जीतकर लाैटे तो जहाज फंस गया था
जब भारत पहली बार 1948 में चैंपियन बना तो घर लाैटते समय उनका समुद्र जहाज जवार-भाटे में फंस गया था। भारत और इंग्लैंड के बीच लंदन के वेम्बली स्टेडियम में हॉकी का फ़ाइनल शुरू हुआ तो सारे दर्शकों ने एक सुर में चिल्लाना शुरू किया, "कम ऑन ब्रिटेन, कम ऑन ब्रिटेन!" धीरे-धीरे हो रही बारिश से मैदान गीला और रपटीला हो चला था. नतीजा ये हुआ कि किशन लाल और केडी सिंह बाबू दोनों अपने जूते उतार कर नंगे पांव खेलने लगे।पहले हाफ में ही दोनों के दिए पास पर बलबीर सिंह ने टॉप ऑफ डी से शॉट लगा कर भारत को 2-0 से आगे कर दिया।
खेल खत्म होने के समय स्कोर था 4-0 और स्वर्ण पदक भारत का था. जैसे ही फ़ाइनल विसिल बजी ब्रिटेन में भारत के तत्कालीन उच्चायुक्त कृष्ण मेनन दौड़ते हुए मैदान में घुसे और भारतीय खिलाड़ियों से गले मिलने लगे। बाद में उन्होंने भारतीय हॉकी टीम के लिए इंडिया हाउज में स्वागत समारोह किया जिसमें लंदन के जाने-माने खेल प्रेमियों को आमंत्रित किया गया। जब ये टीम पानी के जहाज से वापस भारत पहुंची तो बंबई के पास उनका जहाज कमजोर ज्वार-भाटे में फंस गया। उस ओलंपिक में स्टार बने बलबीर सिंह अपने जहाज से अपनी मातृ-भूमि को देख पा रहे थे। उस हालत में उन्हें पूरे दो दिन रहना पड़ा। जब ज्वार ऊँचा हुआ तब जा कर उनका जहाज बंबई के बंदरगाह पर लग सका। लेकिन इस बीच बहुत से खेल प्रेमी नावों पर सवार हो कर हॉकी में स्वर्ण पदक लाने वालों को बधाई देने के लिए पानी के जहाज पर पहुंच गए।

1952 में 13 गोल में अकेले दाग दिए थे 9 गोल
हेलिंस्की में हुए 1952 के ओलंपिक खेलों में भी बलबीर सिंह को भारतीय टीम में चुना गया। वहां उन्हें 13 नंबर की जर्सी पहनने के लिए दी गई। अशुभ होने के बजाए 13 नंबर बलबीर के लिए भाग्य ले कर आया। पूरे टूर्नामेंट में भारत ने कुल 13 गोल स्कोर किए। उनमें से 9 गोल बलबीर सिंह ने मारे।
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