फुटबॉल पर थिरके थे हिमा दास के पहले कदम, कोच की परख ने बनाया ट्रैक इवेंट का विश्व चैंपियन
नई दिल्ली। जब किसी इंसान के सपने रातों में नींद से लड़ाई करते हैं तो सुबह का सूरज उस ख्वाब की रोशनी को हकीकत बनाकर पूरी दुनिया में फैला देता है। संघर्ष, सामर्थ्य और प्रतिभा को मुश्किलें अपने वश में नहीं कर सकतीं, और न ही उनपर अपनी जीत दर्ज करा सकती हैं। कड़ी मेहनत, जज्बा और कुछ कर गुजरने की ख्वाहिश जब किसी इंसान के हौसले में शुमार हो जाए तो वक्त भले ही लगे लेकिन एक न एक दिन उसकी प्रतिभा पूरी दुनिया पर राज करती है। ऐसे ही हौसले की एक मिसाल हैं असम की 18 वर्षीय एथलीट हिमा दास। जिस उम्र में सपने आंखों में भ्रूण अवस्था में होते हैं उस उम्र में हिमा ने फिनलैंड के टैम्पेयर शहर में इतिहास रचते हुए आईएएएफ विश्व अंडर-20 एथलेटिक्स चैंपियनशिप की 400 मीटर दौड़ स्पर्धा में गोल्ड मेडल जीता है। यह पहली बार है जब भारत की कोई महिला खिलाड़ी जूनियर या सीनियर किसी भी स्तर पर विश्व चैम्पियनशिप में गोल्ड जीत सकी हो। हिमा ने यह कारनामा 51.46 सेकेंड में पूरा कर लिया।
जब छलक पड़ें हिमा के आंसू
ख्वाब को हकीकत बनाने के लिए जब कोई इंसान उसके पीछे भागता है तो इतिहास बनते हैं । ऐसा ही उदाहरण हैं हिमा दास। बता दें कि इस प्रतियोगिता में रोमानिया की एंड्रिया मिकलोस को सिल्वर और अमरीका की टेलर मैंसन को ब्रॉन्ज मेडल मिला। दौड़ के 35वें सेकेंड तक हिमा शीर्ष तीन खिलाड़ियों में भी नहीं थीं, लेकिन बाद में उन्होंने रफ्तार पकड़ी और इतिहास बना लिया। इस जीत के बाद जब देश का गौरव राष्ट्रगान बजा तो जिस चेहरे से कभी पसीने की बूंदे टपकती थीं उस चेहरे पर खुशी के मोती घर कर रहे थे।
बेहद साधारण परिवार से हैं हिमा
सफलता अक्सर सब्र का इम्तिहान लेती है। यही हुआ हिमा के साथ भी, असम के एक साधारण किसान परिवार में जन्मी हिमा के पिता धान की खेती करते हैं, और इसी खेत में हिमा ने अपने सफर की शुरुआत भी की थी और वो खेत में ही अभ्यास किया करती थीं।

हिमा के कोच जिन्होंने पहचानी प्रतिभा
हिमा की इस सफलता में उनके कोच निपोन दास का बहुत बड़ा योगदान है। इस सफलता के बाद दास ने कहा कि उन्हें पूरा विश्वास था कि हिमा कम से कम टॉप थ्री में जरूर शामिल होगी। कोच ने बताया कि हिमा ने दो साल पहले ही रेसिंग ट्रैक पर कदम रखा था। हिमा कभी फुटबॉल की शौकीन हुआ करती थीं कोच ने बताया कि जब उन्होंने हिमा को लड़कों के साथ फुटबॉल खेलते और उन्हें छकाते देखा तो वह उनके परिवार वालों से मिले और उन्हें एथलीट जगत में भाग्य आजमाने की सलाह दी। बेटी की क्षमता पर तो परिवार को भरोसा था लेकिन वो अपने आर्थिक सामर्थ्य से भी वाकिफ थे इसलिए इस बात की भी जिम्मेदारी कोच ने ही उठाई।

लगातार रहा है शानदार प्रदर्शन
इस ऐतिहासिक सफलता के बाद हिमा अब इंडियन एथलीट के एलीट क्लब में शामिल हो चुकी हैं। वहीं इससे पहले बुधवार को हुए सेमीफाइनल में भी शानदार प्रदर्शन करते हुए 52.10 सेकंड का समय निकालकर वो पहले स्थान पर रही थीं। इसके पहले भी अप्रैल में गोल्ड कोस्ट में खेले गए कॉमनवेल्थ खेलों की 400 मीटर की स्पर्धा में हिमा दास छठे स्थान पर रही थीं। वहीं हाल ही में गुवाहाटी में हुई अंतरराज्यीय चैंपियनशिप में उन्होंने गोल्ड मेडल अपने नाम किया था।
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